- हिमंत-ओवैसी बहस, कानून नहीं बल्कि बहुसंख्यक राजनीति बनाम संवैधानिक सोच का टकराव दिखाती है.
- ऐसे बयान चुनावी ध्रुवीकरण बढ़ाते हैं और लोकतंत्र की समावेशी भावना पर सवाल खड़े करते हैं.
- संविधान भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए किसी धर्म की शर्त नहीं रखता. इसे आस्था नहीं बहुमत और संसद तय करती है.
देश के दो अलग-अलग क्षेत्रों के दो बड़े नेता असदुद्दीन ओवैसी और हिमंत बिस्व सरमा एक बार फिर न केवल चर्चा के केंद्र में बल्कि आमने सामने भी हैं. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के हालिया बयानों ने 'देश में संविधान' की अहमियत के पुराने सवाल को नए शब्द दे दिए हैं. फर्क बस इतना है कि इस बार मुद्दा सीधे प्रधानमंत्री पद तक जा पहुंचा है.
हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “मेरा ख्वाब है कि एक दिन हिजाब पहनने वाली बेटी इस देश की प्रधानमंत्री बने.”
महाराष्ट्र में 15 जनवरी को होने वाले नगर निगम चुनावों से पहले राज्य के सोलापुर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा था कि एक दिन हिजाब पहनने वाली महिला भारत की प्रधानमंत्री बनेगी क्योंकि देश का संविधान सभी समुदायों के लोगों को समान दर्जा देता है जबकि पाकिस्तान में ऐसा नहीं होता और वहां केवल एक ही धर्म के लोग सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर आसीन हो सकते हैं.
#WATCH | Solapur, Maharashtra | AIMIM president Asaduddin Owaisi yesterday said," The constitution of Pakistan clearly states that a person belonging to only one religion can become the Prime Minister of the country. Baba Sahib's constitution says that any citizen of India can… pic.twitter.com/5hIqToOxri
— ANI (@ANI) January 10, 2026
ओवैसी पर चौतरफा वार, हिमंत का आया जवाब
यह कोई चुनावी घोषणा नहीं थी, बल्कि एक संवैधानिक कल्पना थी- एक ऐसा सपना, जो बाबासाहेब आंबेडकर के दिए संविधान की सीमा में पूरी तरह संभव है. पर इसके जवाब में हिमंत बिस्व सरमा ने ये कह कर नई बहस पैदा कर दी कि, “संवैधानिक तौर पर कोई रोक नहीं है, लेकिन भारत का प्रधानमंत्री हमेशा एक हिन्दू व्यक्ति ही होगा.”
कांग्रेस के प्रवक्ता रह चुके बीजेपी प्रवक्ता प्रोफेसर गौरव वल्लभ बोले, "ओवैसी मुस्लिम महिला को पीएम नहीं बनाना चाहते हैं बल्कि हिजाब पहनने वाली महिला को बनाना चाहते हैं. उन्होंने यह नहीं कहा कि मुस्लिम महिला का प्रतिनिधित्व देश में हो, बल्कि कहा कि हिजाब वाली मुस्लिम महिला पीएम बने. यह व्यक्ति सिर्फ अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए मुस्लिम समुदाय को गुमराह करने की कोशिश करता है."
केंद्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार ने तो ओवैसी को चुनौती दे डाली. उन्होंने चुनौती दी कि वह अपनी पार्टी की प्रमुख पहले ऐसी महिला को बनाएं. बंडी संजय कुमार ने ये भी पूछा, "मजलिस में कितनी मुस्लिम महिलाएं वास्तविक निर्णय लेने वाले पदों पर हैं? नारे शून्य प्रतिनिधित्व को नहीं छिपा सकते."
उन्होंने कहा, "2018 के (विधानसभा चुनावों) में भारतीय जनता पार्टी ने इस पुराने शहर में एआईएमआईएम नेता अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ शहजादी सैयद को मैदान में उतारा था. उन्हें धमकाया गया, निशाना बनाया गया और हराया गया. यही उनका असली चेहरा है. आज शहजादी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में कार्यरत हैं."
Before dreaming of a Burqa-clad woman as Prime Minister of India, show the courage to make one the AIMIM chief.
— Bandi Sanjay Kumar (@bandisanjay_bjp) January 11, 2026
How many Muslim women has All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen actually given tickets to as MLAs or MPs?
How many Muslim women hold real decision-making posts in the…
बीजेपी नेता पूनम महाजन ने भी ओवैसी के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. वे बोलीं, "ओवैसी की राजनीति पूरी तरह 'बांटो और राज करो' की नीति पर आधारित है."
इतना ही नहीं ओवैसी के इस बयान का कथावाचक देवकी नंदन ठाकुर ने न केवल विरोध किया बल्कि हिंदू राष्ट्र, सनातन परंपरा और वैश्विक स्तर पर हिंदू एकता की बात छेड़ते हुए बोले, "हमारा सपना है कि एक तिलकधारी और भगवाधारी न केवल भारत में, बल्कि बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी शासन करेगा."
