देश में कोरोनावायरस के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. आंकड़ा दो लाख के करीब पहुंच गया है. वायरस को खत्म करने की दिशा में टेस्टिंग होनी बहुत जरूरी है, जोकि जरूरत के हिसाब से नहीं हो पा रही. ऐसे में CSIR यानी Council of Scientific & Industrial Research ने एक टेस्टिंग टेक्नोलॉजी विकसित की है, जो टेस्टिंग के क्षेत्र में बड़ा राहत बन सकती है. CSIR की इस नई टेस्टिंग किट से एक साथ कम से कम 50 हज़ार तक की बड़ी आबादी का कोरोना टेस्ट डेढ़ से दो दिनों में किया जा सकेगा. वहीं ये किट दूसरे माध्यमों से ज्यादा सस्ती भी होगी.
हैदराबाद के सेन्टर फ़ॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के लैब ने नेक्स्ट जेनेरेशन सिक्वेंसिंग टेक्नोलॉजी के सहारे इस खोज को अंजाम दिया है. शुरुआती सफलता मिल चुकी है और टेस्टिंग जारी है. इस टेस्ट की तकनीक को अंतिम रूप देने को लेकर हैदराबाद के सेन्टर फ़ॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी ने बेंगलुरु के एक कंपनी सिंजिन से हाथ मिलाया है जिनसे लोगिस्टिक मदद मिलेगी. बताया जा रहा है कि 2-4 हफ़्तों में ये तकनीक रेगुलेटर के अप्रूवल के लिए लाई जाएगी.
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CSIR के डायरेक्टर-जनरल डॉक्टर शेखर मांडे ने बताया कि संस्था ने कोरोना की जांच के लिए दो टेस्टिंग किट तैयार कर ली हैं. उन्होंने बताया कि यह टेस्टिंग किट RT PCR (Reverse transcription polymerase chain reaction) से ज्यादा सस्ती है. उन्होंने बताया कि CSIR के दिल्ली स्थित IGIB (Institute of Genomics and Integrative Biology) ने फेलूदा किट तैयार किया है. TATA Sons कंपनी इसको manufacture कर रही है. इसके लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ एक MoU (समझौता पत्र) पर साइन हुए हैं. RT LAMP को जम्मू की लैब ने बनाया है. डॉक्टर मांडे ने बताया कि 'अब ये रेगुलेटर के पास अप्रूवल के लिए आने वाली है उसके बाद इसे फील्ड में ले जाया जाएगा.'
500-600 रुपए तक में हो जाएगी टेस्टिंग
CSIR की यह टेस्टिंग किट काफी सस्ती भी है. उन्होंने बताया कि दोनों किट से 500 रुपए तक में टेस्ट मुमकिन हो पाएगा और RT PCR से जल्दी हो जाएगा. एक टेस्ट करने में 500-600रु लगेंगे और 10 हज़ार-50 हज़ार टेस्ट करने में सैंपल से लेकर रिजल्ट बताने तक में 30-35 घंटे लगेंगे. मतलब डेढ़ दो दिन का टाइम लगेगा इसमें.
उन्होंने यह भी कहा कि कोशिश चल रही है कि एक साथ 50,000 सैंपल भी लिए जा सके. उन्होंने कहा, 'इसके अलावा हमें अगर एक साथ 50 हजार सैंपल भी लेने हों तो कोशिश चल रही है. CCMB (Centre for Cellular and Molecular Biology) हैदराबाद इस पर काम कर रही है.' उन्होंने बताया कि सिक्वेंसिंग के जरिए ये मुमकिन हो सकता है. उन्होंने कहा कि 'इसका इस्तेमाल ऐसी किसी जगह किया जा सकता है, जैसे किसी शहर में कहीं पर कोरोना का आउटब्रेक हो रहा है तो क्या सभी का टेस्ट कर पाएंगे? वहां इसकी उपयोगिता है.'
एक साथ 50,000 टेस्टिंग के लिए बन रही है स्ट्रेटेजी
डॉ मांडे ने कहा, 'एक स्ट्रेटेजी हमलोगों की चल रही है कि अगर टेस्टिंग बहुत बड़े स्तर पर करनी हो एक साथ अगर 50 हज़ार सैंपल करने हों तो उसके लिए सब सैंपल को इकट्ठा करके हर सैंपल को हम एक टैग लगाते हैं जिसे बारकोडिंग कहते हैं और फिर बाद में उसका सिक्वेंसिंग करें तो ये प्रयास ज़रूर चल रहा है.'
टेस्टिंग प्रक्रिया की जानकारी देते हुए CSIR-CCMB के डायरेक्टर डॉ राकेश मिश्रा ने बताया, 'हम एक प्लेट लेते हैं जिसमें बहुत सारे बेल्स रहते हैं. उसमें हम बार कोडेड ओलेगोज़ डालते हैं और सैंपल की शुरू की प्रोसेसिंग उसमें होती है एक सैंपल एक वेल में. बारकोडिंग की वजह से सैंपल भी कोड हो जाता है. इसके बाद सैंपल को मिक्स करके लैब में लाया जाएगा. जहां पर नेक्स्ट जेनेरेशन सिक्वेंसिंग का इस्तेमाल करके इन सैंपल का सीक्वेंस करेंगे.'
कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर सरकारों की खासा चिंता हॉटस्पॉट्स या कन्टेनमेंट ज़ोन्स को लेकर हैं. जहां बड़ी आबादी संक्रमित हो रही है और उनके टेस्टिंग से लेकर उनको आइसोलेट करने की चुनौती के बीच ये तकनीक मददगार साबित होगी.
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