हिमंत-ओवैसी बहस, कानून नहीं बल्कि बहुसंख्यक राजनीति बनाम संवैधानिक सोच का टकराव दिखाती है. ऐसे बयान चुनावी ध्रुवीकरण बढ़ाते हैं और लोकतंत्र की समावेशी भावना पर सवाल खड़े करते हैं. संविधान भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए किसी धर्म की शर्त नहीं रखता. इसे आस्था नहीं बहुमत और संसद तय करती है.