क्या किसान आंदोलन पश्चिमी यूपी में दंगों के दाग मिटा पाएगा?

महेंद्र सिंह टिकैत और गुलाम मोहम्मद मिलकर अल्लाहू अकबर और हर-हर महादेव के नारे लगाते थे, 2013 से इन नारों का बंटवारा हो गया था, 2021 में फिर से एक हो गया है

क्या किसान आंदोलन पश्चिमी यूपी में दंगों के दाग मिटा पाएगा?

किसान आंदोलन के नेता अगर चाहते हैं कि प्रधानमंत्री उनसे बात करें तो उन्हें महापंचायत का आयोजन नहीं करना चाहिए. उन्हें किसान महापंचायतों की जगह कबड्डी, खो-खो, हॉकी का आयोजन करना चाहिए ताकि इन खेलों में विजय प्राप्त करते ही विजयी किसान नेताओं को प्रधानमंत्री का फोन आ जाए और फिर उस बातचीत का वीडियो न्यूज़ चैनलों पर भी ख़ूब चलेगा. यह प्रसंग इसलिए आया कि खिलाड़ियों के लिए सुलभ प्रधानमंत्री किसानों के लिए कितने दुर्लभ हो गए हैं. नौ महीने से अनगिनत महापंचायतों, धरना-प्रदर्शनों और किसान संसद के आयोजन के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी की किसान नेताओं से बात नहीं हुई जबकि उन्होंने कहा था कि वे एक कॉल की दूरी पर हैं. कभी कुछ किसानों का आंदोलन तो कभी बड़े किसानों का आंदोलन बता कर इस आंदोलन को खारिज करने के बाद किसान हर बार अपनी रैलियों के ज़रिए बता रहे हैं कि उनका आंदोलन किसका है. 

राजकीय इंटर कालेज की तरफ बढ़ते किसानों को मालूम है कृषि कानूनों की वापसी से पहले उन्हें किसान के रूप में वापसी करनी होगी.आर्थिक नीतियों के जाल में फंसे दुनिया भर के किसानों को विस्थापन ही मिला है इसलिए इस मामले में समझदारी हासिल करने के पहले धार्मिक मुद्दों को लेकर आई नासमझी दूर करनी ही होगी. किसानों को समझ आ गया है कि हिन्दू मुस्लिम बंटवारे की राजनीति के कारण किसान के रूप में उनका सम्मान और राजनीतिक बल दोनों खत्म हो चुका है. सात सालों के दौरान पश्चिम यूपी के गांव गांव में आग की तरह हिन्दू मुस्लिम नफरत का नेशनल सिलेबस पहुंचा है. युवाओं और किसानों को लगा कि धर्म के नारे ने शक्तिशाली बना दिया है लेकिन जब कृषि कानूनों के विरोध में उतरे तब पता चला कि उनकी ताकत ही खत्म हो चुकी है. आज किसान आंदोलन अपने जनाधार और पहचान में आई दरारों को भर रहा है.याद कीजिए या इंटरनेट पर सर्च कीजिए इसी पश्चिम यूपी में कैसी कैसी महापंचायतें होने लगी थीं जिनमें धर्म के नाम पर दूसरे धर्म को ललकारा जा रहा था. जो लोग एक दूसरे को दशकों से जानते थे, एक दूसरे को व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से जानने लगे. किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के समय उनके कार्यक्रमों की अध्यक्षता गुलाम मोहम्मद किया करते थे जो अब 85 साल के हो चुके हैं. महेंद्र सिंह टिकैत और गुलाम मोहम्मद मिलकर अल्लाहू अकबर और हर हर महादेव के नारे लगाते थे. 2013 से इन नारों का बंटवारा हो गया था. 2021 में फिर से एक हो गया है. 

कुछ लोग राकेश टिकैत के भाषण की एक क्लिप को निकालकर वायरल करा रहे हैं वो यह नहीं समझेंगे कि किसान आंदोलन के मंच से कई धर्मों के नारे लगे हैं. जो बोले सो निहाल भी लगा है. धार्मिक तेवर पैदा करने के लिए नहीं बल्कि धर्म के नाम पर बंट गए किसानों को एकजुट करने के लिए. आईटी सेल वही करेगा जितना उसे आता है. किसान वो कर रहे हैं जो वो करना भूल गए थे. इसलिए व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी का तंत्र हिल गया है.बंगाल के चुनावी भाषणों को याद कीजिए. जहां मां दुर्गा बनाम जय श्री राम के नारे पर प्रतियोगिता कराई जा रही थी. एक ही धर्म के भीतर फूट डाली जा रही थी. राकेश टिकैत ने कहा कि पहले के किसान आंदोलन में एकता के लिए अल्लाहू अकबर और हर हर महादेव का नारा लगता था. इस दौर में इसे दोहरा देना वाकई  साहसिक है. धार्मिक नारों को राजनीतिक मुद्दों की लड़ाई से जितनी जल्दी विदा कर दिया जाए उतना ही अच्छा है और यही मकसद था किसान नेताओं का जब हर दूसरा नेता दंगों के खिलाफ भाषण दे रहा था. 

