अभी-अभी जून का महीना बीता है. बहुतों की सैलरी आज 1 जुलाई को आएगी, जबकि कइयों की सैलरी कल 30 को क्रेडिट हो गई. सवाल है कि जिनकी सैलरी 30 को क्रेडिट हुई, आज उनके खाते में कितने पैसे बचे हैं! आप अपनी ही बताएं, आपकी सैलरी कितनी बची है? घर का किराया, बच्चों की स्कूल फी, मोबाइल-टीवी-वाईफाई वगैरह के रिचार्ज, क्रेडिट कार्ड के बिल और दूसरे जरूरी खर्चे पूरे करते-करते बहुतों के बैंक खाते में शायद 30% सैलरी भी नहीं बची होगी!
कुछ साल पहले तक हर महीने 1 लाख रुपये या उससे ज्यादा की सैलरी को बड़ी उपलब्धि माना जाता था. लोगों को लगता था कि इतनी कमाई होने पर अच्छा घर, आरामदायक लाइफ, छुट्टियां, सेविंग और सुरक्षित भविष्य अपने आप मिल जाएगा. लेकिन अब बड़े शहरों में रहने वाले कई प्रोफेशनल्स के लिए तस्वीर बदल चुकी है.
आज अच्छी सैलरी मिलने के बाद भी महीने के आखिर तक कई लोगों की जेब लगभग खाली हो जाती है. अकाउंट में सैलरी आते ही जरूरी खर्च पूरे करने होते हैं और फिर से अगली सैलरी डे का इंतजार शुरू हो जाता है. यानी कमाई बढ़ी है, लेकिन आर्थिक राहत पहले जैसी महसूस नहीं हो रही.
1 लाख की सैलरी का मतलब अब पहले जैसा नहीं रहा!
लोन्सजगत के को-फाउंडर हर्ष ग्रोवर का कहना है कि परेशानी सिर्फ कमाई की नहीं है. असली वजह यह है कि जैसे-जैसे इनकम बढ़ती है, वैसे-वैसे लोगों के खर्च और उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं. कई लोग सोचते हैं कि ज्यादा सैलरी मिलते ही उनकी फाइनेंशियल लाइफ अपने आप मजबूत हो जाएगी. लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता. इसी वजह से कई लोग अच्छी कमाई करने के बावजूद पैसे बचा नहीं पाते. बाहर से उनकी लाइफ आरामदायक दिखती है, लेकिन अंदर से उनकी फाइनेंशियल स्थिति उतनी मजबूत नहीं होती जितनी नजर आती है.
फाइनेंशियल एक्सपर्ट इसे 'लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन' कहते हैं. सैलरी बढ़ने के बाद लोग नया स्मार्टफोन खरीद लेते हैं, बड़ा घर ले लेते हैं, बाहर ज्यादा खाना खाने लगते हैं, प्रीमियम सब्सक्रिप्शन जोड़ लेते हैं और दूसरे पर्सनल खर्च भी बढ़ा लेते हैं. हर खर्च अलग-अलग देखने पर छोटा लगता है, लेकिन सभी मिलकर अतिरिक्त कमाई का बड़ा हिस्सा खत्म कर देते हैं. यही वजह है कि इनकम बढ़ती रहती है, लेकिन सेविंग उतनी नहीं बढ़ती. कई हाई इनकम वाले लोग भी इस चक्र में फंस जाते हैं. उनका लाइफस्टाइल बेहतर होता जाता है, लेकिन दौलत बनाने की रफ्तार नहीं बढ़ती.
सिर्फ बड़ी सैलरी से नहीं बनती फाइनेंशियल सिक्योरिटी
हर्ष ग्रोवर का कहना है कि हर महीने अच्छी सैलरी मिलना कई बार लोगों को झूठा भरोसा भी दे देता है. 1 लाख रुपए या उससे ज्यादा की सैलरी आज आराम दे सकती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि भविष्य भी पूरी तरह सुरक्षित हो. अगर किसी व्यक्ति के पास इमरजेंसी फंड, इन्वेस्टमेंट और लंबे समय के लिए एसेट्स नहीं हैं, तो नौकरी जाने या किसी दूसरी मुश्किल में उसे आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. उनके मुताबिक फाइनेंशियल सिक्योरिटी सिर्फ हर महीने पैसा कमाने से नहीं आती. असली बात यह है कि अगर सैलरी आनी बंद हो जाए, तब भी आपकी आर्थिक स्थिति संभली रहे.