यहीं से बहस कानूनी नहीं, वैचारिक हो जाती है. साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या यह देश संविधान से चलेगा या बहुसंख्यक भरोसे से?
VIDEO | Nagpur: AIMIM chief Asaduddin Owaisi (@asadowaisi) reacts to Himanta Biswa Sarma's remark, “I am confident that only a Hindu will become the PM of India,” saying, “He's a 'tubelight' in his mind. He has taken an oath on the Constitution, but does he even know what's… pic.twitter.com/UYpvhNw57U
— Press Trust of India (@PTI_News) January 11, 2026
फिर आया ओवैसी का जवाब...
हिमंत सरमा के बयान के बाद ओवैसी ने भी उन्हें कड़ा जवाब दिया. हिमंत बिस्व सरमा की बातों पर ओवैसी बोले, "उनके दिमाग में ट्यूबलाइट है. उन्होंने संविधान की कसम खाई है. संविधान में कहां लिखा हुआ है? वो पाकिस्तान की जहनियत (मानसिकता) रखते हैं. पाकिस्तान के संविधान में लिखा है कि सिर्फ एक समुदाय का व्यक्ति ही उस देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बन सकता है. हमारे देश में बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान जो दिया हुआ है, उनके पास हिमंत बिस्व सरमा से ज्यादा दिमाग था, ज्यादा पढ़े लिखे थे. अफसोस ये है कि वो न संविधान को समझते हैं, न उसकी आत्मा को समझते हैं."
ओवैसी बोले, "ये देश किसी मजहब, समुदाय का नहीं है. इस देश की खूबसूरती यही है कि जो लोग भगवान, अल्लाह को नहीं मानते ये उनका भी देश है. उनकी सोच छोटी है, वो छोटे दिमाग के आदमी हैं. इसलिए छोटी बात करते हैं."

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संविधान क्या कहता है?
भारत का संविधान कहीं नहीं कहता कि प्रधानमंत्री किसी खास धर्म का होना चाहिए. अनुच्छेद 75 प्रधानमंत्री की नियुक्ति और जवाबदेही की बात करता है, आस्था की नहीं. अनुच्छेद 84 संसद की सदस्यता की शर्तें बताता है, मजहब की नहीं. और सबसे अहम, संविधान की प्रस्तावना भारत को पंथनिरपेक्ष गणराज्य घोषित करती है.
इसका अर्थ साफ है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता. सत्ता से आस्था का सीधा वास्ता नहीं है. जब कोई संवैधानिक पद भविष्य में भी एक ही समुदाय से जुड़ा बताया जाता है, तो यह बयान कानून नहीं बनाता, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा को घायल जरूर करता है. ये कहना कि 'प्रधानमंत्री हमेशा एक ही धर्म का होगा', अल्पसंख्यकों के राजनीतिक भविष्य पर एक अदृश्य सीमा खींचता है. लोकतंत्र को संभावना से हटाकर संभाव्यता में बदल देता है. संविधान नागरिक को अधिकार देता है, पर ऐसे बयान अक्सर उस 'भरोसे' को सीमित कर देते हैं. संविधान बराबरी की बात कहता है, तो सपने भी बराबर होने चाहिए.

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पाकिस्तान का उदाहरण देना कितना सही?
ओवैसी ने पाकिस्तान का उदाहरण देकर कहा कि वहां संविधान धार्मिक शर्तें तय करता है, भारत ऐसा नहीं करता. यह तुलना असहज जरूर है, लेकिन यह याद दिलाती है कि भारत की असली ताकत वही है, जो उसे पाकिस्तान से अलग बनाती है. अगर हम धार्मिक शर्तों के आधार पर संवैधानिक पदों की हदें तय करने लगें, तो फर्क सिर्फ कागज पर रह जाएगा. भारत एक लोकतंत्र हैं जहां जनता ही यह तय करेगी कि यहां कौन शासन करेगा. मतलब साफ है कि लोकतंत्र बहुमत की भावना से चलेगा पर वो भी संविधान के नियमों से और उसके दायरे में रहते हुए. और संविधान कहता है कि “संख्या के बावजूद अधिकार बराबर हैं.”
ऐसे बयान संयोग नहीं होते. ये राजनीतिक मंशे से दिए जाते हैं. यह ध्रुवीकरण को ध्यान में रखते हुए दिए जाते हैं. ध्रुवीकरण वोट भी दिला सकते हैं पर लोकतंत्र को कमजोर भी कर सकते हैं क्योंकि इससे लोकशाही भावनाओं की भीड़ में दब जाती है. कुल मिलाकर प्रधानमंत्री का पद किसी धर्म का इनाम नहीं, बल्कि संविधान के तहत चुनी गई जिम्मेदारी है. निश्चित रूप से इस संवैधानिक पद पर देश का कोई भी नागरिक विराजमान हो सकता है. पर जनमानस में 'लेकिन..." जैसे शब्द बड़ी बाधा बन सकते हैं. भारत इसलिए महान नहीं है कि यहां कौन प्रधानमंत्री बनता है, बल्कि इसलिए कि यहां का कोई भी नागरिक प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकता है. और यही सपना संविधान की सबसे बड़ी जीत है.
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