मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच दुनियाभर के बाजारों में उथल-पुथल के बीच आज सोमवार को बाजार में थोड़ी हरियाली लौटी है. हालांकि बड़ी संख्या में निवेशकों का मनोमान पूरा नहीं हुआ है. निवेशक मार्केट में तेजी का दौर लौटने का इंतजार कर रहे हैं. वहीं इस बीच एक दिग्गज मार्केट इन्वेस्टर ऐसे भी हैं, जो मार्केट में तेजी नहीं, बल्कि 'मंदी' को जरूरी बता रहे हैं. दरअसल, दिग्गज निवेशक शंकर शर्मा (Shankar Sharma) ने अपनी हालिया 'एक्स' पोस्ट से निवेश जगत में खलबली मचा दी है. उनका कहना है कि भारत की असली 'ग्रोथ' के लिए 5-10 साल का 'बेयर मार्केट' (Bear Market) यानी मंदी बेहद जरूरी है. शर्मा ने बिना मुनाफे के अरबों डॉलर का मार्केट कैप हासिल करने वाले स्टार्टअप्स को 'हवा का गुब्बारा' (Bubble) करार दिया है.
उनका तर्क है कि भारी मंदी ही वो समय होगा, जब लोग 500 के PE रेशियो वाले 'लिपस्टिक और फूड डिलीवरी ऐप्स' के बजाय सेमीकंडक्टर, डिफेंस और इंडस्ट्रियल इनोवेशन जैसे ठोस बिजनेस बनाने की ओर लौटेंगे. शर्मा की चेतावनी साफ है- जब बाजार गिरेगा, तो केवल वही कंपनियां बचेंगी जिनके पास असली उत्पादन और वास्तविक मुनाफा होगा.
थ्योरी कड़वी पर नजरअंदाज नहीं कर सकते
'जीक्वांट इन्वेस्टेक' (GQuant Investech) के फाउंडर शंकर शर्मा ने एक ऐसी थ्योरी दी है, जो सुनने में कड़वी है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद को लेकर बड़े सवाल खड़े करती है. शंकर शर्मा का मानना है कि भारत की असली और टिकाऊ तरक्की के लिए देश को अगले 5 से 10 साल तक 'बेयर मार्केट' (मंदी का दौर) की जरूरत है. उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब दलाल स्ट्रीट पर हर तरफ 'तेजी' का शोर है.
Looking at the remarkable success of Iran's tech in missiles, drones, infrared tracking etc, I am convinced it's because they don't have a stock market. Their engineers build real products instead of food & lipstick apps for 500x PE.
— Shankar Sharma (@1shankarsharma) April 5, 2026
India's real teji will start when India has…
क्यों 'मंदी' को वरदान मान रहे हैं शंकर शर्मा?
आमतौर पर निवेशक मंदी के नाम से डरते हैं, लेकिन शर्मा इसे एक 'सफाई अभियान' (Cleansing Phase) के रूप में देखते हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी बेबाक राय रखते हुए उन्होंने तर्क दिया कि जब बाजार में 'आसान पैसा' (Easy Money) होता है, तो प्रतिभा और पूंजी दोनों का गलत इस्तेमाल होता है.
शंकर शर्मा के एनालिसस को हमने यहां 3 प्वाइंट में समझने की कोशिश की है.
1. 'लिपस्टिक और फूड ऐप्स' बनाम असली इंजीनियरिंग
शंकर शर्मा ने एक चौंकाने वाला उदाहरण दिया. उन्होंने ईरान के तकनीकी विकास (मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और इन्फ्रारेड ट्रैकिंग) की तुलना भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम से की. उनका कहना है कि ईरान में शेयर बाजार का इतना बड़ा कल्चर नहीं है, इसलिए वहां के इंजीनियर 'असली उत्पाद' (Real Products) बनाने पर मजबूर हुए.
उन्होंने कहा, 'भारत की असली 'तेजी' तब शुरू होगी जब हमारे पास 5-10 साल का बेयर मार्केट होगा. तब लोग 500 के PE रेशियो वाले 'लिपस्टिक और फूड डिलीवरी ऐप्स' बनाने के बजाय असली बिजनेस बनाने की ओर लौटेंगे.'
उनका सीधा हमला उन स्टार्टअप्स पर है जो बिना मुनाफे के अरबों डॉलर का मार्केट कैप हासिल कर लेते हैं, जिसे उन्होंने 'फ्लफ' (Fluff) यानी सिर्फ हवा का गुब्बारा करार दिया है.
