Car loan vs SIP : मौजूदा दौर में कार खरीदना काफी आसान हो गया है. बैंक और लोन कंपनियां आकर्षक और आसान EMI ऑफर्स देकर लोगों के सपनों को तुरंत पूरा कर देती हैं. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या लोन लेना वाकई उतना फायदेमंद है जितना दिखता है? चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने इसे लेकर मिडिल क्लास को बड़ी चेतावनी दी है.उनके मुताबिक, केवल 25,000 रुपये की मंथली EMI भी लंबे समय में भारी नुकसान का कारण बन सकती है और साथ ही आपकी सेविंग्स को भी बड़ी ठेस पहुंचा सकती है. लोग अक्सर सस्ती EMI देखकर फैसला लेते हैं, लेकिन इसकी असली कीमत और लागत को नजरअंदाज कर देते हैं.
ब्याज का खेल
नितिन कौशिक के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति 5 साल तक 25,000 रुपये की EMI देता है, तो कुल पेमेंट लगभग 15 लाख तक पहुंच जाता है. लेकिन इस रेंज में कार की कीमत लगभग 12 लाख रुपए के आसपास होती है. इसका मतलब यह हुआ कि 5 सालों के अंदर लगभग 3 लाख रुपए केवल ब्याज में ही चले जाते हैं.
डिप्रिसिएशन : तेजी से कम होती कार की वैल्यू
कार एक डिप्रिसिएटिंग एसेट होती है, यानी समय के साथ उसकी कीमत घटती जाती है. 5 साल इस्तेमाल के बाद कार की वैल्यू लगभग 60% तक कम हो जाती है. इस हिसाब से 12 लाख रुपये की कार की रीसेल वैल्यू करीब 5.2 लाख रुपये रह जाती है.
5 साल में कितना नुकसान
अब अगर पूरी कैलकुलेशन देखें तो -
- 3 लाख रुपये ब्याज में चला गया
- 7 लाख रुपये डिप्रिसिएशन में खत्म हो गया
- इसका मतलब 5 सालों में लगभग 10 लाख रुपये का सीधा वेल्थ लॉस हुआ है.
SIP : कैसे वही पैसा एक बड़े फंड में बदल सकता है
चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने कार लोन की तुलना SIP से की है. उनके मुताबिक, अगर यही 25,000 रुपये हर महीने SIP में लगाया जाए और औसतन 12% सालाना रिटर्न मिले, तो 5 साल में करीब 20.6 लाख रुपये का फंड तैयार हो सकता है. यानि जहां कार खरीदने पर संपत्ति घटती है, वहीं निवेश करने पर यह बढ़ती है. इस उदाहरण में कार खरीदने पर व्यक्ति के पास अंत में एक पुरानी और घटती कीमत वाली गाड़ी बचती है. जबकि SIP में वही पैसा एक मजबूत फंड में तब्दील हो जाता है. इन दोनों ऑप्शंस के बीच अंतर करीब 15 लाख रुपये तक पहुंच जाता है.
आपको क्या करना चाहिए?
नितिन कौशिक का मकसद लोगों को कार खरीदने से रोकना नहीं है, बल्कि यह समझाना है कि सिर्फ EMI देखकर फैसला करना सही नहीं है. असली सवाल यह होना चाहिए कि वही पैसा भविष्य में कितना बढ़ सकता है. यह तुलना बताती है कि आसान EMI का आकर्षण अक्सर लंबे समय में भारी नुकसान छुपा देता है. इसलिए सही फैसला वही है जिसमें तुरंत सुविधा नहीं, बल्कि भविष्य की संपत्ति पर ध्यान दिया जाए.
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