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समझौते के कितने करीब हैं अमेरिका-ईरान,डोनाल्ड ट्रंप को 'आंतकी देश' से क्यों हैं शांति की उम्मीद

राजन कुमार और निंबस भाटी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 17, 2026 21:18 pm IST
    • Published On अप्रैल 17, 2026 19:01 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 17, 2026 21:18 pm IST
समझौते के कितने करीब हैं अमेरिका-ईरान,डोनाल्ड ट्रंप को 'आंतकी देश' से क्यों हैं शांति की उम्मीद

पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों को समाप्त करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है. दुनिया भर में बहुत उम्मीदें हैं और कुछ आशा की किरण दिखाई दे रही है, लेकिन संघर्ष की जटिलताओं को देखते हुए, किसी दीर्घकालिक समाधान की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी.

पश्चिम एशियाई संकट क्षेत्रीय संघर्ष, धार्मिक मतभेद, क्षेत्रीय भू-राजनीति और तेल संसाधनों पर नियंत्रण का एक जटिल मिश्रण है. लंबे समय तक, अमेरिका ने अरब देशों, इजरायल और तुर्की के साथ मजबूत संबंध बनाए रखकर और ईरान को प्रतिबंधों के माध्यम से अलग-थलग करके क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखा. लेकिन ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले ने स्थिति को इस कदर बिगाड़ दिया है कि अब इसे संभालना मुश्किल है. 

क्यों विफल हुई डोनाल्ड ट्रंप की योजना

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दबाव और वेनेजुएला में मिली सैन्य सफलता से उत्साहित होकर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता परिवर्तन की उम्मीद में ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करने का फैसला किया. विशेषज्ञों की सलाह को नजरअंदाज करते हुए और अपने अनुभवहीन सलाहकारों पर भरोसा करते हुए ट्रंप ने सोचा कि अगर सर्वोच्च नेता को हटा दिया गया तो ईरान में अयातुल्ला शासन बिखर जाएगा.

लेकिन जैसा कि स्पष्ट है, ऐसा कुछ नहीं हुआ. ईरानी शासन कायम है और उसका प्रतिरोध जारी है. ईरानी शासन ने 'पोर्क्यूपाइन रणनीति' अपनाई और अदम्य दृढ़ संकल्प दिखाया. अमेरिका को निशाना बनाने में असमर्थ, उसने मिसाइलों और ड्रोनों से अमेरिका के पश्चिम एशियाई सहयोगियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. इसके अलावा, उसने होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दिया, जो दुनिया के 20 प्रतिशत कच्चे तेल व्यापार का मार्ग है. अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी घबरा गए और ऊर्जा की कीमतें आसमान छू गईं, जिससे पूरी दुनिया में दहशत फैल गई.

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ट्रंप ने ईरान की इस रणनीति की कभी उम्मीद नहीं की थी और परिणामस्वरूप उनकी पूरी योजना विफल हो गई. ट्रंप न तो अपना मूल लक्ष्य यानी सत्ता परिवर्तन हासिल कर सके और न ही ईरान के तेल क्षेत्रों पर कब्जा कर सके. निःसंदेह, ईरान को भारी क्षति हुई, लेकिन उसकी लड़ने की क्षमता बनी हुई है और उसके नियंत्रण में रणनीतिक संपत्तियां हैं. वह होर्मुज जलडमरूमध्य को एक हथियार के रूप में और तेल की बढ़ती कीमतों को एक सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल कर रहा है.

ट्रंप ने 'आतंकवादी राज्य'को बनाया शांति का सूत्रधार

ईरान के कड़े प्रतिरोध और तीव्र जवाबी कार्रवाई को देखते हुए, अमेरिका के पास दो विकल्प थे: या तो जमीनी अभियान के लिए बड़ी संख्या में सैनिक भेजना, या बातचीत का रास्ता चुनना. भारी जानमाल के नुकसान और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के डर से ट्रंप बड़ी संख्या में सैनिक भेजने को तैयार नहीं हैं. अमेरिका में लगभग 60 फीसदी लोग ईरान में जमीनी सेना भेजने के खिलाफ हैं. केवल 30 प्रतिशत अमेरिकी ट्रंप के युद्ध का समर्थन करते हैं. दरअसल, ट्रंप प्रशासन को घरेलू स्तर पर भी प्रतिकूल माहौल का सामना करना पड़ रहा है और ईरान अमेरिका की इस कमजोरी को जानता है.

