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Screen Time Risk: बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम बन सकता है खतरे की घंटी, डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी

Screen Time Risk: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल और टीवी बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं. कई बार माता-पिता बच्चों को व्यस्त रखने या शांत करने के लिए उन्हें स्क्रीन दे देते हैं. लेकिन अब डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने इसे लेकर गंभीर चेतावनी दी है. उनका कहना है कि कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है.

Screen Time Risk: बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम बन सकता है खतरे की घंटी, डॉक्टरों ने दी सख्त चेतावनी
Screen Time Risk
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Screen Time Risk: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल और टीवी बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं. कई बार माता-पिता बच्चों को व्यस्त रखने या शांत करने के लिए उन्हें स्क्रीन दे देते हैं. लेकिन अब डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने इसे लेकर गंभीर चेतावनी दी है. उनका कहना है कि कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है. 

शुरुआती उम्र में स्क्रीन से दूरी क्यों जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार, जन्म से लेकर 18 महीने तक के बच्चों को मोबाइल, टीवी या किसी भी तरह की स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए. इस समय बच्चों का दिमाग बहुत तेजी से विकसित होता है. ऐसे में स्क्रीन का ज्यादा उपयोग उनके प्राकृतिक सीखने और समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. इस उम्र में बच्चों को माता-पिता के साथ संवाद, खेल और भावनात्मक जुड़ाव की ज्यादा जरूरत होती है.

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भाषा और व्यवहार पर पड़ सकता है असर

डॉक्टरों का मानना है कि ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता कमजोर हो सकती है. इसके साथ ही उनका सामाजिक व्यवहार भी प्रभावित हो सकता है. कई बार ऐसे बच्चों में ऐसे लक्षण दिखते हैं जो ऑटिज्म (Autism) जैसे लग सकते हैं, हालांकि इसे सीधे तौर पर इसका कारण नहीं माना जाता.

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छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित रखना जरूरी

18 महीने से 6 साल तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम बहुत सीमित होना चाहिए. इस उम्र में बच्चों को ज्यादा से ज्यादा आउटडोर गेम्स, किताबें पढ़ना, कहानी सुनना और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए. इससे उनका मानसिक और भावनात्मक विकास बेहतर होता है और उनकी सीखने की क्षमता भी बढ़ती है.

ऑटिज्म को लेकर जागरूकता बढ़ाना जरूरी

दुनियाभर में ऑटिज्म को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लक्षणों को समझना और समय पर पहचान करना बेहद जरूरी है. इससे बच्चों को सही समय पर सहायता मिल सकती है और उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है.

समय पर पहचान और परिवार की भूमिका अहम

डॉक्टरों के अनुसार, ऑटिज्म के शुरुआती संकेत 12 से 18 महीने की उम्र में ही दिख सकते हैं. ऐसे में माता-पिता को सतर्क रहना चाहिए और किसी भी असामान्य व्यवहार पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. साथ ही बच्चों के विकास में परिवार की भूमिका सबसे अहम होती है. सही देखभाल, समय और प्यार से बच्चों को बेहतर भविष्य दिया जा सकता है.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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