उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी में पिछले कई दिन से उथल-पुथल का दौर चल रहा है। कभी कौमी एकता दल का सपा में विलय होता है, और फिर अगले ही पल सीएम की मर्जी (या ज़िद कहें) के चलते उसे रद्द कर दिया जाता है। दूसरी ओर, चुनाव से पहले सीएम के मंत्रिमंडल में पांच नए चेहरे शामिल किए जाते हैं...
एक बात तो साफ है... पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव यह बात जान चुके हैं कि चुनाव जीतना है तो बेटे की मांगों पर तवज्जो देना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अखिलेश ही वह शख्स हैं, जिन्होंने यूपी की सल्तनत में समाजवादी पार्टी की वापसी कराई थी। अखिलेश की साफ छवि के चलते लोगों के मन में कहीं न कहीं यह बात ज़रूर उठ रही है कि उन्हें एक मौका और दिया जाना चाहिए। हालांकि राज्य में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति को सुधारने में अखिलेश की कोशिशें भी पूरी तरह से फ्लॉप रहीं, लेकिन देखने वाली बात यह है कि संतुलन और असंतुलन के बीच क्या यूपी की जनता को अखिलेश को एक और मौका देना चाहिए...? हो सकता है, उत्तर प्रदेश एक बार फिर अखिलेश को अपना प्रधान बना ले, लेकिन ऐसा होने की क्या होंगी बड़ी वजहें...
एक वजह यह हो सकती है कि अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी में गुंडों की एंट्री का कड़ा विरोध किया और इसी के चलते चाचा शिवपाल यादव से भी उनकी बनती नहीं दिख रही। यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाले अखिलेश यादव का काम करने का ढंग उनके पिता और चाचा से बिल्कुल अलग है। कई और वजहों के साथ शायद यह एक बड़ी वजह रही हो कि प्रदेश के युवा वर्ग में भी उन्हें ज्यादा पसंद किया जाने लगा।
एक और बात है, जिस पर गौर किया जाना चाहिए। अखिलेश सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं और यही वजह है कि उनकी युवा फैन-फॉलोइंग पहले के मुकाबले बढ़ी है। उन्होंने लोगों की समस्याओं का निवारण करने के लिए जो सोशल मंच अपनाया, उसने बखूबी अपना जादू दिखाया। अखिलेश ने फेसबुक पर पोस्ट की गई लोगों की समस्याओं का जल्द से जल्द निवारण करने की दिशा में भी उपयुक्त कदम उठाए...
अब यह उत्तर प्रदेश की जनता को तय करना है कि आखिर उन्हें कैसा सीएम चाहिए। लॉ एंड आर्डर बनाए रखने वाला या फिर युवा जोश और विकास के मार्ग पर चलने वाला... यूपी चुनाव को लेकर सामने आए एग्ज़िट पोल की मानें तो अखिलेश यादव के मुकाबले पूर्व सीएम मायावती की सरकार बनती दिख रही है, क्योंकि लोग दंगों, भ्रष्टाचार और दिन-ब-दिन बढ़ते अपराधों से मुक्ति पाना चाहते हैं...
बात टक्कर की है...
उधर, मायावती का रिकॉर्ड भी अखिलेश को टक्कर देने वाला कहा जा सकता है। उनके शासनकाल में प्रदेश का क्राइम रेट कम रहा है। यही नहीं, उन्होंने अपनी ही पार्टी के विधायक उमाकांत यादव को भूमि हथियाने के मामले में गिरफ्तार कराया है। लेकिन अखिलेश यादव अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं व अन्य नेताओं के बुरे कामों पर लगाम लाने में विफल रहे हैं। अभी यूपी चुनाव में करीब एक साल का समय बाकी है और अगर समय रहते अखिलेश यादव लॉ एंड आर्डर को लेकर लोगों का विश्वास जीत पाते हैं, तो उन्हें दूसरा मौका ज़रूर मिल सकता है...
कम सपोर्ट, ज्यादा काम...
वजहों की लिस्ट पर नजर ड़ालें तो इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अखिलेश ने अपने चार साल के कार्यकाल में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के कम सपोर्ट के बावजूद जमकर काम किया है। उन्होंने गुड-गवर्नेंस और पारदर्शिता के लिए ई-गवर्नेंस और राज्य में काफी हद तक डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा दिया। मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के लिए आज तक का सबसे बड़ा बजट पेश किया, प्राइवेट निवेश को बढ़ावा दिया और इसके चलते वर्ल्ड बैंक ने अपनी रिपोर्ट में यूपी को बिजनेस करने के लिहाज से देश के टॉप 10 राज्यों में भी शामिल किया। माना जाता है कि समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने से गुंडाराज ज़रूर बढ़ता है, लेकिन अखिलेश ने इन सभी बुराइयों के बीच काम भी बखूबी कर दिखाया है।
वे बदलाव, जो ज़रूरी थे...
क्राइम पर लगाम लगाने में नाकाम रहने वाले अखिलेश ने प्रदेश की सड़कों, पर्यटन और आर्थिक स्थिति पर भी काफी ध्यान दिया है। अखिलेश के सत्ता में आने के बाद ही उत्तर प्रदेश की टूरिज्म पॉलिसी में 1998 के बाद बदलाव हुए और 2016 में नई पॉलिसी लॉन्च की गई। पॉलिसी में इस बड़े बदलाव का राज्य को फायदा पहुंचा और इंटरनेशनल ट्रैवल मैगजीन ने यूपी को 'बेस्ट इंडियन डेस्टिनेशन फॉर कल्चर' के खिताब से नवाज़ा।
अगर उत्तर प्रदेश की जनता नहीं भूली तो...
2014-15 में अखिलेश के राज में उत्तर प्रदेश ने देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में 19 फीसदी का शेयर भी दिया। यंग सीएम ने पुराने स्टाइल की यूपी पुलिस फोर्स को फिट-फाइन बनाने के लिए भी काफी मेहनत की है और बजट में पुलिस फोर्स के मॉडर्नाइज़ेशन के लिए 216 करोड़ अलॉट किए। यही नहीं, सुपर सीएम ने अपने बजट में किसानों को भी बड़ी राहत देने की कोशिश करते हुए सूखाग्रस्त घोषित 50 जिलों में राहत कार्य के लिए 2,057 करोड़ रुपए दिए हैं। साल 2012 के बाद से यूपी के इस बेहतरीन विकास का श्रेय अखिलेश को ही जाता है और उनका यह काम उन्हें लगातार दूसरी बार यूपी की बागडोर संभालने वाला मुख्यमंत्री बना सकता है। हालांकि आखिरी फैसला जनता जनार्दन का ही होगा कि वह अखिलेश को सीएम का पदभार संभालने और राज्य को और आगे ले जाने का मौका देती है या नहीं।
सुभेष शर्मा एनडीटीवी में कार्यरत हैं...
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This Article is From Jun 29, 2016
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को मिल सकता है दूसरा मौका, अगर...
Subhesh Sharma
- ब्लॉग,
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Updated:जून 29, 2016 16:00 pm IST
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Published On जून 29, 2016 15:34 pm IST
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Last Updated On जून 29, 2016 16:00 pm IST
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