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This Article is From Jan 07, 2016

क्या इस ठेला ठेलते बुजुर्ग आदमी से कुछ सीखेंगे हम?

Sushil Kumar Mohapatra
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 07, 2016 12:52 pm IST
    • Published On जनवरी 07, 2016 04:34 am IST
    • Last Updated On जनवरी 07, 2016 12:52 pm IST
रोज हम सब रास्ते के किनारे कई ऐसे लोगों से मिलते हैं जो सड़क को अपना घर मानते हैं और सड़क के किनारे अपनी ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा बिता देते हैं। हमारी नज़र इनके ऊपर पड़ती तो है, लेकिन हम नज़रअंदाज़ करके चले जाते हैं क्योंकि हमारे देखने का नजरिया कुछ अलग होता है। शायद हम उन्हें अपने समाज का हिस्सा ही नहीं मानते। आज ऑफिस से घर आते वक़्त रात करीब 10.30 बजे जब मैं गाड़ी से उतर रहा था तब मैंने रास्ते के किनारे एक वृद्ध व्यक्ति ठेला-रिक्शा के ऊपर सोते हुए दिखाई दिया। मैं भी नज़रअंदाज़ करके चले जा रहा था, लेकिन पता नहीं क्या हुआ कुछ देर के लिए रुक गया और उनके पास गया। कुछ सवाल पूछ लिए।

उस व्यक्ति ने मुझसे जो कुछ कहा, वो मैं आपको बताता हूं। उनका नाम अयूब खान है और बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं। जब 19 साल के थे तब दिल्ली आ गए थे और कबाड़ी का बिज़नेस करते थे, लेकिन उनके दोस्त ने उन्हें धोखा दिया और पैसे लेकर भाग गया। करीब 7 साल से ठेला-रिक्शा चला रहे हैं और यह रिक्शा ही उनका सब कुछ है। दिन में एक जगह से दूसरे जगह सामान लाने ले जाने में रिक्शे का इस्तेमाल करते हैं और रात को इसको बिस्तर बनाकर सो जाते हैं। कमाई ज्यादा न होने की वजह से किराए का मकान नहीं ले पाए हैं। यह रिक्शा भी किराए का है और रोज 10 रुपये किराया देना पड़ता है।

ऐसा भी नहीं कि अयूब खान का कोई नहीं है। चार बेटे और तीन बेटियां हैं। सबकी शादी हो चुकी है। अयूब ने अपनी कमाई पर अपने बेटों का भबिष्य बनाया, बिज़नेस करने में मदद की, बेटियों की शादी करवाई। ऐसा भी नहीं है कि उनके बच्चे उन्हें पूछते नहीं हैं। सब इनका ख्याल रखना चाहते हैं, लेकिन अयूब अपने आत्म सम्मान के लिए बच्चों के पास रहना नहीं चाहते हैं। पत्नी के गुजर जाने के बाद उन्हें लगता है कि बच्चों के ऊपर बोझ बनकर रहना अच्छी बात नहीं। जो भी कुछ कमाते हैं उससे अपना गुजारा हो जाता है, अगर कुछ बच जाता है तो बचत करके रखते हैं क्योंकि अपनी नातिन यानी बेटी की बेटी की शादी में मदद करना चाहते हैं।

अयूब के पास न आधार कार्ड है न ही वोटर कार्ड। उनका कहना है कार्ड इतनी आसानी से नहीं बनता है। जहां भी जाओ लोग रिश्वत मागते हैं। एक अनपढ़ आदमी से सब रिश्वत मांगते हैं। बिना रिश्वत के कोई उनका काम नहीं करता। अयूब ने कार्ड इसीलिए नहीं बनाया, क्योंकि वह रिश्वत देना नहीं चाहते हैं। उनका मानना है कि रिश्वत देना गलत बात है।

अयूब का कहना है कि गरीब की आजकल कोई नहीं सुनता है। चाहे वह राजनेता हो या मीडिया। मजदूरों की बात कोई नहीं सुनता। राजनेता सिर्फ उनके पास पहुचते हैं, जिनसे उन्हें वोट मिलते हैं और मीडिया भी उन जैसे गरीबों की समस्या को नहीं दिखती है। उनका कहना है कि अगर वोटर पहचान पत्र होता तो वे जरूर वोट देते और सही उम्मीदवार का चुनाव करते।

इनके गांव में हिन्दू-मुसलमान मिलजुलकर रहते हैं। आज तक कभी भी हिंसा नहीं हुई। दोनों एक-दूसरे को मदद करते हैं। एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। अयूब मानते हैं कि सोच बड़ी होनी चाहिए। चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, सबके खून का रंग लाल है। तो फिर झगड़ा किस बात के लिए। सबको भाईचारे से रहना चहिए। इनके साथ कई हिन्दू ठेले वाले भी हैं, जो इनकी मदद करते हैं। कभी हिन्दू- मुसलमान के नाम पर झगड़ा नहीं करते।

जरा सोचिए एक अंगूठा छाप व्यक्ति की सोच कैसी है। चाहे कुछ भी हो जाए वह रिश्वत देना नहीं चाहता है। अपने आत्म सम्मान के लिए अपने बच्चों के ऊपर बोझ बनकर नहीं रहना चाहता है। हिन्दू-मुसलमान के नाम पर लड़ाई नहीं करना चाहता है। जो राजनेता को समझता है और राजनीति को भी। क्या सच में हमको अयूब से कुछ सीखना नहीं चाहिए? और क्या सीखना चाहिए वह हम सब जानते हैं?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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