इसलिए, ट्रंप प्रशासन एक सम्मानजनक निकास रणनीति पर काम कर रहा है. उन्होंने अपने नव-मित्र, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के माध्यम से ईरान के साथ बातचीत शुरू की है. विडंबना यह है कि ट्रंप ने पहले कई बार पाकिस्तान को 'आतंकवादी राज्य' कहा है, लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान, पाकिस्तान सरकार ने ट्रंप के अहंकार की मालिश करने और उनकी वफादारी हासिल करने में कामयाबी हासिल की है. पाकिस्तान अपनी छवि को 'विफल राज्य' से 'शांति के सूत्रधार' में बदलने के लिए अथक प्रयास कर रहा है. यह कितना सफल होता है, यह तो अभी देखना बाकी है, लेकिन इसने अपनी भूमिका के लिए स्पष्ट रूप से वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है.

सरल शब्दों में कहें तो, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के तीन मुख्य मुद्दे हैं: ईरान द्वारा यूरेनियम संवर्धन रोकना, होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना और ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना.

क्या ईरान किसी और को देगा अपना यूरेनियम

चूंकि ट्रंप सत्ता परिवर्तन या तेल पर नियंत्रण जैसे अपने किसी भी स्पष्ट लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए हैं, इसलिए उनके लिए यूरेनियम संवर्धन पर कुछ रियायतें प्राप्त करना अनिवार्य है. यदि तेहरान सीमित समय के लिए भी यूरेनियम संवर्धन बंद करने के लिए सहमत हो जाता है, तो ट्रंप इसे अपनी एक बड़ी जीत घोषित करेंगे. इससे संबंधित एक और मुद्दा ईरान के 440 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम को किसी अन्य देश को संभावित हस्तांतरण है. रूस ने इस संबंध में ईरान की मदद की पेशकश की है, लेकिन यह निश्चित नहीं है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम का पूरा या आंशिक हिस्सा किसी तीसरे देश को हस्तांतरित करने या उसके सत्यापन को सुनिश्चित करने के लिए सहमत होगा या नहीं.

दूसरा मुद्दा बिना किसी पारगमन शुल्क के होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना है. ईरान ने तेल के प्रवाह को बाधित करने के लिए इसे अवरुद्ध कर रखा है. लेकिन ईरान इस बात पर तभी सहमत होगा जब अमेरिका सैन्य हमले को समाप्त करने और ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने का वादा करे. ईरान होर्मुज जलमार्ग को स्थायी रूप से बंद नहीं रख सकता क्योंकि इससे न केवल अमेरिका और खाड़ी देशों पर बल्कि भारत, चीन और यूरोपीय देशों सहित कई अन्य देशों पर भी असर पड़ेगा. वह कुछ पारगमन शुल्क बनाए रखने पर जोर दे सकता है लेकिन इसे भी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा. इससे ईरान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा होगी.

इजरायल और लेबनान सीजफायर से बढ़ी उम्मीदें

तीसरा प्रमुख मुद्दा ईरान पर लगे आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंधों को हटाना है. प्रतिबंधों के कारण ईरान अन्य देशों के साथ खुले तौर पर व्यापार नहीं कर सकता. द्वितीयक प्रतिबंधों के डर से, चीन और रूस को छोड़कर अधिकांश देशों ने ईरान के साथ व्यापार बंद कर दिया है. सफल बातचीत के लिए, ईरान प्रतिबंध हटाने पर जोर देगा.ईरान अपने 100 अरब डॉलर के फ्रीज हुई परिसंपत्तियों पर वापस पाने की भी मांग करेगा. यदि ईरान परमाणु मुद्दे पर सहमत हो जाता है तो अमेरिका को प्रतिबंध हटाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. 

वार्ता की सफलता के संदर्भ में, इजरायल और लेबनान के बीच अस्थायी युद्धविराम एक सकारात्मक घटनाक्रम है. इससे अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य की वार्ताओं के लिए अनुकूल माहौल बनेगा. एक बात स्पष्ट है कि न तो अमेरिका और न ही ईरान इस युद्ध को और आगे बढ़ाना चाहते हैं. दोनों ही देश इससे बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं. लेकिन इजरायल ईरान को दी गई अमेरिकी रियायतों से बहुत खुश नहीं है. उसे डर है कि इस स्तर पर युद्धविराम से ईरान का हौसला बढ़ेगा और क्षेत्रीय प्रभाव में वृद्धि हो सकती है. वह ईरान का पूर्ण आत्मसमर्पण चाहता है. लेकिन ट्रंप धीरे-धीरे पश्चिम एशिया में अपने सैन्य दुस्साहस के राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक नुकसानों को समझने लगे हैं. इससे बातचीत और युद्धविराम की अवधि बढ़ाने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं. युद्धविराम बनाए रखना और संकट को कम करना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए क्योंकि पश्चिम एशिया में संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद करना भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से परे एक कोरी कल्पना मात्र है. 

(डिस्क्लेमर: डॉक्टर राजन कुमार दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फार रसियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज में पढ़ाते हैं. निम्बस भाटी इसी सेंटर में पीएचडी कर रही हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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