
नई दिल्ली:
देश के 69वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए नारे 'स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया' को भले ही अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने सुर्खियों में जगह दे दी हो, लेकिन अपने ही देश के दक्षिण में लगभग तुरंत ही आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया, और देखते ही देखते #StopHindiImposition (हिन्दी को थोपना बंद करो) हैशटैग ट्रेंड करने लगा।
टेक एक्सपर्ट, ब्लॉगरों और अन्य प्रोफेशनलों के एक समूह PLE Bengaluru (Promote Linguistic Equality) ने इस हैशटैग की ज़िम्मेदारी ली, और कहा कि वे केंद्र सरकार द्वारा 'हिन्दी को थोपे जाने' के खिलाफ हैं। PLE Bengaluru के सदस्य वलिश कुमार ने कहा, "देश के सिर्फ 25 फीसदी लोग हिन्दी बोलते हैं... तो प्रधानमंत्री क्यों सिर्फ उनके लिए बोल रहे हैं..."
PLE का यह विरोध सोशल मीडिया पर काफी तेज़ी से फैला और ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी शिकायतें आने लगीं कि महत्वपूर्ण पोस्टर और बैनर वगैरह अंग्रेज़ी या हिन्दी में ही होते हैं, स्थानीय भाषा में नहीं।
कर्नाटक के अरुण जवगल ने बेंगलुरू से मैसूर तक की एक ट्रेन टिकट की तस्वीर ट्वीट की है, जिस पर अंग्रेज़ी और हिन्दी में जानकारी दी गई है, परंतु कन्नड़ में नहीं।
जानी-मानी शिक्षाविद विभा पार्थसारथी ने कहा कि हिन्दी का विरोध संतुलित होना चाहिए - अगर इसका विकल्प अंग्रेज़ी है, तो उसे तो और भी कम लोग समझते हैं... NDTV से बातचीत में उनका कहना था, "क्या ज़्यादा लोग बॉलीवुड फिल्में नहीं समझते...? तो फिर वे सिर्फ सरकार की भाषा का विरोध क्यों करते हैं...? सभी को जोड़ने वाली कोई एक भारतीय भाषा होनी ही चाहिए, और आज की तारीख में (पहले की तुलना में) हिन्दी समझने वालों की तादाद कहीं ज़्यादा है..."
लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर अपूर्वानंद इस बात से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, "अगर बहुत थोड़े लोग भी हिन्दी का विरोध कर रहे हैं, तो इस पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए... प्रधानमंत्री के भाषण का साथ-साथ ही सभी भाषाओं में अनुवाद क्यों नहीं होना चाहिए...?"
बहरहाल, बेंगलुरू के स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रवीण कुमार के मुताबिक, सारा मुद्दा अपना परिप्रेक्ष्य खोता जा रहा है। उन्होंने कहा, "क्या नई भाषा सीखने से हमें फायदा हीं होता...? मैं बस इतना जातना हूं कि अगर में उत्तर भारत जाकर हिन्दी में कोई चुटकुला सुनाऊंगा, तो ज़्यादा लोग हंसेंगे..."
टेक एक्सपर्ट, ब्लॉगरों और अन्य प्रोफेशनलों के एक समूह PLE Bengaluru (Promote Linguistic Equality) ने इस हैशटैग की ज़िम्मेदारी ली, और कहा कि वे केंद्र सरकार द्वारा 'हिन्दी को थोपे जाने' के खिलाफ हैं। PLE Bengaluru के सदस्य वलिश कुमार ने कहा, "देश के सिर्फ 25 फीसदी लोग हिन्दी बोलते हैं... तो प्रधानमंत्री क्यों सिर्फ उनके लिए बोल रहे हैं..."
PLE का यह विरोध सोशल मीडिया पर काफी तेज़ी से फैला और ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी शिकायतें आने लगीं कि महत्वपूर्ण पोस्टर और बैनर वगैरह अंग्रेज़ी या हिन्दी में ही होते हैं, स्थानीय भाषा में नहीं।
कर्नाटक के अरुण जवगल ने बेंगलुरू से मैसूर तक की एक ट्रेन टिकट की तस्वीर ट्वीट की है, जिस पर अंग्रेज़ी और हिन्दी में जानकारी दी गई है, परंतु कन्नड़ में नहीं।
Bangalore to mysore railway ticket without Kannada. #StopHindiImposition pic.twitter.com/wfJWDrwNkI
— Arun Javgal (@ajavgal) August 15, 2015
जानी-मानी शिक्षाविद विभा पार्थसारथी ने कहा कि हिन्दी का विरोध संतुलित होना चाहिए - अगर इसका विकल्प अंग्रेज़ी है, तो उसे तो और भी कम लोग समझते हैं... NDTV से बातचीत में उनका कहना था, "क्या ज़्यादा लोग बॉलीवुड फिल्में नहीं समझते...? तो फिर वे सिर्फ सरकार की भाषा का विरोध क्यों करते हैं...? सभी को जोड़ने वाली कोई एक भारतीय भाषा होनी ही चाहिए, और आज की तारीख में (पहले की तुलना में) हिन्दी समझने वालों की तादाद कहीं ज़्यादा है..."
लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर अपूर्वानंद इस बात से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, "अगर बहुत थोड़े लोग भी हिन्दी का विरोध कर रहे हैं, तो इस पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए... प्रधानमंत्री के भाषण का साथ-साथ ही सभी भाषाओं में अनुवाद क्यों नहीं होना चाहिए...?"
बहरहाल, बेंगलुरू के स्टैंड-अप कॉमेडियन प्रवीण कुमार के मुताबिक, सारा मुद्दा अपना परिप्रेक्ष्य खोता जा रहा है। उन्होंने कहा, "क्या नई भाषा सीखने से हमें फायदा हीं होता...? मैं बस इतना जातना हूं कि अगर में उत्तर भारत जाकर हिन्दी में कोई चुटकुला सुनाऊंगा, तो ज़्यादा लोग हंसेंगे..."
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