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Aarti: पूजा के अंत में आखिर क्यों की जाती है आरती? जानें इसकी सही विधि और धार्मिक महत्व

Aarti Kaise Ki Jaati Hai: किसी भी देवी या देवता की पूजा, कथा, हवन आदि के बाद आखिर आरती क्यों की जाती है? ईश्वर की पूजा में आरती करने के लाभ क्या हैं? किस विधि से आरती करने पर मिलता है पूजा का पूरा पुण्यफल, जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. 

Aarti: पूजा के अंत में आखिर क्यों की जाती है आरती? जानें इसकी सही विधि और धार्मिक महत्व
Aarti Rules: पूजा में आरती कब और कैसे की जाती है? 
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Aarti Kaise Karni Chahie: सनातन परंपरा में किसी भी देवी या देवता की पूजा करने के बाद आरती करने का विधान है. जिसे अक्सर आस्थावान लोग ढोल, मंजीरे, घंटा-घड़ियाल आदि के साथ बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ गाते हैं. आरती के बारे में मान्यता है कि यह देवी-देवताओं की साधना-आराधना में हुई भूलचूक से जुड़े दोष को मिटाती हुई पूजा को संपूर्ण बनाती है. जिस आरती को करने पर पूजा का पूरा पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे करने की क्या सही विधि आपको पता है? यदि नहीं तो आइए जानते हैं कि ईश्वर की आरती कब और कैसे करना चाहिए.

आरती के लिए पहले करें ये तैयारी

हिंदू मान्यता के अनुसार किसी भी देवी या देवता की आरती करने से पहले इससे जुड़ी सारी सामग्री इकट्ठा करके पास में रख लेना चाहिए. आरती के लिए एक प्लेट या छोटी थाली, एक या पांच बाती वाला दीपक, शुद्ध घी, रुई या फिर कलावा की बाती, कपूर, शुद्ध जल, पुष्प, आरती की पुस्तक आदि इकट्ठा करके रख लें. 

आरती कैसे करना चाहिए?

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हिंदू मान्यता के अनुसार एक थाल में रोली से स्वास्तिक बनाकर उस पर कुछ फूल और अक्षत डालें. फिर उस पर आरती का दीया जला कर रखें और शंख बजाएं. इसके बाद सबसे पहले अपने आराध्य देवी-देवता के चरणों में उसे चार बार घुमाएं, फिर नाभि के पास दो बार और अंत में एक बार देवी या देवता के सम्मुख आरती करना चाहिए. आरती को हमेशा घड़ी की दिशा में घुमाना चाहिए. ईश्वर की महिमा का गान करने वाली आरती को हमेशा पूरी श्रद्धा के साथ लय में तथा उंचे स्वर में गाना चाहिए. 

आरती के अंत में करे ये जरूरी काम

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आरती पूर्ण होने के बाद उसे देवता के सामने रखकर उस पर शुद्ध जल घुमा कर फेर दें. फिर उसकी लौ को देवता की तरफ दिखा करके प्रणाम करें. इसके बाद पूजा और आरती के लिए प्रयोग में लाए गये शुद्ध जल को सभी पर छिड़कें. इसके बाद आरती की ज्योति पर हाथ फेरकर अपने माथे से लगाएं और फिर अन्य लोगों को आरती ग्रहण करने के लिए कहें. आरती को हमेशा दोनों हाथ से ग्रहण करना चाहिए. भूलकर भी एक हाथ से आरती न ग्रहण करें. 

आरती खड़े होकर क्यों की जाती है

सनातन परंपरा में आरती को हमेशा खड़े होकर करने की परंपरा रही है. इस शास्त्रीय विधान के पीछे कई धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं. ईश्वर की आरती के दौरान खड़े होकर न सिर्फ हम अपने आराध्य को सम्मान देते हैं बल्कि यह उनके प्रति अपनी आस्था और समर्पण का एक प्रतीक भी होता है. हालांकि यह नियम बीमार और दिव्यांग आदि पर नहीं लागू होता है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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