एक ही इनकम पर निर्भर रहना बन सकता है जोखिम
ज्यादातर नौकरी करने वाले लोगों की पूरी फाइनेंशियल लाइफ सिर्फ एक इनकम पर टिकी होती है. घर का किराया, राशन, बच्चों की पढ़ाई, ट्रैवल और भविष्य की प्लानिंग, सब कुछ एक ही सैलरी से चलता है. सामान्य समय में यह ठीक लगता है, लेकिन नौकरी जाने, करियर बदलने या आर्थिक सुस्ती आने पर यही सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता है. ग्रोवर का मानना है कि अगर लोग समय के साथ अतिरिक्त इनकम के स्रोत भी तैयार करें, तो उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत हो सकती है.
इन्वेस्टमेंट टालना पड़ सकता है भारी
कई लोग अच्छी कमाई होने के बावजूद इन्वेस्टमेंट शुरू नहीं करते. कभी छुट्टियों की प्लानिंग, कभी नया गैजेट और कभी परिवार के खर्च की वजह से निवेश को आगे के लिए टाल दिया जाता है. लोगों को लगता है कि जब सैलरी और बढ़ जाएगी, तब इन्वेस्टमेंट शुरू करेंगे. लेकिन इस देरी की कीमत बाद में चुकानी पड़ सकती है. ग्रोवर के मुताबिक दौलत बनाने में सबसे बड़ा रोल बड़ी सैलरी नहीं, बल्कि समय पर शुरुआत और लगातार इन्वेस्टमेंट का होता है. जल्दी शुरू करके नियमित निवेश करना, सही समय का इंतजार करने से ज्यादा फायदेमंद साबित होता है.
दूसरों से तुलना बढ़ा रही है आर्थिक दबाव
एक और बड़ी वजह लोगों की सोच भी है. जैसे-जैसे कमाई बढ़ती है, वैसे-वैसे "कितना काफी है" इसकी परिभाषा भी बदल जाती है. जो व्यक्ति 1 लाख रुपए कमाता है, वह 2 लाख कमाने का लक्ष्य बना लेता है. 2 लाख कमाने वाला अपने से ज्यादा कमाने वालों से तुलना करने लगता है. सोशल मीडिया ने इस तुलना को और बढ़ा दिया है. इससे कई लोगों को हमेशा लगता रहता है कि वे आर्थिक रूप से दूसरों से पीछे हैं. जैसे-जैसे उम्मीदें बढ़ती हैं, वैसे-वैसे संतुष्टि कम होती जाती है.
सिर्फ कमाई नहीं, वेल्थ बनाना भी है जरूरी
यही वजह है कि अच्छी कमाई करने वाले कई लोग भी खुद को आर्थिक दबाव में महसूस करते हैं. हर्ष ग्रोवर का कहना है कि अब सिर्फ ज्यादा कमाने की नहीं, बल्कि सही तरीके से फंड तैयार करने (Wealth Creation) की बात करनी चाहिए. ऐसे समय में जब सैलरी बढ़ रही है लेकिन लोगों की जरूरतें और इच्छाएं उससे भी तेजी से बढ़ रही हैं, तब सिर्फ इनकम बढ़ाना काफी नहीं है.
आज भी 1 लाख रुपए महीने की सैलरी भारत में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. लेकिन बड़े शहरों में बढ़ते रहने वाले खर्च और बदलती लाइफस्टाइल के बीच यह रकम पहले जैसी आर्थिक राहत की गारंटी नहीं देती. आखिर में फाइनेंशियल सिक्योरिटी इस बात पर निर्भर करती है कि सैलरी अकाउंट में आने के बाद उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है. कई लोगों के लिए 1 लाख रुपए की सैलरी से जुड़ा सबसे बड़ा सबक यही है कि सिर्फ ज्यादा कमाना नहीं, बल्कि सही तरीके से पैसा बचाना और बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है.
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