
नई दिल्ली:
लोकपाल पर बनी संसद की सेलेक्ट कमेटी ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में शामिल करने की सिफारिश की है हालांकि परमाणु ऊर्जा और खुफिया महकमों से जुड़े मामलों में उन्हें छूट दी गई है।
सेलेक्ट कमेटी ने यह सिफारिश भी की है कि लोकपाल पास होने के सालभर के भीतर सभी राज्यों में एक लोकायुक्त होना चाहिए, हालांकि लोकपाल में रिजर्वेशन के सवाल पर मतभेद कायम हैं।
इसमें सीबीआई की स्वतंत्रता का काफी ध्यान रखा गया है, जिसमें सीबीआई का जो अफसर जांच कर रहा होगा उसका तबादला नहीं किया जाएगा।
लोकपाल पर राज्यसभा की प्रवर समिति ने लोकायुक्तों के गठन को लोकपाल विधेयक से अलग करने की सिफारिश की है। संप्रग के कुछ सहयोगी दलों के साथ विपक्षी दल इस प्रावधान पर कड़ा विरोध जता रहे थे।
हालांकि ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक, 2011’ पर राज्यसभा की प्रवर समिति ने कहा कि राज्य सरकारों को उक्त कानून बनने के एक साल के भीतर राज्य विधानसभा द्वारा कानून पारित करके अपने खुद के लोकायुक्त बनाने होंगे।
समिति की सिफारिश को विपक्षी दलों और संप्रग के सहयोगी दलों की राय से बड़ी सहमति माना जा रहा है जिन्होंने इस लोकपाल विधेयक में लोकायुक्तों वाले प्रावधान को संघीय ढांचे पर हमला करार देते हुए कहा कि राज्य सरकारों को राज्यस्तरीय लोकायुक्त के संबंध में अपना खुद का कानून पारित करने की आजादी होनी चाहिए।
लोकसभा से पारित लोकपाल विधेयक पिछले शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में अटक गया था। इसमें प्रावधान था कि इस केंद्रीय कानून के तहत हर राज्य में लोकायुक्त का गठन होना चाहिए।
कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी की अध्यक्षता वाली समिति को इस साल मई में विस्तार से पड़ताल के लिए विधेयक को भेजा गया था।
समिति ने अपनी मसौद रिपोर्ट को मंजूर किया। समझा जाता है कि समिति ने ‘आरक्षण’ से जुड़े प्रावधान में किसी तरह के बदलाव की सिफारिश नहीं की है। मूल प्रावधान में कहा गया है कि ‘लोकपाल के सदस्यों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिला सदस्य 50 प्रतिशत से कम नहीं होंगे।’
रिपोर्ट के मुताबिक, ‘इन प्रावधानों का मकसद महज लोकपाल की संस्था में समाज के विविध वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।’
भाजपा को इस प्रावधान को लेकर कड़ी आपत्ति है और समझा जाता है कि उसने इस बैठक में इसका विरोध करते हुए ‘सुझाव पत्र’ दिया है।
सेलेक्ट कमेटी ने यह सिफारिश भी की है कि लोकपाल पास होने के सालभर के भीतर सभी राज्यों में एक लोकायुक्त होना चाहिए, हालांकि लोकपाल में रिजर्वेशन के सवाल पर मतभेद कायम हैं।
इसमें सीबीआई की स्वतंत्रता का काफी ध्यान रखा गया है, जिसमें सीबीआई का जो अफसर जांच कर रहा होगा उसका तबादला नहीं किया जाएगा।
लोकपाल पर राज्यसभा की प्रवर समिति ने लोकायुक्तों के गठन को लोकपाल विधेयक से अलग करने की सिफारिश की है। संप्रग के कुछ सहयोगी दलों के साथ विपक्षी दल इस प्रावधान पर कड़ा विरोध जता रहे थे।
हालांकि ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक, 2011’ पर राज्यसभा की प्रवर समिति ने कहा कि राज्य सरकारों को उक्त कानून बनने के एक साल के भीतर राज्य विधानसभा द्वारा कानून पारित करके अपने खुद के लोकायुक्त बनाने होंगे।
समिति की सिफारिश को विपक्षी दलों और संप्रग के सहयोगी दलों की राय से बड़ी सहमति माना जा रहा है जिन्होंने इस लोकपाल विधेयक में लोकायुक्तों वाले प्रावधान को संघीय ढांचे पर हमला करार देते हुए कहा कि राज्य सरकारों को राज्यस्तरीय लोकायुक्त के संबंध में अपना खुद का कानून पारित करने की आजादी होनी चाहिए।
लोकसभा से पारित लोकपाल विधेयक पिछले शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में अटक गया था। इसमें प्रावधान था कि इस केंद्रीय कानून के तहत हर राज्य में लोकायुक्त का गठन होना चाहिए।
कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी की अध्यक्षता वाली समिति को इस साल मई में विस्तार से पड़ताल के लिए विधेयक को भेजा गया था।
समिति ने अपनी मसौद रिपोर्ट को मंजूर किया। समझा जाता है कि समिति ने ‘आरक्षण’ से जुड़े प्रावधान में किसी तरह के बदलाव की सिफारिश नहीं की है। मूल प्रावधान में कहा गया है कि ‘लोकपाल के सदस्यों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिला सदस्य 50 प्रतिशत से कम नहीं होंगे।’
रिपोर्ट के मुताबिक, ‘इन प्रावधानों का मकसद महज लोकपाल की संस्था में समाज के विविध वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।’
भाजपा को इस प्रावधान को लेकर कड़ी आपत्ति है और समझा जाता है कि उसने इस बैठक में इसका विरोध करते हुए ‘सुझाव पत्र’ दिया है।
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