पंजाब के सिख विधायक, कैबिनेट मंत्री और विधानसभा स्पीकर गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्रता से जुड़े विवादित 'धार्मिक अपमान-विरोधी कानून' पर अपना पक्ष रखने के लिए सोमवार को अकाल तख्त के सामने पेश हुए. इसलिए सबकी नजरें वहां लगी हुई हैं.
इस कार्यवाही से पहले मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने अमृतसर में पार्टी नेताओं से मुलाकात की. मान ने कहा है कि उनकी पार्टी के जिन प्रतिनिधियों को बुलाया गया है, वे पेश होंगे और सरकार का पक्ष रखेंगे. यहां यह बताना जरूरी है कि जहां सिख विधायकों और मंत्रियों को अकाल तख्त के सचिवालय के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा गया है, वहीं गैर सिख विधायकों को इस मामले पर अपना लिखित स्पष्टीकरण जमा करने का निर्देश दिया गया है.
यह घटनाक्रम एक अलग विवाद के बीच हो रहा है. यह विवाद कथित तौर पर मुख्यमंत्री मान से जुड़े एक आपत्तिजनक वीडियो का है. मान इस वीडियो का खंडन कर चुके हैं. लेकिन विपक्षी दलों ने उनसे इस्तीफे की मांग की है, जबकि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने इस विवाद के कुछ पहलुओं पर पुलिस कार्रवाई की मांग की है.
यह घटनाक्रम तात्कालिक संदर्भ तो देते हैं, लेकिन बड़ा मुद्दा इस समय के राजनीतिक टकराव से कहीं आगे का है.
अकाल तख्त क्या है? यह किसी सिख को भले ही वो शासक, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री या विधायक ही क्यों न हो, उन्हें अपने सामने पेश होने का आदेश क्यों दे सकता है? फैसला कैसे लिया जाता है और धार्मिक सजा का मतलब क्या होता है?
कब हुई थी अकाल तख्त की स्थापना
अकाल तख्त साहिब की स्थापना सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब ने 1609 में अमृतसर में की थी. हरमंदिर साहिब परिसर (जिसे गोल्डन टेंपल या स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है) में स्थित 'अकाल तख्त' का अर्थ है 'अकाल' (जो समय से परे है) का तख्त.
अकाल तख्त की स्थापना ने सिखों के 'मीरी-पीरी' सिद्धांत को संस्थागत रूप दिया. गुरु हरगोबिंद साहिब दो तलवारें धारण करते थे. इनमें से एक 'पीरी' आध्यात्मिक अधिकार का प्रतीक थी और दूसरी 'मीरी' सांसारिक जिम्मेदारी का प्रतीक थी. इस सिद्धांत का संदेश यह था कि आस्था अन्याय, दमन या सामूहिक सम्मान के लिए पैदा हुए खतरों के प्रति उदासीन नहीं रह सकती.
हरमंदिर साहिब भक्ति, विनम्रता और आध्यात्मिक चिंतन का प्रतीक है, जबकि अकाल तख्त न्याय, साहस और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है. ये दोनों मिलकर आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सांसारिक कर्तव्य के बीच संतुलन का प्रतिनिधित्व करते हैं. बाद में अकाल तख्त को सिखों के अधिकार का सर्वोच्च सांसारिक केंद्र और सिख आचरण, संस्थाओं और पंथ के व्यापक हितों से जुड़े गंभीर मामलों पर विचार करने का मंच माना जाने लगा.
अकाल तख्त किसी को समन क्यों भेजता है
अकाल तख्त से जारी समन, संवैधानिक अदालतों द्वारा जारी समन जैसा नहीं होता है. यह असल में धार्मिक और नैतिक जवाबदेही के लिए एक बुलावा होता है. जब सिख सिद्धांतों, सिख रहत मर्यादा या सिख आचार संहिता, किसी व्यक्ति के कार्यों या व्यापक पंथ को प्रभावित करने वाले किसी मुद्दे के बारे में कोई गंभीर शिकायत सामने आती है, तो संबंधित सिख से लिखित स्पष्टीकरण देने या व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा जा सकता है. वह व्यक्ति कोई राजनेता, धार्मिक पदाधिकारी, संस्थागत प्रतिनिधि या कोई आम सिख हो सकता है.
जिसे समन भेजा गया हो उसे दोषी नहीं माना जाना चाहिए. आदर्श रूप से यह सामूहिक निर्णय लेने से पहले अपने आचरण को समझाने, आरोपों का जवाब देने और संबंधित पेश करने का अवसर देता है. इस तरह की कार्यवाही की नैतिक ताकत निष्पक्षता, एकरूपता, भरोसेमंद सबूतों और राजनीतिक दबाव से आजादी पर निर्भर करती है.
