दक्षिण एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के इंडो-गंगा मैदानों और वनों में पाया जाने वाला पलाश सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि पर्यावरण संतुलन और पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार है. पलाश,वन्य जीवों के साथ गहराई से जुड़ा है. होली के आसपास इस पर्णपाति वृक्ष के सभी पत्ते गिर जाते हैं. इसके बाद से यह केसरिया-नारंगी फूलों से ढक जाता है, तब 'जंगल ज्वाला' पलाश दूर से आग जैसा प्रतीत होता है. पलाश के फूलों को उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग बनाया जाता है. इस त्रिपर्णी ढाक वृक्ष की डंडियों में हमेशा तीन पत्ते होते. इसी से प्रसिद्ध मुहावरा,'ढाक के तीन पात' बना है.
पथरीली जमीन पर भी उगता है पलाश
पलाश कड़ी गर्मी, शुष्क, पथरीली और बंजर भूमि में भी सरलता से उगता और पनपता है. इसकी मजबूत, गहरी जड़ें और कठोर बनावट इसे सूखा-रोधी बनता है. इससे यह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आस-पास हरियाली बनाए रखता है. पलाश,परागण करने वाले जीवों के लिए एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम है. पलाश के चटक नारंगी फूल तोते की चोंच की तरह मुड़े हुए और आकाश की ओर ऊपर उठे होते हैं, जो पक्षियों, मधुमक्खियां और तितलियों को आकर्षित कर परागण को बढ़ावा देते हैं.
पलाश नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता और पोषण चक्र सुदृढ़ करता है. इससे वनों और वनस्पतियों को लाभ मिलता है.
पलाश के फूल, पत्ते और बीज अनेक वन्य जीवों के लिए भोजन का स्रोत है. पक्षी और कीट इसके रस का सेवन करते हैं, जिससे परागण बढ़ता है. छोटे वन्य जीव इसके बीजों के प्रसार में सहायता करते हैं जो पलाश के जीवन चक्र को बनाए रखता है. यह तालमेल वन विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

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पलाश,पर्यावरण संरक्षण के साथ वनों के सतत विकास के लिए भी उपयोगी है. अंतरराष्ट्रीय शोध में इसे नाइट्रोजन फिक्सिंग वृक्ष, पोलिनेटर सपोर्टिंग स्पीशीज और ड्राई फॉरेस्ट रेस्टोरेशन प्लांट माना गया है. भारतीय मान्यता के अनुसार पलाश रेन इंडिकेटर वृक्ष है.
पलाश का सांस्कृतिक महत्व
पलाश के शुभ त्रिपत्रों को ब्रह्मा-विष्णु-महेश या सत-रज-तम का प्रतीक माना गया है. संस्कृत ग्रंथ इसे अग्नि ऊर्जा और पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हैं. इसकी सूखी लकड़ियां यज्ञ और पुष्प लक्ष्मी प्राप्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है. आयुर्वेद में पलाश के फूल, जड़ें, गोंद, पत्तियां और बीज कई रोगों के उपचार में इस्तेमाल की जाती हैं.
लोक कथा के मुताबिक किसी प्रेयसी के विरह-अश्रु से पलाश का जन्म हुआ. जिसकी विरह ज्वाला से इसके फूल अग्नि-रंग के हो गए. महाकवि कालिदास और जयदेव की रचनाओं में पलाश को प्रेम और विरह का प्रतीक बताया गया है. पलाश जैसे प्रतिष्ठित वृक्ष को अध्यात्म और आयुर्वेद, ज्ञान और मन-शरीर संतुलन से जोड़ते हैं. इस तरह की मान्यताएं पेड़ों का संरक्षण प्रदान करती हैं. पलाश वन्य-जीव और प्रकृति के बीच संतुलन की मजबूत कड़ी है. यह वृक्ष हमें सिखाता है- प्रकृति का हर तत्व ब्रह्मांड संतुलन का अनिवार्य हिस्सा है.
(डिस्क्लेमर: लेखिका मनोविज्ञान में पीएचडी हैं. वह एक अनुभवी मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर हैं. वो अलग-अलग विषयों पर लेख लिखती रहती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)