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फिटमेंट फैक्टर में उछाल से बदलेगा बेसिक सैलरी का गेम, सरकार पर पड़ेगा पेंशन का डबल बोझ!

8वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर में बढ़ोतरी से केंद्र सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ने की आशंका है. खबर में जानिए कैसे एनपीएस और यूपीएस सरकार की देनदारी को बढ़ा देगा.

फिटमेंट फैक्टर में उछाल से बदलेगा बेसिक सैलरी का गेम, सरकार पर पड़ेगा पेंशन का डबल बोझ!
8वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर सरकार के लिए देनदारी का बोझ बढ़ा सकता है.

8वें वेतन आयोग के लिए देश के करीब 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियों के साथ लगभग 69 लाख पेंशन होल्डर्स बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. कर्मचारियों के साथ अलग-अलग संगठन सरकार से हाई फिटमेंट फैक्टर की डिमांड कर रहे हैं, जिससे उनकी सैलरी में बढ़िया इजाफा हो सके. लेकिन जैसा आप जानते हैं कि सिक्के के हमेशा दो पहलू होते हैं. दूसरे पहलू की बात करें तो वो सरकार से जुड़ा हुआ है. अगर केंद्र सरकार फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाती है तो इसका सीधा असर देश के खजाने पर पड़ेगा. साथ ही बढ़े हुए फिटमेंट का असर सैलरी के साथ नेशनल पेंशन स्कीम के साथ यूनिफाइड पेंशन स्कीम पर पड़ेगा. चलिए इस खबर में आंकड़ों से समझते हैं कि ये पूरा गणित कैसे सरकार की नींद उड़ा सकता है.

एक्सपर्ट का कहना है कि फिटमेंट फैक्टर में इतना इजाफा करना सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है. सरकार पर पहले से ही नेशनल पेंशन सिस्टम और यूनिफाइड पेंशन स्कीम का खर्च बढ़ रहा है. ऐसे में सैलरी के साथ-साथ पेंशन की जिम्मेदारी भी बढ़ी हो गई है. ऑल इंडिया एनपीएस एम्पलॉयीज फेडरेशन के अध्यक्ष मंजीत सिंह पटेल ने बताया कि सरकार के सामने सबसे बड़ी परेशानी यही है कि वो बढ़ी हुई सैलरी के साथ पेंशन से होने वाले एक्सट्रा खर्चे को कैसे संभाले. मंजीत सिंह का अनुमान है कि सरकार पर इससे 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का एक्सट्रा बोझ पड़ सकता है.

क्या है फिटमेंट फैक्टर का पेच और मांगें?

मालूम हो कि 7वें वेतन आयोग के समय सरकार ने 2.57 का फिटमेंट लागू किया था, जिसके जरिए कर्मचारियों की मिनिमम बेसिक सैलरी 7 हजार रुपये से बढ़कर 18 हजार रुपये हो गई थी. अब 8वें वेतन से कर्मचारी संघों के साथ संगठनों ने फिटमेंट को कम से कम 2.86 या फिर 3.68 लागू करने की डिमांड रख दी है. ऐसे में सरकार अगर इन डिमांड को आधी भी मानकर फिटमेंट फैक्टर 3.00 या फिर उसके ऊपर सेट करती है तो मिनिमम बेसिक पे सीधे 18 हजार से बढ़कर 26 हजार के दायरे में पहुंच जाएगी. वहीं हाई लेवल ऑफिसर्स के मामलों में तो ये लाखों में पहुंच जाएगी. पेच ये है कि बेसिक सैलरी में हुए इस इजाफा एक चेन रिएक्शन शुरू करेगा, जो डीए, एचआरए से होते हुए सीधे पेंशन फंड तक जा पहुंचेगा.

मंजीत सिंह ने सुझाव देते हुए कहा कि सरकार को कर्मचारियों रिटायरमेंट के समय से ऑप्शन देना चाहिए कि वो एनपीएस या यूपीएस में से किसे चुनना चाहते हैं. उनका मानना है कि रिटायरमेंट के समय कर्मचारी अपनी फाइनेंशियल कंडीशन, हेल्थ और परिवार की जरूरतों को देखते हुए सही फैसला ले सकते हैं.

एनपीएस का गणित समझें

एनपीएस के लिए कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और डीए का 10 फीसदी हिस्सा उनकी तरफ से काटा जाता है, जबकि सरकार इसमें 14 फीसदी का योगदान देती है. मान लीजिए किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 50 हजार रुपये है. अभी सरकार 7 हजार रुपये का योगदान एनपीएस में कर रही है. अगर फिटमेंट फैक्टर 3.00 का हो जाता है तो उसकी संभावित बेसिक सैलरी करीब 60 हजार से 65 हजार रुपये के बीच हो सकती है. वहीं सैलरी बढ़ने के बाद एनपीएस का योगदान बढ़कर 10 हजार रुपये 12 हजार रुपये हो सकता है. जब इस बढ़ोतरी को 50 लाख कर्मचारी पर लागू किया जाएगा तो सरकार का महीने और साल का एनपीएस आउटफ्लो कई हजार करोड़ रुपये बढ़ जाएगा.

यूनिफाइड पेंशन स्कीम के लिए क्या स्थिति?

सरकार ने मार्केट के रिस्क से बचने के लिए यूपीएस स्कीम को लॉन्च किया था. इसमें कर्मचारियों को उनके रिटायरमेंट से ठीक पहले 12 महीनों की औसत बेसिक सैलरी का 50 फीसदी हिस्सा पेंशन के रुप में मिलता है. यहां एनपीएस से अलग पेच हैं. 8वें वेतन आयोग की वजह से कर्मचारियों की लास्ट ड्रॉन बेसिक सैलरी बढ़ी होगी तो सरकार को 50 फीसदी फॉर्मूले की वजह से बड़ा पेंशन अमाउंट हर महीने कर्मचारी के लिए फिक्स करना होगा. 

मान लीजिए किसी कर्मचारी की रिटायरमेंट के बाद बेसिक सैलरी 7वें वेतन आयोग में 1 लाख रुपये होनी चाहिए थी, अब वो 8वें वेतन आयोग में फिटमेंट की वजह से 1.30 लाख रुपये हो जाएगी. ऐसे में सरकार की पेंशन देनदारी भी हर महीने प्रति कर्मचारी बढ़ जाएगी. सरकार पहले ही फिस्कल डेफिसिट को जीडीपी के 4.5% या उससे नीचे लाने पर काम कर रही है. इसमें बड़ा हिस्सा सैलरी और पेंशन बिल को लेकर बना हुआ है. ऐसे में अगर फिटमेंट फैक्टर को मांगों के अनुसार बढ़ाया जाता है तो सरकार के लिए ये बड़ी समस्या पैदा कर सकता है.

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