2. 'ब्रेनवॉश' निवेशक और SIP का संकट
शंकर शर्मा की रिपोर्ट सिर्फ कंपनियों तक सीमित नहीं है, वह आम निवेशकों को भी आगाह कर रहे हैं. उन्होंने हाल ही में एक लेख साझा किया था जिसका शीर्षक था- 'कैसे भारत ने ब्रेनवॉश किए गए निवेशकों की एक पीढ़ी तैयार की.' उनका दावा है कि वेल्थ मैनेजर, ब्रोकर और मीडिया मिलकर निवेशकों को एक ऐसे चक्र में फंसा रहे हैं जो भविष्य के लिए 'मैक्रो डिजास्टर' (बड़ा आर्थिक संकट) बन सकता है. वह इसे इतिहास का सबसे बड़ा 'वेल्थ ट्रांसफर' (धन का हस्तांतरण) मानते हैं, जहां आम आदमी का पैसा कुछ खास हाथों में जा रहा है.
3. 'डिफेंस और डीप-टेक' ही है भविष्य
शर्मा का तर्क है कि एक लंबी मंदी ही वह जरिया है जो भारत के टैलेंट को सट्टेबाजी और शॉर्ट-कट से हटाकर सेमीकंडक्टर, डिफेंस टेक, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल इनोवेशन की ओर मोड़ेगी. जब बाजार गिरता है, तो केवल वही कंपनियां बचती हैं जो ठोस उत्पादन और वास्तविक मुनाफे पर आधारित होती हैं.

राधिका गुप्ता की प्रतिक्रिया- क्या निवेशक गुमराह हैं?
शंकर शर्मा की इस 'डूम्सडे' (प्रलय) वाली रिपोर्ट पर बहस तब और तेज हो गई जब एडलवाइस म्यूचुअल फंड (Edelweiss Mutual Fund) की एमडी और सीईओ राधिका गुप्ता ने कड़ी प्रतिक्रिया दी. गुप्ता ने तर्क दिया कि,
- बाजार चक्रों (Cycles) में चलता है; कभी तेजी होती है तो कभी सुधार.
- जब बाजार गिरता है, तो आंकड़े हमेशा आलोचकों के पक्ष में दिखते हैं.
- जब बाजार चढ़ता है, तो वही आंकड़े तेजी के पक्ष में हो जाते हैं.
- सच्चाई हमेशा इन दोनों के बीच कहीं होती है.
क्या हमको-आपको डरना चाहिए?
शंकर शर्मा की यह रिपोर्ट उन लोगों का दिल तोड़ सकती है जो शेयर बाजार को 'मनी मेकिंग मशीन' मान बैठे हैं. लेकिन एक समझदार निवेशक के लिए इसमें एक बड़ा सबक है- वैल्यूएशन नहीं, बिजनेस देखिए. जानकार बताते हैं कि हमें ऐसी तकनीकों और उत्पादों का निर्माण करना होगा जिनकी दुनिया को जरूरत हो, न कि सिर्फ ऐसी सर्विसेज का जो केवल डिस्काउंट पर टिकी हों.
मोडएक्स कंप्यूटर्स के फाउंडर सार्थक शर्मा के मुताबिक, एक मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए उपभोग (Consumption) और उत्पादन (Production) आधारित कंपनियों के बीच संतुलन होना अनिवार्य है. उनके अनुसार, पिछले दशक में डिजिटल और उपभोक्ता-केंद्रित स्टार्टअप्स में भारी निवेश हुआ है, लेकिन अब समय आ गया है कि मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और बुनियादी उद्योगों पर ध्यान केंद्रित किया जाए, क्योंकि यही क्षेत्र बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और टिकाऊ विकास की नींव रखते हैं.

दूसरी ओर वर्ल्ड ऑफ सर्कुलर इकोनॉमी (WOCE) की चीफ कम्युनिकेशन एडवाइजर (सस्टेनेबिलिटी) पल्लवी धौंडियाल पंथरी बाजार के इस बदलाव को एक 'रीबूट' के रूप में देखती हैं. उनका मानना है कि मंदी या सुधार का दौर निवेशकों को केवल ऊंची वैल्यूएशन वाली कंपनियों के बजाय प्रॉफिटेबिलिटी और डीप-टेक जैसे ठोस क्षेत्रों की ओर मुड़ने के लिए मजबूर करता है.
वहीं, नवाचार (Innovation) के भविष्य पर विभवांगल अनुकूलकरा के मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्य का तर्क है कि भारत को केवल शेयर बाजार की गतिशीलता पर निर्भर रहने के बजाय शिक्षा, टेक्नोलॉजी इनक्यूबेटर्स और सरकारी-निजी भागीदारी वाले एक ऐसे इकोसिस्टम में निवेश करना चाहिए, जो उद्यमियों को जमीनी स्तर पर बदलाव लाने में सक्षम बनाए.
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