स्मोकिंग करने वाले लोग शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा पाते कि ये उनके शरीर को किस हद तक नुकसान पहुंचा रहा है. दरअसल, स्मोकिंग से हजारों जहरीले केमिकल सीधे सांस लेने वाले सिस्टम में पहुंचते हैं, जिससे नाजुक टिश्यू नष्ट हो जाते हैं और म्यूकस और गंदगी को बाहर निकालने वाले सिलिया (छोटे बाल) बेकार हो जाते हैं. इससे फेफड़ों पर हमेशा के लिए निशान पड़ जाते हैं, लगातार इन्फेक्शन होता है और ऑक्सीजन सोखने के लिए जरूरी एयर सैक्स (हवा की थैलियां) हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं. एक स्मोकर और नॉन स्मोकर की लंग्स क्षमता और उसकी बनावट में बहुत बड़ा फर्क होता है.
हाल में एक कंटेंट क्रिएटर ने अपने एक इंस्टाग्राम वीडियो में स्मोकिंग के खतरे को लेकर जो तथ्य पेश किए वो चौंकाने वाले थे. आशु घई नाम के इस क्रिएटर ने एक स्मोकर के चेस्ट का स्कैन करवाया, जो बीते 10 सालों से स्मोकिंग कर रहा है. साथ ही उनसे खुद का भी चेस्ट स्कैन करवाया, जिसने कभी जीवन में स्मोकिंग नहीं की.
यहां देखिए वीडियो...
स्मोकर और नॉन स्मोकर के लंग्स में अंतर
इस स्कैन के जो नतीजे आए वो चौंकाने वाले थे. क्रिएटर, जिसने कभी स्मोकिंग नहीं की, स्कैन में उनके लंग्स बिल्कुल सामान्य दिखे. वहीं स्मोकर के लंग्स का स्कैन चौंकाने वाला था. उसके लंग्स में जगह-जगह सिस्ट जमा दिखे. साथ ही उसके लंग्स का साइज भी सामान्य से बड़ा दिखा. डॉक्टरों ने बताया कि फेफड़ों में दिख रहे सिस्ट, लंग्स की क्षमता को कम करते हैं और ये बड़े इंफेक्शन की वजह बन सकते हैं.
साथ ही लंग्स का साइज बड़ा होना, लंग्स हाइपर इंफ्लेमेशन के लक्षण हैं. डॉक्टर के मुताबिक, ऐसा तब होता है जब फेफड़े अपनी इलास्टिसिटी खो लेते हैं. यानी लंग्स के एल्वियोलर सैक (Alveolar sacs) की क्षमता कम हो गई है.
एल्वियोलर सैक (Alveolar Sacs) क्या है?
एल्वियोलर सैक (Alveolar sacs) फेफड़ों में ब्रोंकियोल्स के बिल्कुल आखिर में होते हैं. ये लाखों बहुत छोटी-छोटी कैविटीज से बने होते हैं जिन्हें एल्वियोली (alveoli) कहा जाता है. ये तेजी से और कुशलता से गैसों के आदान-प्रदान के लिए बहुत बड़ी सतह यानी surface area उपलब्ध कराते हैं.
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