दिल्ली में जब नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ शाहीन बाग़ में महिलाओं का आंदोलन चल रहा था तब कई नेता उनके बीच जाने से डर गए कि बहुसंख्यक का वोट नहीं मिलेगा. ऐसे डरपोक नेताओं की लिस्ट लोगों के बीच आज भी मौजूद है. ये नेता तब नहीं गए जब महिलाओं के आंदोलन पर दो दो बार गोली चली. हमारा लोकतंत्र और सेकुलरिज़्म इन्हीं डराने वाले और डर जाने वाले नेताओं के भरोसे है. इस दौर में मज़हब और संख्या के आधार पर कोई अल्पसंख्यक नहीं होता बल्कि हर असमहति आपको अल्पसंख्यक बना देती है और गोदी मीडिया आपको देशद्रोही. 

आज करोड़ों की संख्या में होकर भी किसान अल्पसंख्यक हो गए हैं. शाहीन बाग के मंच पर योगेंद्र यादव, इस किसान आंदोलन में शामिल कुछ संगठनों के नेता भी पंजाब से गए थे. नोट कीजिए कि मुज़फ्फरनगर की किसान महापंचायत में जा रहे किसानों के स्वागत में कांग्रेस सपा और रालोद ने अपने स्टेज लगाए थे. बाकी दल अनुपस्थित रहे. 

क्या किसान आंदोलन वाकई पश्चिम यूपी को हिन्दू मुस्लिम बंटवारे की राजनीति से वापस ले आएगा? किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले थोड़ा रुक कर देखना चाहिए. जिन किसानों को पश्चिम यूपी के दंगों में मोहरा बनाया गया, जिनके लड़कों को व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के ज़रिए ज़हरीला बनाया गया अब वही लड़के और किसान नशा मुक्ति अभियान चला रहे हैं. वैसे असली ड्रग्स के खिलाफ भी आंदोलन के दौरान कई नारे लिखे गए हैं और गीत गाए गए हैं. 

2019 में सुधा पाई का इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख है कि कैसे दंगों ने दशकों से चली आ रही मुस्लिम और जाट किसानों की एकता को तहस नहस कर दिया.पंजाब के किसानों के बीच इस एकता को लेकर कोई दुविधा नहीं थी. पश्चिम यूपी के किसानों के बीच यह बदलाव आया 26 जनवरी की हिंसा के बाद. जब अकेले पड़े टिकैत रो पड़े.दिवंगत अजित सिंह ने फोन कर समर्थन जताया तब जाकर बाकी दल के नेता भी किसानों के समर्थन में खुलकर आगे आ गए लेकिन टिकैत को तब तक दिखाई दे चुका था कि उनकी और किसानों की ताकत दंगों से ही कमज़ोर हुई है.अगले ही दिन मुज़फ्फरनगर में महापंचायत हुई जिसमें नरेश टिकैत ने दंगों के लिए माफी मांगी थी. 5 सितंबर को नौ महीने बाद राकेश टिकैत मुज़फ्फरनगर लौटे थे तब से लगातार दौरा कर रहे हैं. टिकैत बंधुओं ने इतना तो कर दिया है कि इन इलाकों में धार्मिक नारों की आड़ में समां बांधने वाले नेताओं की मौजूदगी नज़र नहीं आ रही है. 

किसान नेता साफ साफ कह रहे हैं कि दंगों में बीजेपी के कारण बंटे, बीजेपी को इसका जवाब देना चाहिए. इस साल मार्च में खबर छपी कि दंगों के सात साल बाद सुरेश राणा, संगीत सोम, कुवंर भारतेंद्र सिंह जैसे बीजेपी के कई नेताओं के खिलाफ दंगों के मुकदमे वापस ले लेने के लिए यूपी सरकार के प्रस्ताव को कोर्ट ने मंजूरी दे दी है. उसके पहले संजीव बालियान से भी मुकदमे वापस ले लिए गए. अगस्त में खबर आई कि 77 लोगों के खिलाफ दंगों के मुकदमे वापस ले लिए गए. जिस पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायमित्र विजय हँसारिया ने कोर्ट को बताया कि बिना कारण बताए मुकदमे वापस लिए गए हैं. 

