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देश की मैन्युफैक्चरिंग को एक्सपोर्ट का सहारा, पीएमआई 53.5 पर बरकरार

जुलाई में भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ग्रोथ में बना रहा. एक्सपोर्ट ऑर्डर बढ़ने से कंपनियों को सहारा मिला. हालांकि जून के मुकाबले ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी धीमी रही.

देश की मैन्युफैक्चरिंग को एक्सपोर्ट का सहारा, पीएमआई 53.5 पर बरकरार
एक्सपोर्ट से मिली मजबूती.

भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर जुलाई में भी ग्रोथ के रास्ते पर बना रहा. HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी PMI जुलाई में 53.5 रहा. मजबूत डिमांड और बढ़ते एक्सपोर्ट ऑर्डर की वजह से सेक्टर में सुधार जारी रहा. हालांकि जून में PMI 54.2 था. यानी जुलाई में ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी धीमी हुई है. फिर भी इंडेक्स 50 से ऊपर है. इसका मतलब है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब भी एक्सपेंशन में है.

एक्सपोर्ट ऑर्डर ने बढ़ाया कारोबार

HSBC इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई में एक्सपोर्ट ऑर्डर में अच्छी बढ़ोतरी हुई. कंपनियों को कनाडा. मिस्र. इंडोनेशिया. केन्या. नेपाल. साउथ अफ्रीका. थाईलैंड और यूएई जैसे देशों से ज्यादा डिमांड मिली. नई डिमांड बढ़ने से कंपनियों ने प्रोडक्शन भी बढ़ाया. खासकर इंटरमीडिएट गुड्स और कैपिटल गुड्स बनाने वाली कंपनियों में आउटपुट और नए ऑर्डर तेजी से बढ़े. वहीं कंज्यूमर गुड्स सेगमेंट में ग्रोथ बाकी सेक्टरों के मुकाबले थोड़ी धीमी रही.

सप्लाई चेन सुधरी. स्टॉक भी बढ़ा

HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा कि सप्लायर डिलीवरी पहले से तेज हुई है. इससे साफ है कि सप्लाई चेन की दिक्कतें लगातार कम हो रही हैं. हालांकि जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम आगे चलकर जोखिम पैदा कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि आउटपुट और नए एक्सपोर्ट ऑर्डर मजबूत रहे. इससे पता चलता है कि खासकर विदेशी बाजारों से डिमांड अच्छी बनी हुई है. इनपुट कॉस्ट बढ़ने की रफ्तार कम हुई है. लेकिन कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट की कीमतें बढ़ाई हैं ताकि उनका मार्जिन सुरक्षित रहे. सप्लाई चेन बेहतर होने से कंपनियों ने कच्चे माल का स्टॉक भी बढ़ाया. इनपुट की डिलीवरी रिकॉर्ड के करीब तेज रही. वहीं तैयार माल का स्टॉक 11 साल से ज्यादा समय में सबसे तेज बढ़ा.

हायरिंग की रफ्तार पड़ी धीमी

जुलाई में डिमांड बेहतर रहने के बावजूद कंपनियों ने भर्ती की रफ्तार कम कर दी. रोजगार में बढ़ोतरी जारी रही. लेकिन पिछले 29 महीनों के मुकाबले यह सबसे धीमी रही. सर्वे में शामिल कई कंपनियों ने कहा कि विज्ञापन और मजबूत डिमांड से बिक्री को सहारा मिला. हालांकि कुछ प्रोडक्ट्स में बाजार की स्थिति चुनौतीपूर्ण रही और ग्राहकों की दिलचस्पी भी कमजोर दिखी.

इनपुट कॉस्ट का दबाव हुआ कम

रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई में इनपुट कॉस्ट बढ़ने की रफ्तार घटकर पांच महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गई. इससे कंपनियों पर लागत का दबाव कुछ कम हुआ. हालांकि आउटपुट प्राइस बढ़ने से कंपनियां अपने मार्जिन को बचाने की कोशिश करती दिखीं.

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