
अगरतला:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा के दौरान हुए जमीन की अदला-बदली के ऐतिहासिक समझौते पर अमल होने के बावजूद एक एंक्लेव अब भी अधर में लटका हुआ है। यह है त्रिपुरा का मुहुरिचर, जिसके भाग्य का फैसला होना अभी बाकी है।
समझौते के तहत बांग्लादेश को 111 और भारत को 51 एंक्लेव मिलने थे। बांग्लादेश को 110 मिल चुके हैं। मुहुरिचर लटक गया है। 31 जुलाई और एक अगस्त की आधी रात को इन एंक्लेव की 52,000 की आबादी ने 68 साल के बाद पहली बार आजादी की हवा में सांस ली। इन्हें अपने-अपने देशों की नागरिकता मिली थी।
कुल 162 एंक्लेव में दक्षिण त्रिपुरा के मुहुरिचर को बांग्लादेश को मिलना था, जबकि उत्तरी त्रिपुरा के चंदननगर को भारत में ही बने रहना था। त्रिपुरा के राजस्व एवं लोक निर्माण विभाग मंत्री बादल चौधरी ने आईएएनएस से कहा, 'चंदननगर को लेकर कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन भारत और बांग्लादेश के सर्वे विभाग ने मुहुरिचर के सीमांकन के बारे में त्रिपुरा सरकार से सलाह-मशविरे के बगैर एक तरफा फैसला ले लिया। इस वजह से इस इलाके के बारे में अभी भी अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है।'
उन्होंने कहा कि मुहुरिचर के बारे में ढाका में एक बैठक हुई थी, जिसमें कोई नतीजा नहीं निकला। अब दिल्ली में एक बैठक होगी, जिसमें मसले के हल की कोशिश की जाएगी।
मुहुरिचर में 57 भारतीय खेती का काम करते हैं। और, ऐसा वे बांग्लादेश बनने के बहुत पहले से करते आ रहे हैं। ढाका में बांग्लादेश-भारत संयुक्त सीमा कार्यकारी समूह की छठी बैठक में तय हुआ था कि दोनों देश मुहुरिचर की 67 एकड़ भूमि का संयुक्त रूप से सर्वे करेंगे, ताकि मसला हल हो सके।
बैठक में भारतीय पक्ष का नेतृत्व विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव सिरिप्रिया रंगनाथन ने किया था। रंगनाथन ने त्रिपुरा के मुख्य सचिव को लिखा था कि विदेश मंत्रालय 1974 के भूमि समझौते और 2011 के समझौते से बाहर जाकर कोई भी कदम नहीं उठाएगा।
रंगनाथन ने कहा, 'सीमांकन के बाद मुहुरिचर के 63 एकड़ के इलाके में से 36 एकड़ बांग्लादेश को देने में हमें कोई दिक्कत नहीं है।' चौधरी ने बताया कि मुहुरिचर को लेकर विवाद 1965 के शुरू में हुआ था। पहले पाकिस्तानी और बाद में बांग्लादेशी भारतीय इलाके पर गोलीबारी करते रहे। इनमें कुछ लोग मारे भी गए थे।
दक्षिण त्रिपुरा के जिलाधिकारी देबाशीष बसु ने बताया कि केंद्र सरकार को लिखा गया है कि वह इस इलाके में सालों से खेती करने वाले किसानों को विवाद से हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए आर्थिक मदद दे। भारत विभाजन के बाद से ही मुहुरिचर में बहने वाली मुहुरी नदी दोनों देशों के बीच प्राकृतिक सीमा मानी जाती रही है।
समझौते के तहत बांग्लादेश को 111 और भारत को 51 एंक्लेव मिलने थे। बांग्लादेश को 110 मिल चुके हैं। मुहुरिचर लटक गया है। 31 जुलाई और एक अगस्त की आधी रात को इन एंक्लेव की 52,000 की आबादी ने 68 साल के बाद पहली बार आजादी की हवा में सांस ली। इन्हें अपने-अपने देशों की नागरिकता मिली थी।
कुल 162 एंक्लेव में दक्षिण त्रिपुरा के मुहुरिचर को बांग्लादेश को मिलना था, जबकि उत्तरी त्रिपुरा के चंदननगर को भारत में ही बने रहना था। त्रिपुरा के राजस्व एवं लोक निर्माण विभाग मंत्री बादल चौधरी ने आईएएनएस से कहा, 'चंदननगर को लेकर कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन भारत और बांग्लादेश के सर्वे विभाग ने मुहुरिचर के सीमांकन के बारे में त्रिपुरा सरकार से सलाह-मशविरे के बगैर एक तरफा फैसला ले लिया। इस वजह से इस इलाके के बारे में अभी भी अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है।'
उन्होंने कहा कि मुहुरिचर के बारे में ढाका में एक बैठक हुई थी, जिसमें कोई नतीजा नहीं निकला। अब दिल्ली में एक बैठक होगी, जिसमें मसले के हल की कोशिश की जाएगी।
मुहुरिचर में 57 भारतीय खेती का काम करते हैं। और, ऐसा वे बांग्लादेश बनने के बहुत पहले से करते आ रहे हैं। ढाका में बांग्लादेश-भारत संयुक्त सीमा कार्यकारी समूह की छठी बैठक में तय हुआ था कि दोनों देश मुहुरिचर की 67 एकड़ भूमि का संयुक्त रूप से सर्वे करेंगे, ताकि मसला हल हो सके।
बैठक में भारतीय पक्ष का नेतृत्व विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव सिरिप्रिया रंगनाथन ने किया था। रंगनाथन ने त्रिपुरा के मुख्य सचिव को लिखा था कि विदेश मंत्रालय 1974 के भूमि समझौते और 2011 के समझौते से बाहर जाकर कोई भी कदम नहीं उठाएगा।
रंगनाथन ने कहा, 'सीमांकन के बाद मुहुरिचर के 63 एकड़ के इलाके में से 36 एकड़ बांग्लादेश को देने में हमें कोई दिक्कत नहीं है।' चौधरी ने बताया कि मुहुरिचर को लेकर विवाद 1965 के शुरू में हुआ था। पहले पाकिस्तानी और बाद में बांग्लादेशी भारतीय इलाके पर गोलीबारी करते रहे। इनमें कुछ लोग मारे भी गए थे।
दक्षिण त्रिपुरा के जिलाधिकारी देबाशीष बसु ने बताया कि केंद्र सरकार को लिखा गया है कि वह इस इलाके में सालों से खेती करने वाले किसानों को विवाद से हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए आर्थिक मदद दे। भारत विभाजन के बाद से ही मुहुरिचर में बहने वाली मुहुरी नदी दोनों देशों के बीच प्राकृतिक सीमा मानी जाती रही है।
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