AI Summit 2026: दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाएं आज कई चुनौतियों से जूझ रही हैं, मरीजों की बढ़ती संख्या, डॉक्टरों और नर्सों की कमी, इलाज की बढ़ती जटिलता और सीमित संसाधन. ऐसे समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) केवल एक तकनीकी विकल्प नहीं, बल्कि एक जरूरत बनकर उभर रहा है. भारत में आयोजित भारत AI प्रभाव शिखर सम्मेलन 2026 में यह साफ संदेश दिया गया कि आने वाले सालों में एआई का सबसे बड़ा प्रभाव स्वास्थ्य क्षेत्र में दिखाई देगा.
रॉय जैकब्स, सीईओ, रॉयल फिलिप्स ने इंडिया एआई इंपैक्ट समिट 2026 में कहा कि दुनिया के ओवरबर्डन हेल्थ सिस्टम्स के पास एआई को अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. उनके अनुसार, बढ़ती मांग और हेल्थ वर्कफोर्स की कमी ने एआई को सिर्फ अवसर नहीं, बल्कि अनिवार्यता बना दिया है.
तकनीक तभी सफल जब क्लिनिकल जरूरतों से जुड़ी हो
रॉय जेकब्स ने यह भी साफ किया कि एआई अकेले हेल्थकेयर को नहीं बदल सकता. तकनीक को क्लिनिकल जरूरतों और वर्कफ्लो के साथ जोड़ना जरूरी है. मजबूत डेटा गवर्नेंस, सुरक्षित डेटा हैंडलिंग और साफ उपयोग के मामले (use cases) एआई की सफलता की कुंजी हैं.
उन्होंने कहा कि हेल्थकेयर भरोसे पर चलता है. इसलिए एआई सिस्टम पारदर्शी, समझाने योग्य (explainable) और लगातार सत्यापित होने चाहिए, ताकि डॉक्टरों और मरीजों का विश्वास बना रहे.
भारत के डिजिटल हेल्थ प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने आयुष्मान भारत योजना का उल्लेख किया, जो इंटरऑपरेबल डेटा सिस्टम और बड़े लेवल पर निरंतर देखभाल की मजबूत नींव तैयार कर रहा है. उनके अनुसार, यही वह आधार है जिसकी एआई को जरूरत है.

ऑल-इन्क्लूसिव इंटेलिजेंस की सोच
सेशन में केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिय पटेल ने कहा कि भारत में एआई को सर्व-समावेशी बुद्धिमत्ता (All-Inclusive Intelligence) के रूप में देखा जाना चाहिए. इसका असली मूल्य इस बात से तय होगा कि यह कितनी जिंदगियां बेहतर बनाता है और स्वास्थ्य असमानताओं को कितना कम करता है. उन्होंने बताया कि एआई-सक्षम मीडिया रोग निगरानी प्रणाली 13 भाषाओं में रोग रुझानों की निगरानी कर रियल-टाइम अलर्ट देता है, जिससे महामारी की तैयारी मजबूत होती है.
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने वन हेल्थ मिशन के तहत एआई बेस्ड जीनोमिक सर्विलांस टूल्स विकसित किए हैं, जो जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों की पहले से पहचान कर सकते हैं.
टीबी के खिलाफ एआई की ताकत
भारत में टीबी कंट्रोल के लिए एआई-सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीनों और कंप्यूटर-एडेड डिटेक्शन टूल्स ने लगभग 16% एक्स्ट्रा मामलों की पहचान में मदद की है. वहीं, एआई आधारित प्रेडिक्शन टूल्स ने नकारात्मक उपचार परिणामों में 27% तक कमी लाई है.
संसाधन-सीमित परिस्थितियों में ऐसे समाधान स्केलेबल और किफायती होने चाहिए. इसी दिशा में सरकार ने एम्स दिल्ली, पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ और एम्स ऋषिकेश में एआई के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किए हैं.
एआई डॉक्टर का विकल्प नहीं, सहायक है
NITI Aayog के सदस्य VK Paul ने कहा कि एआई यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज की दिशा में रणनीतिक अवसर प्रदान करता है. हालांकि, सभी वक्ताओं ने एक बात पर सहमति जताई एआई डॉक्टरों की जगह नहीं ले सकता. यह केवल उनकी क्षमता को बढ़ाने का उपकरण है. मशीनें डेटा विश्लेषण कर सकती हैं, लेकिन सहानुभूति, करुणा और संवाद की कला केवल इंसान में ही होती है.
अंत में यही संदेश उभरकर आया कि एआई को पायलट प्रोजेक्ट से आगे बढ़ाकर पूरे सिस्टम में एकीकृत करना होगा. मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, साफ नियम और सार्वजनिक-निजी साझेदारी के साथ, भारत न केवल अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बना सकता है, बल्कि दुनिया को भी नई दिशा दिखा सकता है. एआई का भविष्य हेल्थकेयर में है और भारत इस बदलाव की अगुवाई करने के लिए तैयार है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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