पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के चुनाव प्रचार के थमते ही राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है. 29 अप्रैल को 142 सीटों पर मतदान होना है और पहले चरण में रिकॉर्ड वोटिंग के बाद मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है। ज्यादा मतदान से टीएमसी की धड़कनें बढ़ी हुई हैं कि आखिरकार क्या होगा? बीजेपी भी जोर लगा रही है कि इस बार ममता को कुर्सी से बेदखल कर दिया जाए, वहीं ममता को भरोसा है कि एक बार फिर टीएमसी की सरकार बनेगी. सियासी बहस अब एक ही सवाल पर आकर टिक गई है. क्या नरेंद्र मोदी की आक्रामक रणनीति बाजी मारेगी या ममता बनर्जी का मजबूत जमीनी नेटवर्क फिर से निर्णायक साबित होगा?
दूसरे चरण की अहमियत
दूसरे चरण में जिन 142 सीटों पर मतदान होना है, वे राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं. पहले चरण में जिस तरह से भारी मतदान हुआ, उसने साफ संकेत दिया है कि मतदाता इस बार बेहद सक्रिय हैं. उच्च मतदान प्रतिशत आमतौर पर बदलाव का संकेत देता है, जिससे दोनों ही दल अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं. कहा जाता है कि पहले चरण में बीजेपी का गढ़ था, जबकि दूसरे चरण में टीएमसी का वर्चस्व है, लेकिन राजनीति में कोई स्थायी वर्चस्व नहीं होता, सत्ता बदलती रहती है। कभी बंगाल में कांग्रेस का राज था, फिर लेफ्ट और अब टीएमसी. सवाल वही है क्या ममता बनर्जी की चौथी बार जीत होगी या नहीं?

बंगाल चुनाव में पीएम मोदी का रोड शो
बीजेपी और टीएमसी के चुनावी अस्त्र
बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान कानून-व्यवस्था को बड़ा मुद्दा बनाया. पार्टी का आरोप रहा कि राज्य में राजनीतिक हिंसा और अराजकता बढ़ी है. वहीं टीएमसी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष माहौल को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. बीजेपी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में ममता राज में घुसपैठियों की बढ़ोतरी हुई है, तो टीएमसी का जवाब है कि बीजेपी कम्युनल लाइन पर चुनाव में जाना चाहती है. इस चुनाव में रेवड़ी राजनीति पर जोर है. ममता सरकार की योजनाएं जैसे लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, इस चुनाव में बड़ा फैक्टर हैं. इन योजनाओं का सीधा असर महिला वोटरों पर पड़ा है, जो चुनाव का निर्णायक वर्ग माने जा रहे हैं। वहीं बीजेपी ने लक्ष्मी भंडार की काट के लिए ममता के 1500 रुपये प्रतिमाह के बदले 3000 रुपये देने का वादा किया है, वहीं बेरोजगारी भत्ते में भी ममता के 1500 रुपये की तुलना में 3000 रुपये देने का ऐलान किया है. बीजेपी ने हिंदुत्व, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को उठाया. इसके जवाब में टीएमसी ने बंगाल की अस्मिता और क्षेत्रीय पहचान को केंद्र में रखा. शिक्षक भर्ती घोटाले और अन्य मामलों को लेकर बीजेपी लगातार हमलावर रही, जबकि टीएमसी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया.
बंगाल चुनाव में ममता ने खुद संभाली कमान (फोटो-TMC)

रणनीति और दांव: किसने क्या खेला?
बीजेपी ने इस चुनाव को हाई-वोल्टेज बना दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लगातार रैलियां कीं. मोदी ने ममता के कामकाज और भ्रष्टाचारा का मुद्दा उठाया तो योगी ने हिंदुत्व कार्ड खेला. अमित शाह एनआरसी, बंग्लादेशी घुसपैठ, फर्जी राशन कार्ड के जरिए आधार कार्ड और फिर वोटर कार्ड बनवाने का आरोप लगाया. पार्टी ने राष्ट्रीय मुद्दों और मजबूत नेतृत्व को आगे रखते हुए चुनाव को बड़े विजन से जोड़ने की कोशिश की. ममता बनर्जी ने लोकल अप्रोच अपनाई। उन्होंने खुद मैदान में उतरकर पदयात्राएं कीं और सीधे जनता से संवाद किया. टीएमसी का फोकस बूथ-लेवल मैनेजमेंट और स्थानीय उम्मीदवारों पर रहा। 15 साल के शासन काल का बखान किया और ये भी संदेश दिया कि बीजेपी अगर आती है बंगाल का सेक्युलर चरित्र बदल जाएगा. उनकी कोशिश है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों का वोट मिले, जबकि बीजेपी की कोशिश है हिंदुत्व वोट को एकजुट किया जाए.
पीएम मोदी ने बंगाल चुनाव में कई रैलियां कीं (फोटो- पीएम एक्स हैंडल)