फैसला कौन लेता है?
गंभीर मुद्दों पर पारंपरिक रूप से 'पांच सिंह साहिबान' मिलकर विचार करते हैं. ये पांच तख्तों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ सिख धार्मिक अधिकारी होते हैं. पांच सिंह साहिबान कोई भी फैसला लेने से पहले शिकायत, उपलब्ध जानकारी, संबंधित व्यक्ति द्वारा दी गई सफाई और लागू होने वाले सिख सिद्धांतों की जांच करते हैं. मामले की प्रकृति के आधार पर अकाल तख्त के फैसले को आदेश, निर्देश, संदेश, गुरमता या हुक्मनामा कहा जाता है. इन शब्दों का इस्तेमाल हमेशा एक-दूसरे की जगह नहीं किया जा सकता.
राजनीतिक और मीडिया की चर्चाओं में अकाल तख्त से की गई हर घोषणा को अक्सर 'हुक्मनामा' कह दिया जाता है. लेकिन तकनीकी रूप से, यह हमेशा सही नहीं होता. धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए क्योंकि हर शब्द का अपना एक खास संस्थागत महत्व होता है.
'तनखैया' और 'तनखाह' क्या हैं?
धार्मिक अनुशासन तोड़ने का दोषी पाए जाने वाले सिख को 'तनखैया' घोषित किया जा सकता है और उसे 'तनखाह' यानी धार्मिक प्रायश्चित करने को कहा जा सकता है. यह न तो कोई आपराधिक सजा है और न ही कोई आर्थिक जुर्माना. 'तनखाह' में श्रद्धालुओं के जूते साफ करना, बर्तन धोना, लंगर में सेवा करना, गुरबानी का पाठ करना या सुनना और अरदास में शामिल होना शामिल हो सकता है. इसका मकसद अपमान करना या बदला लेना नहीं, बल्कि विनम्रता, आत्म-चिंतन, सुधार और मेल-मिलाप है. सेवा के जरिए, एक ताकतवर शासक या मंत्री भी आम श्रद्धालुओं के साथ खड़ा होता है. यह प्रक्रिया व्यक्ति को अपनी गलती मानने, प्रायश्चित करने और पंथ के सामूहिक दायरे में फिर से शामिल होने का मौका देती है.
क्या सबको अकाल तख्त के सामने पेश होना होता है
सिख इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनसे पता चलता है कि राजनीतिक पद पर होने से कोई सिख अकाल तख्त के सामने जवाबदेही से बच नहीं जाता. सिख ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, 19वीं सदी की शुरुआत में महाराजा रणजीत सिंह को सिख सिद्धांतों के कथित उल्लंघन के मामले में अकाल तख्त के तत्कालीन जत्थेदार अकाली फूला सिंह के सामने जवाबदेही के लिए बुलाया गया था.
एक शक्तिशाली साम्राज्य पर शासन करने के बावजूद, महाराजा रणजीत सिंह को ऐसे व्यक्ति के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने खुद को किसी ऐसे शासक के रूप में पेश नहीं किया जिस पर कोई सवाल न उठाया जा सके, बल्कि एक ऐसे सिख के तौर पर पेश किया जो धार्मिक अनुशासन मानने को तैयार था. इस घटना से संदेश गया कि राजनीतिक पद होने के बावजूद, पंथ की धार्मिक सत्ता के सामने व्यक्तिगत जिम्मेदारी खत्म नहीं होती है.
आधुनिक सिख इतिहास में भी इसके और उदाहरण मिलते हैं. 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को धार्मिक जांच का सामना करना पड़ा. उन्होंने अपना स्पष्टीकरण भी दिया. पूर्व केंद्रीय मंत्री बूटा सिंह को ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सरकार की देखरेख में अकाल तख्त के पुनर्निर्माण से जुड़े होने के कारण धार्मिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा. उन्होंने माफी मांगी और सिख समुदाय में लौटने से पहले धार्मिक प्रायश्चित किया.