अमर उजाला की हेडलाइन है कि दंगों की धरती से दिया अमन का संदेश. दंगों की पहचान इस तरह जुड़ गई है. मुज़फ्फरनगर किसान आंदोलन के लिए नैतिक संकट बन गया है. किसान मुज़फ्फरनगर नहीं जाते हैं तो उनकी ताकत का पता नहीं चलता और जाते हैं तो दंगों की बात होने लगती है. इस नैतिक संकट का समाधान किसानों ने खुद निकाला है. इस पर बात कर इसका प्रायश्चित कर. सिर्फ टिकैत बंधु ही नहीं हर नेता दंगों के खिलाफ बोल रहा था.  

किसान नेता टिकैत बंधु भले ही दंगों को लेकर बीजेपी को दोषी ठहराते हैं लेकिन वे इस एकता से छेड़छाड़ की छूट किसी को नहीं दे रहे हैं. एक तरह से किसान सभी दलों के लिए खेल का एक समान मैदान यानी लेवल प्लेइंग फिील्ड तैयार कर दे रहे हैं. किसानों की अपनी ज़मीन बंटते-बंटते खेल के मैदान से भी छोटी हो रही है लेकिन यही किसान राजनीतिक दलों को खेलने के लिए एक बड़ा सा मैदान बना कर दे रहे हैं. आज किसी भी दल की अलग आर्थिक नीति नहीं है. कुछ दल तो बिना आर्थिक नीतियों के ही राजनीति कर रहे हैं. 

खुद किसानों के आंदोलन ने राकेश टिकैत को कितना बदल दिया.शुरुआती कवरेज़ याद कीजिए राकेश टिकैत को संदेह की नज़र से देखा जाता था, आज टिकैत किसान आंदोलन के मज़बूत स्तंभ हो चुके हैं. इन नौ महीनों में टिकैत के नज़रिए में कई मामलों में कई राजनीतिक दलों से ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगी है. उम्मीद है स्थायी होगी. उनके भाषणों के कुछ अंश से ज़ाहिर हो रहा है कि किसान आंदोलन क्या बोल रहा है, क्या सुन रहा है.

जब राजनीति हिन्दू मुसलमान के बीच नहीं बटेंगी तो ज़ाहिर है ज़िलों के रद्दी हो चुके कालेजों, स्कूलों और अस्पतालों की बात करने का मौका मिलेगा. जिस दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्वांचल को माफिया और मच्छरों से मुक्त कराने का बयान दिया उस दिन उसी पूर्वांचल से किसान अपनी जेब से किराया लगाकर इस महापंचायत में आए. महिलाएं भी आई थीं. 

मुज़फ्फरनगर की महापंचायत में पंजाब, तेलांगाना, आंध्र प्रदेश, कनार्टक, महाराष्ट्र और जम्मू तक से किसान आए थे. दक्षिण के राज्यों से आए किसान नेताओं के भाषण का हिन्दी में साथ साथ अनुवाद हुआ.यह बता रहा है कि किसान आंदोलन के भीतर आंदोलन का एक अच्छा खासा सिस्टम बन गया है. तीन हज़ार लंगर लगे थे. दो हज़ार मोबाइल लंगर लगे थे. 8000 लोग सुरक्षा में तैनात किए गए थे. लोग अपनी जेब से आंदोलन में आए किसानों को खाना खिला रहे थे. 

यूपी में ऐसी रैली कब हुई जब मलयालम में भाषण हुआ, कन्नड में भाषण हुआ.योगेंद्र यादव ने फसल बीमा का सवाल उठा दिया. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को गुजरात सरकार ने एक साल के लिए स्थगित कर मुख्यमंत्री फसल बीमा योजना लांच कर दिया.पिछले साल ग्यारह अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी का बयान छपा है कि बीमा कंपनियां 5700 करोड़ का प्रीमियम मांग रही है. इसलिए उनका टेंडर ही खत्म कर दिया है.इस खबर में गुजरात बीजेपी अध्यक्ष और सूरत से सांसद सीआर पाटिल का भी बयान छपा है कि फसल बीमा योजना के कारण गुजरात और अन्य राज्यों के किसानों में नाराज़गी है. गुजरात के किसानों के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने बीमा कंपनियों को 3000 करोड़ दिए लेकिन किसानों को मुआवज़ा मिला 250 करोड़ का. 

