अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे टेंशन का असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर पहुंच गईं, नतीजन भारत जैसे देश जो तेल का आयात करते हैं, उनकी करेंसी पर दबाव बढ़ गया. देश के रुपये की बात करें तो जब से जंग शुरू हुई है ये डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है. इसी समस्या पर बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज के इंडिया एंड आसियान इकोनॉमिक रिसर्च के हेड राहुल बाजोरिया ने एनडीटीवी प्रॉफिट से बात की. उन्होंने कहा कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिरकर 99 के स्तर तक पहुंच सकता है. भले ही अमेरिका और ईरान के बीच का तनाव खत्म हो जाता है, तब भी रुपये में सुधार की गुंजाइश कम है.
राजकोषीय घाटा 5% के पार
राहुल बाजोरिया ने बताया कि इस साल 2026 में देश की मैक्रोइकॉनॉमिक्स पर प्रेशर देखा जा रहा है. सरकार का फिस्कल डेफिसिट बढ़कर जीडीपी के 5% के पार निकल गया है. ये आंकड़ा सरकार के पिछले बजटीय अनुमान 4.5% से ज्यादा है. सरकारी कर्ज, सब्सिडी का बढ़ता बोझ, मिडिल ईस्ट की स्थिति की वजह से फिस्कल डेफिसिट बढ़ रहा है.
'एंबेडेड इन्फ्लेशन साइकिल का खतरा'
अमूमन माना जाता है कि वैश्विक तनाव खत्म होते ही बाजार पहले जैसे हो जाते हैं. लेकिन राहुल बाजोरिया का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक एंबेडेड इन्फ्लेशन साइकिल यानी स्थाई मुद्रास्फीति में फंसी है. मिडिल ईस्ट टेंशन कमोडिटी की कीमतों और सप्लाई चेन पर इतना असर डाला है कि भारत के लिए टर्म्स ऑफ ट्रेड का बड़ा झटका लगा है. आसान भाषा में कहें तो आयात की लागत बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है. इस वजह से देश के अंदर स्टैगफ्लेशन यानी आर्थिक सुस्ती के साथ महंगाई जैसी समस्या एक साथ पैदा हो गई है. इसे अब सिर्फ जंग खत्म होने से नहीं सुलझाया जा सकता.
आम जनता पर क्या असर होगा?
राहुल बाजोरिया के अनुसार अगर रुपया टूटकर 99 के लेवल पर जाता है तो देश का इंपोर्ट बिल बहुत बढ़ जाएगा. भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. तेल महंगा होने से माल ढुलाई बढ़ेगी, जिससे फल, सब्जियां, दवाइयां और रोजमर्रा का हर सामान महंगा हो जाएगा.
इस समस्या से कैसे निकला जाए?
समस्या से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक लगातार काम कर रहा है. लेकिन रुपये को 99 के स्तर पर जाने से रोकना एक बड़ी चुनौती बन गया है. बाजोरिया ने कहा जब तक सरकार राजकोषीय घाटे को कंट्रोल करने और एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक रुपये का मजबूत हो पाना मुश्किल है. आरबीआई को महंगाई को काबू में रखने के लिए ब्याज दरों को को भी कंट्रोल करना है और देश की विकास दर को बढ़ाने के लिए भी काम करना है.
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