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प्राइवेट अस्पतालों में बढ़े ऑपरेशन से प्रसव, दिल्ली समेत 18 राज्यों का ये हाल, NFHS की रिपोर्ट से ख़ुलासा

C Section Delivery Rates: भारत में सिजेरियन डिलीवरी यानी ऑपरेशन से प्रसव के मामले तेजी से बढ़े हैं. इस आर्टिकल में जानें WHO के मुताबिक किसी भी देश में सी-सेक्शन की दर कितनी होनी चाहिए.

प्राइवेट अस्पतालों में बढ़े ऑपरेशन से प्रसव, दिल्ली समेत 18  राज्यों का ये हाल, NFHS की रिपोर्ट से ख़ुलासा
C Section Delivery: प्राइवेट अस्पतालों में क्यों बढ़ रहे हैं ऑपरेशन.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में सिजेरियन डिलीवरी तेजी से बढ़ रही है. देश के प्राइवेट अस्पतालों में होने वाले प्रसव में से आधे से ज्यादा यानी करीब 54 प्रतिशत डिलीवरी अब सी-सेक्शन के जरिए हो रही हैं.  अगर राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल के प्राइवेट अस्पतालों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा 87.7 प्रतिशत है. इसके बाद तेलंगाना में 84 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 66 प्रतिशत प्रसव ऑपरेशन से हुए. असम में यह 81.4 प्रतिशत और ओडिशा में 76.8 प्रतिशत है. देश के 27 राज्यों और दिल्ली-जम्मू कश्मीर जैसे बड़े केंद्र शासित प्रदेशों में से 18 में हालात ऐसे हैं कि प्राइवेट अस्पतालों में आधे से ज्यादा प्रसव ऑपरेशन से ही हो रहे हैं.

​अगर सरकारी और प्राइवेट दोनों को मिला दें, तो भी कुल प्रसव में तेलंगाना में 62 प्रतिशत से ज्यादा और आंध्र प्रदेश में 52 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे सी-सेक्शन से पैदा हो रहे हैं. वहीं पश्चिम बंगाल में यह कुल आंकड़ा 44.5 प्रतिशत है. जम्मू-कश्मीर के प्राइवेट अस्पतालों में तो करीब 90 प्रतिशत डिलीवरी ऑपरेशन से हुईं, जबकि वहां के सरकारी अस्पतालों में भी यह 49 प्रतिशत रहा. चूंकि जम्मू-कश्मीर में 80 प्रतिशत प्रसव सरकारी अस्पतालों में होते हैं, इसलिए वहां का कुल औसत भी आधे से ज्यादा बैठता है.

​सालों में कैसे बदला ग्राफ?

  1. भारत में पिछले दो दशकों में सी-सेक्शन का ग्राफ लगातार ऊपर गया है-
  2. ​2004-05: सिर्फ 8.5 प्रतिशत कुल प्रसव सी-सेक्शन से थे.
  3. ​2015-16: यह बढ़कर 17.2 प्रतिशत हुआ.
  4. ​2019-21: आंकड़ा 21.5 प्रतिशत तक पहुंचा.
  5. ​2023-24: अब देशभर में कुल 27.2 प्रतिशत प्रसव सी-सेक्शन से हो रहे हैं.

​राहत की बात यह है कि सरकारी अस्पतालों में यह बढ़ोतरी काफी धीमी रही है.  वहां 2005-06 में सिजेरियन दर 15.2 प्रतिशत थी, जो अब मामूली बढ़त के साथ 16.9 प्रतिशत तक पहुंची है.

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​कम सिजेरियन दर भी क्यों है चिंता की बात?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मानता है कि किसी भी देश में 10 से 15 प्रतिशत सिजेरियन दर सामान्य है. इसके उलट बिहार (13%), झारखंड (16%), और मध्य प्रदेश (16%) जैसे राज्यों में यह दर बहुत कम है. राजस्थान में भी ऐसी ही स्थिति है. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि यहां कम आंकड़ा होना कोई अच्छी बात नहीं है. यह इस बात का इशारा है कि इन राज्यों के सरकारी अस्पतालों में आज भी जरूरत पड़ने पर इमरजेंसी ऑपरेशन की पूरी सुविधा नहीं मिल पा रही है, जिससे वहां मातृ मृत्यु दर (मां की मौत का आंकड़ा) भी ज्यादा है.

​अगर अन्य देशों से तुलना करें, तो अमेरिका में यह दर 32 प्रतिशत, ब्रिटेन में 45 प्रतिशत, ब्राजील में 52 प्रतिशत और लैटिन अमेरिकी देशों में 42 प्रतिशत से ज्यादा है. वहीं स्वीडन (19%) और नॉर्वे (16%) जैसे देशों में बेवजह के ऑपरेशन को रोकने पर बहुत जोर दिया जाता है. फ्रांस में यह करीब 21 प्रतिशत है.

​पहले बच्चे और जन्म के अंतर से जुड़े अहम आंकड़े-

साल 2024 की नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) रिपोर्ट से कुछ और दिलचस्प बातें सामने आई हैं. देश में पैदा होने वाले बच्चों में से करीब 66.4 प्रतिशत बच्चे अपने परिवार के 'पहले बच्चे' थे. अब चौथे या उससे ज्यादा नंबर के बच्चों का जन्म घटकर सिर्फ 3.5 प्रतिशत रह गया है. वहीं दूसरे बच्चे का प्रतिशत 23 और तीसरे का 7.3 प्रतिशत रहा.

​बच्चों के बीच सही अंतर और शिक्षा- 

रिपोर्ट बताती है कि देश में 53.5 प्रतिशत दूसरे या उसके बाद के बच्चे, अपने बड़े भाई-बहन के जन्म के कम से कम 36 महीने (3 साल) बाद पैदा हुए. सिर्फ 1.4 प्रतिशत मामले ऐसे थे जहां दो बच्चों के बीच 10 से 12 महीने का ही अंतर था. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, दो बच्चों में कम अंतर होने से बच्चों में डायरिया, सांस की बीमारी और कुपोषण का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है.

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)

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