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This Article is From Apr 24, 2021

मरघट जैसे सन्नाटे से भरी राजधानी में वे चले गए

Priyadarshan
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 24, 2021 21:42 pm IST
    • Published On अप्रैल 24, 2021 21:42 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 24, 2021 21:42 pm IST

उनसे मेरी पहली मुलाकात साल 1991 में कभी हुई थी. वे डॉ माहेश्वर तिवारी के साथ रांची आए हुए थे और ब्रिटिश लाइब्रेरी में हमारे अभिभावक जैसे बहुत सुसांस्कृतिक लाइब्रेरियन जेएन प्रसाद के यहां ठहरे थे. तो एक शाम हम सब साथ बैठे- यानी ‘प्रांगण' के उस नाट्य समूह के बहुत सारे युवा साथी जिसके साथ मेरा एक आत्मीय संबंध था.

हालांकि एक लेखक के तौर पर रमेश उपाध्याय हमारे लिए एक सुपरिचित नाम थे और कम से कम एक आत्मीय रिश्ता उनसे उसके पहले का भी था जिसकी ख़बर उनको नहीं थी. हमारी नाट्य संस्था ‘हस्ताक्षर' ने उनके लिखे नाटक ‘हरिजन दहन' के मंचन पर 1975 में इलाहाबाद के बहुभाषाभाषी नाट्य समारोह में अध्यक्षीय पुरस्कार हासिल किया था. हालांकि यह बात रंगमंच और ‘हस्ताक्षर' से मेरे जुड़ने से 10 साल पहले की थी, लेकिन इसका कुछ गौरव के साथ अक्सर होने वाला ज़िक्र इस नाटक के लेखक को भी हमारे बीच का बना देता था- यह अलग बात है कि ख़ुद लेखक को इस बात की जानकारी बरसों बाद मिली जब मैंने दिल्ली में उनसे परिचय के बाद उनको इसके बारे में बताया. उन्होंने हंस कर कहा, ‘अरे, मुझे मंचन की सूचना देनी चाहिए थी.‘

दिल्ली में पहली बार मैं उनके घर 1993 में गया था. उस साल पढ़ी हुई किताबों के बारे में एक परिचर्चा के लिए जो ‘दैनिक हिंदुस्तान' में प्रकाशित हुई थी. उसमें प्रूफ की इतनी भूलें थीं कि मैं शर्मिंदा हो गया था. खुद रमेश उपाध्याय का नाम रमेश उपाध्यक्ष छपा था.

बहरहाल, तब तक यह पता नहीं था कि एक दिन उनसे पारिवारिक परिचय इतना प्रगाढ़ होगा कि मैं उस परिवार का सदस्य सा हो चुका होऊंगा. पहले प्रज्ञा और फिर संज्ञा इस आत्मीय संबंध की सूत्रधार बनी रहीं- इस हद तक कि उनका जाना मुझे बिल्कुल व्यक्तिगत क्षति की तरह व्याकुल करता रहा.

शायद यह भी एक वजह है कि एक लेखक के रूप में उन्हें मैं सहज रूप से याद नहीं कर पाता था- ‘कथन' के संपादक के तौर पर भी नहीं. वे मुझे पिछले कुछ वर्षों से बस संज्ञा और प्रज्ञा के पिता की तरह याद आते थे- हालांकि उनका स्वभाव देखते हुए यह बात कुछ अजीब सी थी, क्योंकि वे बहुत संवादप्रिय थे और युवा लोगों से बिल्कुल मित्रवत बात करने में ज़रा भी हिचकते नहीं थे.

निस्संदेह वे बड़े लेखक थे. ख़ास कर अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों में ‘सारिका में उनका एक कॉलम चला करता था- ‘किसी देश के किसी शहर में'. वह कथा-लेखन की युक्तियों पर केंद्रित कॉलम था- मेरा प्रिय कॉलम. बाद के वर्षों में उनका कथा लेखन और उनका वैचारिक हस्तक्षेप मेरे लिए महत्वपूर्ण रहा. वे जनवादी मूल्यों में विश्वास करने वाले लेखक रहे जिनकी निष्ठाएं उत्तर सोवियत काल में साम्यवादी दुर्गों के ध्वंस के बावजूद

निष्कंप बनी रहीं. फिर वे बहुत सारे लोगों की तरह सिर्फ़ लिखने में नहीं, लेखन को संघर्ष के दूसरे मोर्चों से जोड़कर चलने में भी यक़ीन रखते थे. यह अनायास नहीं था कि वे लेखक संगठनों से भी जुड़े, उनके क्षरण पर चिंता भी जताते रहे, उन्होंने ‘कथन' जैसी पत्रिका भी लगभग आंदोलन की तरह निकाली जिसकी विरासत अब संज्ञा के समर्थ और ज़िद्दी हाथों में है. उन्होंने भूमंडलीय यथार्थवाद पर पूरी किताब लिखी और उदारीकरण के पूरे दौर को प्रश्नांकित किया. उन्होंने बाक़ायदा शब्द-संधान जैसा प्रकाशन भी शुरू किया, ‘आज के सवाल' जैसी महत्वपूर्ण शृंखला संपादित करते रहे जिसकी कई किताबें हमारे समय की वैचारिक थाती हैं और कई ज़रूरी किताबों के अनुवाद किए. बाज़ारवाद को वे संदेह से देखते रहे और जन-संघर्ष को सम्मान देते रहे.

