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This Article is From May 05, 2017

वो 5 फिल्में जिनके दमदार महिला किरदारों को हजम नहीं कर पाया सेंसर बोर्ड...

कहते हैं सिनेमा समाज का चेहरा है, समाज का आईना है. तो यह भी साफ है कि जो चीजे हम सिनेमा में गलत मानते हैं, वही असल जीवन में भी समाज में गलत होंगी या अस्वीकार्य होंगी... और सिनेमा का यह सही गलत तय करता है हमारा सेंसर बोर्ड.

वो 5 फिल्में जिनके दमदार महिला किरदारों को हजम नहीं कर पाया सेंसर बोर्ड...
कहते हैं सिनेमा समाज का चेहरा है, समाज का आईना है. तो यह भी साफ है कि जो चीजे हम सिनेमा में गलत मानते हैं, वही असल जीवन में भी समाज में गलत होंगी या अस्वीकार्य होंगी... और सिनेमा का यह सही गलत तय करता है हमारा सेंसर बोर्ड.

अगर सेंसर बोर्ड के सदस्यों को लगता है कि किसी फिल्म में महिला का किरदार कमजोर है या उसे मारते, पिटते, प्रताडि़त होते या किसी की शारीरिक भूख का शिकार होते हुए दिखाया गया है, तो उसे इससे कोई दिक्कत नहीं होती. फिल्म को पास कर दिया जाता है. लेकिन अगर महिला किरदार दमदार होता है, जो अपने हकों (ये हक जब भी उसकी शारीरिक जरूरतों से जुड़े होते हैं) की लड़ाई करता है, तो शायद सेंसर बोर्ड को ऐसी महिलाएं पसंद नहीं आतीं. और उन फिल्मों पर बैन लगा दिया जाता है..

एक नजर उन महिला प्रधान और महिलाओं के दमदार किरदारों से सजी फिल्मों पर जिनमें महिलाओं के दमदार अंदाज को बर्दाश्त न कर पाने के चलते सेंसर बोर्ड ने की उनमें बदलाव की सिफारिश...

एंग्री इंडियन गॉडेसेज़

2015 में बनी इस फिल्म की कहानी कुछ युवतियों के इर्द गिर्द घूमती है. फिल्म में महिलाओं को खुलकर एंजॉय करती हैं. लेकिन सेंसर बोर्ड को महिलाओं की इतनी ओपननेस शायद पसंद नहीं आई और फिल्म में 16 कट लगाने का ऑर्डर दिए गए.



लिपस्टिक अंडर माई बुर्का

अपनी आजादी तलाशती चार औरतों की इस कहानी को तो सेंसर बोर्ड ने बैन ही कर दिया. सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर रोक लगाते हुए इसके बारे में कहा था कि क्योंकि यह फिल्म ‘महिला केंद्रित’ है. उनकी फैंटेसीज़ के बारे में है. इसमें सेक्सुअल सीन हैं, गालियां हैं, पॉर्नोग्राफिक ऑडियो है. इसलिए इस फिल्म को सर्टिफिकेशन के लिए अस्वीकृत किया जाता है.





अनफ्रीडम

साल 2015 में आई इस फिल्म यह फिल्म समलैंगिकता के मुद्दे को उठाती है. जिसमें दो युवतियों के बीच संबंध होते हैं. सेंसर ने पहली बार में ही इसे पास नहीं किया. मामले को अपीलिएट ट्राइब्यूनल के पास ले जाया गया, पर यह फिल्‍म भारत में बैन ही कर दी गई.




मार्गरीटा, विद अ स्ट्रॉ
 

2015 में ही एक और महिला प्रधान फिल्म सेंसर बोर्ड को पसंद नहीं आई. फिल्म का नाम था मार्गरीटा, विद अ स्ट्रॉ. फिल्म में लैला नाम की एक सेरेब्रल पाल्सी से पीडि़त लड़की की कहानी है. लैला चल नहीं सकती, वह व्हीलचेयर पर रहती है. उसे बोलने में भी परेशानी होती है. लेकिन दिक्कत यह है कि वह अपनी जिंदगी को और सामान्य लड़कियों की तरह जीना चाहती है. सेंसर ने इस फिल्म के एक सीन पर बहुत आपत्ति जताई,‍ जिसमें लैला के किरदार को शौच के लिए कोई दूसरा लेकर जाता है. इस पर फिल्म डायरेक्टर ने कहा था कि वह सीन किसी को लुभाने के लिए नहीं वास्तविकता बताने के लिए है. इस फिल्मी को भ्ज्ञी रिवाइजिंग कमिटी के पास ले जाना पड़ा था और फिर यह पास हुई थी.



पार्च्ड

तीन सहेलियों की यह कहानी काफी दमदार तरीके से पेश की गई. मर्दों की दुनिया में औरत किस तरह सहनशील बनी रहती है इस बात के साथ उसके अरमानों को भी पंख दिए गए. इस फिल्म में औरत और मर्द के संबंध को भी एक नई तरह पेश किया गया. लेकिन महिलाओ के इस दमदार और चुनौतीपूर्ण अवतार को सेंसर ने मंजूरी नहीं दी.




(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
लेखक के बारे में
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अनिता शर्मा
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