प्रचार के रंग झाल मूढ़ी बनाम सब्जी खरीदारी
प्रचार के अंतिम दिन दोनों ही दलों ने पूरी ताकत झोंक दी. बीजेपी ने बड़े चेहरों के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की, जबकि ममता बनर्जी ने कोलकाता में पदयात्रा कर अपनी मौजूदगी को मजबूत किया. यह दौर पूरी तरह शक्ति प्रदर्शन का रहा, जहां हर पार्टी ने यह दिखाने की कोशिश की कि जनता उसके साथ है. मोदी ने जनता से जुड़ने के लिए झाल मूढ़ी का स्वाद लिया और फूल खरीदकर मंदिर में पूजा की, जबकि ममता बनर्जी भी सब्जी खरीदते हुए देखी गईं. अमित शाह ने इस चुनाव में बंगाल में ही अपना डेरा जमा लिया है. बीजेपी नेता पश्चिम बंगाल की पहचान और व्यंजन को ध्यान में रखते हुए कई नेताओं को मछली खाते देखा गया. ये रणनीति का हिस्सा था. वहीं टीएमसी की सांसद सयानी घोष भी काफी चर्चा में रही. सेक्युलर एजेंडा को बढ़ाने के लिए सारे धर्मों को सम्मान करने के लिए गाना गाती देखी गईं तो कभी मेरे दिल में काबा, आंख में मदीना जैसे गाने से सोशल मीडिया पर वायरल हुई.
ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का भी मिला साथ (TMC एक्स पोस्ट)

विवाद और आरोप-प्रत्यारोप
चुनाव के दौरान कई विवाद भी सामने आए। इस बार मिली जानकारी के मुताबिक हिंसा तो हुई, लेकिन कहीं मौत की खबर नहीं है. केंद्रीय बलों की मौजूदगी में चुनाव हो रहे हैं, इसके बावजूद बीजेपी और टीएमसी नेताओं पर हमले हुए. संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई है, जिसका मकसद निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करना है. टीएमसी का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग किया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, जहां एजेंसी की कार्रवाई में हस्तक्षेप को लेकर ममता की किरकिरी भी हुई. इस चुनाव में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी आरोप लगे और एसआईआर को टीएमसी ने बड़ा मुद्दा बना दिया। इसका असर कितना होगा, यह वोटों की गिनती के दिन ही पता चलेगा.
क्या महिलाएं इस बार भी ममता का थामेंगी हाथ?

SIR विवाद क्या है
एसआईआर यानी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण भी इस चुनाव में बड़ा विवाद बना. विपक्ष, खासकर टीएमसी, ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के जरिए वोटर लिस्ट से नाम हटाए जा रहे हैं. वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि यह एक नियमित और पारदर्शी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य सूची को अपडेट करना है. एसआईआर में करीब 90 लाख लोगों के नाम काटे गए, जबकि इन्हें मौका दिया गया था कि ट्रिब्यूनलों में अपने दावे पेश कर सकें, लेकिन करीब 27 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए.
बंगाल में जनता के बीच पीएम मोदी (पीएम मोदी एक्स हैंडल)

किसका पलड़ा भारी?
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनका मजबूत जमीनी नेटवर्क, महिला वोटरों पर पकड़ और स्थानीय मुद्दों से जुड़ाव है. उनका ‘बंगाल की बेटी' वाला नैरेटिव भी प्रभावी साबित हो रहा है। बंगाली मानुष को साधने की पूरी कोशिश की गई है. दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी का करिश्माई नेतृत्व, बीजेपी का आक्रामक प्रचार और राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव चुनाव को कड़ा बना रहा है. पार्टी शहरी और युवा वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
बंगाल का यह चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि रणनीति, नैरेटिव और संगठन की परीक्षा भी है. यह मुकाबला अब सीधा और कड़ा हो चुका है, जहां हर वोट मायने रखता है. बंगाल के नतीजे से देश की राजनीति की दिशा भी तय होगी. अगर ममता फिर से जीत जाती हैं तो यह साबित होगा कि बंगाल की राजनीतिक ‘रॉयल शेरनी' वही हैं और ये संदेश जाएगा मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने ममता के गढ़ को भेद नहीं पाए. अगर मोदी जीतते हैं तो पहली बार बंगाल में भगवा परचम लहराएगा और देश की राजनीति में विपक्ष को एक संदेश जाएगा कि तमाम आरोपों के बावजूद जनता में मोदी की पकड़ बरकरार है, जिसका असर पंजाब पर भी पड़ सकता है.
(डिस्क्लेमर: लेखक राजनैतिक और चुनाव विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं. उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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