यह उनकी लेखकीय आंदोलनधर्मिता ही थी कि जब सोशल मीडिया का दौर आया तो उन्होंने ख़ुद को इसके लिए भी तैयार किया. वे फेसबुक पर बिल्कुल युवाओं की तरह सक्रिय थे और युवाओं से संवादरत थे. यहां भी वे सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देकर नहीं रह गए, यहां उन्होंने अपने स्वभाव के अनुकूल एक नई विधा भी गढ़ ली. पारस्परिक संवादों की एक लड़ी बनाकर वे किसी एक विषय पर अपनी सुचिंतित राय रख देते- कभी इसमें व्यंग्य होता, कभी चुटीलापन होता, कभी सीधे-सीधे तर्क-वितर्क होता, लेकिन अंततः एक ठोस दृष्टिकोण हमारे हाथ लगता.

उनसे व्यापक वैचारिक सहमति के बावजूद कथा और लेखन के कई मुद्दों पर मेरी असहमति भी रही. एक बार मैंने ‘कथन' में ही उनके लिखे की प्रतिक्रिया में एक लंबा लेख लिखा जो दरअसल उनकी कई मान्यताओं के विरुद्ध जाता था.

वे बहुपठित बौद्धिक थे लेकिन एक पारिवारिक क़िस्म की सहजता-सरलता उनके भीतर थी. इसी वजह से उनकी बौद्धिकता बहुत व्यक्तिगत चीज़ न रह कर एक पूरा पर्यावरण बनाती रही जिसके साये में उनके बच्चे बड़े हुए. उनकी पत्नी सुधा उपाध्याय ने भी लिखना शुरू किया और कुछ साल पहले उनकी आत्मकथात्मक किताब भी आई. रमेश जी ने कभी हल्के से यह आग्रह किया था कि उस किताब पर एक टिप्पणी करूं, लेकिन मेरी भागती-दौड़ती दिनचर्या के बीच आधे-अधूरे ढंग से किए जा रहे लेखन के बीच यह वादा अधूरा रह गया.

वे कई दूसरे लेखकों के साथ कभी दिल्ली के साहित्यिक माहौल की पहचान हुआ करते थे- दोस्तों और साहित्यिक बहसों की ऊष्मा से लैस. एक खिलखिलाती, भरी-पूरी दिल्ली को उन्होंने अपना घर बनाया और इसी में घर बसाया. लेकिन क्या दुर्योग है कि जिस समय वे गए, उस समय पूरी दिल्ली मरघट जैसे सन्नाटे में डूबी हुई थी. शहर में लॉकडाउन था, अस्पतालों में कोरोना की दहशत, दवा-दुकानों पर ख़त्म हो चुकी ज़रूरी दवाओं के लिए गुहार लगाते बेहाल परिजनों की भीड़, और टीवी चैनलों पर देश भर की डरावनी तस्वीरें. यह वही समय था जब पूरा देश जैसे जमाखोरों और कालाबाज़ारियों की गिरफ़्त में था. इस समय एंबुलेंस, ज़रूरी दवाएं, इंजेक्शन, और ऑक्सीजन तक ब्लैक में मिल रहे थे- कई-कई गुना दाम देकर.

वे 80 बरस के थे. उनकी पहली कहानी मेरे पैदा होने से पांच बरस पहले छपी थी- 1962 में. उनकी आख़िरी किताब बीते साल आई- ‘साहित्य की नई नैतिकता.‘ बीच में पांच उपन्यास, बीस कहानी संग्रह, पांच आलोचनात्मक किताबें और ढेर सारी अन्य किताबें आती रहीं. यानी उनकी सक्रियता बताती थी कि अगले कई बरस उनको रहना है. उनकी मौत बस कोरोना से नहीं हुई. वे कोरोना मरीज़ों से भरे एक अस्पताल के उपेक्षित

कोने में छोड़ दिए गए- ऐसे समय- जब उनके परिवार के हर सदस्य को कोरोना था. जाहिर है, वे इस देश के लुंजपुंज स्वास्थ्य तंत्र की भेंट चढ़ गए. अपने घटते ऑक्सीजन स्तर के बीच डूबती-उतराती संज्ञा अपने पिता को अपनी आंखों के सामने जाता देखती रही और एक तरफ़ अपनी मां और दूसरी तरफ़ अपनी बेटी की चिंता में बदहवास प्रज्ञा रो-रोकर सबको पुकारती रही.

यह एक निजी या पारिवारिक त्रासदी नहीं, यह एक सामाजिक त्रासदी है जिसके बहुत सारे प्रतिबिंब हमारे चारों तरफ़ दिख रहे हैं. जब यह पंक्तियां लिख रहा हूं तो फेसबुक मित्र और जोशीले टिप्पणीकार अजित साहनी की याद आ रही है जो बहुत ही जीवंत टिप्पणियां करते रहे- चार दिन पहले तक उन्होंने ऑक्सीजन न मिलने और दवाओं की कालाबाज़ारी पर चुटकियां लीं- आज उनके चल बसने की ख़बर आई. फेसबुक पर कभी उन्होंने एक वीडियो साझा किया था जिसमें वे फ़ैज़ की ग़ज़ल गा रहे थे- ‘गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले.‘ किससे कहें कि अब चले आओ, अभी सारा गुलशन उजड़ा हुआ दिख रहा है. यह बहुत गहरे दुख में डूबा हुआ समय है, जिसके विरुद्ध खड़े होने की अलख हमेशा रमेश उपाध्याय जगाते रहे. देखें, अब इस विरासत को हम कितना सहेज-संभाल पाते हैं.

प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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