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला को स्वर्ण मंदिर परिसर में हुई पुलिस कार्रवाई के बाद 'तनखैया' घोषित किया गया था. उन्होंने 1988 में तख्त की ओर से तय की गई सेवा की, इसमें श्रद्धालुओं के जूते साफ करना भी शामिल था. वहीं 30 अगस्त 2024 को सुखबीर सिंह बादल को 2007 और 2017 के बीच शिरोमणी अकाली दल और बीजेपी सरकारों से जुड़े फैसलों के कारण 'तनखैया' घोषित किया गया था. दो दिसंबर को उन्हें और कई पूर्व मंत्रियों को सिख धर्मस्थलों पर धार्मिक सेवा करने का काम सौंपा गया. ये जिम्मेदारियां अलग-अलग क्षेत्रों में लागू होती हैं.
अकाल तख्त के सामने पेश होने का मतलब यह नहीं है कि विधायिका की संवैधानिक स्वतंत्रता को त्याग दिया जाए. इसी तरह, किसी सिख व्यक्ति से उसके आचरण का स्पष्टीकरण मांगने से तख्त संवैधानिक न्यायालय नहीं बन जाता. मुश्किल तब आती है जब धार्मिक जवाबदेही और संवैधानिक अधिकार को जानबूझकर एक-दूसरे के विरोधी के रूप में पेश किया जाता है.
पंजाब के सत्कार कानून के पीछे का सवाल
पंजाब सरकार का तर्क है कि गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान को रोकने और उसकी पवित्रता की रक्षा के लिए कड़े कानून जरूरी हैं. इस कानून के उद्देश्य निःसंदेह गंभीर हैं. अपमान की घटनाओं ने पंजाब में गहरी पीड़ा, सामाजिक अशांति और जनता में विश्वास के संकट को जन्म दिया है. हालांकि, वर्तमान असहमति न केवल कानून के उद्देश्य से संबंधित है, बल्कि उस प्रक्रिया से भी संबंधित है जिसके माध्यम से इसे तैयार और पारित किया गया था.
सिख धार्मिक नेताओं और एसजीपीसी का मानना है कि गुरु ग्रंथ साहिब से सीधे संबंधित कानून में अकाल तख्त और प्रतिनिधि पंथिक संस्थानों के साथ सार्थक परामर्श शामिल होना चाहिए था. बुलाए गए विधायक यह बता सकते हैं कि उन्होंने नेक नीयत से इस कदम का समर्थन किया था. लेकिन उनसे यह भी पूछा जा सकता है कि क्या कानून बनाने से पहले पर्याप्त बातचीत हुई थी. विधानसभा के पास कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार है. फिर भी, धर्म से जुड़े बेहद संवेदनशील मामले पर बातचीत करने से कानून और उसमें जनता का भरोसा, दोनों मजबूत हो सकता है.
दलगत राजनीति से परे एक परीक्षा
29 जून की कार्यवाही को केवल इस बात तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए कि कौन झुकता है, कौन माफी मांगता है या कौन सचिवालय के बाहर सबसे कड़ा राजनीतिक बयान देता है. असली परीक्षा यह है कि क्या पंजाब आस्था को चुनावी हथियार बनाए बिना या संवैधानिक विशेषाधिकार को नैतिक जवाबदेही से बचने की ढाल बनाए बिना, एक मुश्किल संस्थागत बातचीत कर सकता है.
विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है और मुख्यमंत्री को विवादित आरोपों के खिलाफ अपना बचाव करने का अधिकार है. लेकिन कोई धार्मिक घोषणा अपने आप कानूनी जांच की जगह नहीं ले सकती, ठीक वैसे ही जैसे राजनीतिक असहमति से अकाल तख्त की गरिमा कम नहीं होनी चाहिए.
अकाल तख्त इसलिए कायम नहीं है कि उसके पास पुलिस की ताकत है, बल्कि इसलिए है कि सिख पंथ में उसका ऐतिहासिक और नैतिक सम्मान है. उस अधिकार को पारदर्शिता, निष्पक्षता और संयम के जरिए बनाए रखा जाना चाहिए. विधानसभा को भी अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए.पंजाब को आस्था और लोकतंत्र के बीच टकराव की जरूरत नहीं है. उसे समझदारी भरी बातचीत की जरूरत है जिसमें दोनों संस्थाएं अपने अधिकार और अपनी सीमाओं को समझें.
समन का यही मतलब है और यह जिम्मेदारी केवल उन लोगों की नहीं है जिन्हें पेश होने के लिए बुलाया गया है, बल्कि पंजाब के पूरे राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व की भी है.
(डिस्क्लेमर: रविंदर सिंह रॉबिन एक ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट हैं. उन्हें पंजाब, सिख मामलों, सीमा मुद्दों, भारत-पाकिस्तान संबंधों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को कवर करने का दो दशकों से अधिक का अनुभव है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)