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गुरु प्रदोष व्रत आज, पूजा के बाद यहां से पढ़ें प्रदोष व्रत की कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष व्रत की कथा पढ़ने और सुनने से व्रत का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है. ऐसे में अगर आप भी आज उपवास करने वाले हैं, तो पूजा के दौरान यहां से गुरु प्रदोष व्रत की संपूर्ण कथा का श्रवण कर सकते हैं.

गुरु प्रदोष व्रत आज, पूजा के बाद यहां से पढ़ें प्रदोष व्रत की कथा
प्रदोष व्रत की कथा
(Photo Credit: NDTV)

आज यानी 24 सितंबर को गुरु प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को विशेष माना जाता है. यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है. गुरुवार के दिन पड़ने पर प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है. इस दिन भक्त भोलेनाथ के नाम का व्रत रखते हैं और प्रदोष काल में विधि-विधान से भगवान शिव-माता पार्वती की पूजा करते हैं. पूजा में व्रत कथा जरूर पढ़ी जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष व्रत की कथा पढ़ने और सुनने से व्रत का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है. ऐसे में अगर आप भी आज उपवास करने वाले हैं, तो पूजा के दौरान यहां से गुरु प्रदोष व्रत की संपूर्ण कथा का श्रवण कर सकते हैं.

पूजा के बाद यहां से पढ़ें प्रदोष व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. इस युद्ध में देवराज इंद्र के नेतृत्व में देवताओं ने असुरों को हरा दिया. लेकिन अपनी सेना की हार देखकर दैत्यराज वृत्रासुर बहुत क्रोधित हो गया. उसने अपनी मायावी शक्ति से ऐसा भयानक रूप धारण किया कि उसे देखकर देवता भी डर गए. वृत्रासुर की शक्ति के सामने देवताओं को अपनी हार का डर सताने लगा. परेशान होकर सभी देवता देवगुरु बृहस्पति के पास पहुंचे और वृत्रासुर को हराने का रास्ता पूछने लगे.

तब देवगुरु बृहस्पति ने वृत्रासुर से जुड़ी एक पुरानी कहानी सुनाई. उन्होंने बताया कि वृत्रासुर अपने पिछले जन्म में एक राजा था. उसका नाम चित्ररथ था. राजा चित्ररथ धार्मिक स्वभाव का था. वह अपनी प्रजा का ध्यान रखता था और भगवान शिव का भी भक्त था.

एक दिन राजा चित्ररथ अपने दिव्य विमान से कैलाश पर्वत के ऊपर से गुजर रहा था. उसी समय उसकी नजर भगवान शिव की सभा पर पड़ी. वहां माता पार्वती भगवान शिव के वाम अंग पर विराजमान थीं. चित्ररथ ने उस दृश्य को देखकर उपहास करते हुए कहा, 'हे देवों के देव! हम जैसे सांसारिक लोग तो मोह-माया में फंसकर स्त्रियों के वश में रहते हैं, लेकिन देवताओं की सभा में ऐसा दृश्य हमने पहले कभी नहीं देखा.' 

चित्ररथ की यह बात सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने चित्ररथ को राक्षस योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया. इसी शाप के कारण आगे चलकर चित्ररथ का जन्म वृत्रासुर के रूप में हुआ. हालांकि, राक्षस योनि में जन्म लेने के बाद भी उसकी भगवान शिव के प्रति भक्ति बनी रही.

वृत्रासुर ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गंधमादन पर्वत पर कठोर तपस्या शुरू कर दी. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे वरदान दिया. इस वरदान के कारण ही वृत्रासुर बहुत शक्तिशाली और अजेय बन गया है. 

देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र से कहा कि वृत्रासुर को हराने के लिए केवल युद्ध करना काफी नहीं होगा. उन्होंने इंद्र को भगवान शिव की आराधना करने और श्रद्धा से गुरु प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी.

इंद्र ने बृहस्पति की बात मानी और पूरी श्रद्धा से प्रदोष व्रत रखा, प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा की. भगवान शिव की कृपा से इंद्र को अपनी खोई हुई शक्ति वापस मिल गईं. इसके बाद इंद्र और वृत्रासुर के बीच फिर भयंकर युद्ध हुआ. इस बार इंद्र ने वृत्रासुर को पराजित कर दिया. वृत्रासुर के अंत के बाद देवताओं को राहत मिली और देवलोक में फिर से शांति स्थापित हो गई.

मान्यता है कि गुरु प्रदोष का उपवास रखने और प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों को भी भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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