गोदी मीडिया प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की बात नहीं करेगा. प्रधानमंत्री ने किस खिलाड़ी को फोन किया है केवल उसी की बात करेगा. यह सब इसलिए बता रहा हूं ताकि आपको पता चले कि किसान नेता फसल बीमा योजना को लेकर हवा में बात नहीं कर रहे हैं. इसी 10 अगस्त को संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट आई है कि बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, आंध्र प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना और झारखंड ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से खुद को अलग कर लिया है. अपनी योजना लांच कर दी है. बीमा कंपनियां किसानों को मुआवज़ा बहुत कम दे रही हैं. काफी देरी से देती हैं.  बीमा कंपनियां कैसा काम करती हैं उसकी ऑडिट का भी प्रावधान है लेकिन संसद की समिति ने कहा है कि ऐसी कोई ऑडिट नही हुई. इस योजना की हालत यह है कि जब संसद की समिति ने पूछा कि विवादों के निपटारे के लिए जो समिति बनी है उसके क्या रिकार्ड हैं तो जवाब मिला कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

क्या जानबूझ कर बीमा कंपनियों को पैसे बनाने दिए गए. उनके कार्यों की समीक्षा क्यों नहीं हुई? देखना चाहिए कि इन बीमा कंपनियो ने बीजेपी और पीएम केयर्स में कितना चंदा दिया लेकिन इलेक्टोरल बांड के नए कानून के अनुसार आप कभी नहीं जान सकते कि चंदा देने वाली कंपनी कौन सी है.ये हाल है बीमा योजना का. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना फ्लाप हो चुकी है. इस पर कोई बात नहीं होती.

इसका भी अध्ययन होना चाहिए कि पंजाब के किसान नेताओं की मौजूदगी ने किसान आंदोलन को कितना बदला है. उन्होंने न सिर्फ इस आंदोलन को साहस दिया है बल्कि सामाजिक एकता की ज़मीनी समझ भी दी है. 
किसानों ने इस बार अपना जवाब साफ कर दिया है कि 2024 तक चलेगा. गाज़ीपुर से आंदोलन नहीं हटेगा. टिकैत ने कहा कि मुज़फ्फरनगर से सीधे गाज़ीपुर जाएंगे. बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि तब तक बैठे रहेंगे जब तक कानून वापस नहीं होंगे. 

सात सितंबर को करनाल में महापंचायत है. वहां धारा 144 लगा दी गई है. किसानों ने कहा है कि अगर 28 अगस्त की हिंसा के मामले में SDM आयुष सिन्हा के ख़िलाफ़ कार्यवाही नहीं हुई तो लघु सचिवालय का घेराव करेंगे. किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने पुलिस लाठीचार्ज में मारे गए किसान सुशील काजल के परिवार के लिए 25 लाख मुआवज़े की मांग की है. 9-10 सितंबर को लखनऊ में किसानों की सभा है. 15 सितंबर को जयपुर में किसान संसद का आयोजन किया जाएगा. 27 सितंबर को किसान आंदोलन ने भारत बंद का आह्वान किया है. किसान आंदोलन में बीजेपी पर जहां दंगों को भड़काने के आरोप लगते रहे वहीं पर एक बीजेपी सांसद वरुण गांधी किसानों के समर्थन में उतर आए हैं. वरुण गांधी 2009 से सांसद हैं ज़ाहिर है बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं. 


वरुण गांधी ने करनाल एस डी एम के वीडियो को लेकर भी ट्विट किया था कि उम्मीद है यह वीडियो फर्ज़ी होगा अगर नहीं तो लोकतांत्रिक भारत में अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ ऐसा किया जाना स्वीकार नहीं किया जा सकता है. 31 अगस्त को वरुण गांधी ट्वीट करते हैं कि पीलीभीत के किसान प्रतिनिधियों के बीच बैठकर मैंने उनके दिल की बात सुनी. 

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महापंचायत में एक नहीं अनेक मुद्दे उठे. यूपी में आवारा पशुओं की समस्या और उनसे होने वाली फसलों की बर्बादी पर बात हुई. गन्ना किसानों के बकाया राशि पर बात हुई. बात हुई कि कई साल से गन्ने के दाम तक नहीं बढ़े. मुद्रीकरण की बात हुई कि अनाज के गोदाम निजी हाथों में जाने से स्टोरेज की कीमत बढ़ जाएगी. किसान आंदोलन खुद को झकझोर रहा है. आप भी किसान बन जाइए और केबल वाले से पूछिए कि प्राइम टाइम क्यों नहीं दिखा रहे हो. दिखाओ.