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तालिबान 2.0 में कितना बदला अफगानिस्तान, उसे किस नजर से देख रही है दुनिया

डॉ. श्रीश कुमार पाठक
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 20, 2026 17:35 pm IST
    • Published On अगस्त 20, 2026 17:35 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 20, 2026 17:35 pm IST
तालिबान 2.0 में कितना बदला अफगानिस्तान, उसे किस नजर से देख रही है दुनिया

15 अगस्त 2021 को जब तालिबान के लड़ाके काबुल में दाखिल हो रहे थे, उसी समय अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी दुनिया अपने सैनिकों और नागरिकों को अफगानिस्तान से निकालने में लगी थी. काबुल एयरपोर्ट पर उमड़ी भीड़, अमेरिकी विमानों के पीछे भागते लोग और किसी भी तरह उस मुल्क से निकल जाने को बेचैन अफगान दुनिया ने देखे थे. तब सवाल था कि तालिबान के लौटने के बाद अफगानिस्तान का क्या होगा?

आज उस सवाल के पांच साल बाद शायद जवाब पहले से थोड़ा साफ है.

अफगानिस्तान न तो वह पूरी तरह विफल राष्ट्र बना, जिसकी आशंका दुनिया के एक बड़े हिस्से को थी और न ही वह स्थिर इस्लामी अमीरात बना पाया है, जिसका सपना तालिबान दुनिया को दिखाना चाहता है. तालिबान ने अफगानिस्तान पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है, युद्ध को काफी हद तक रोक दिया है, सरकारी राजस्व जुटाने की क्षमता बढ़ाई है और प्रशासन को अपने ढंग से चला रहा है. लेकिन इसी के साथ उसने अफगान समाज के उस हिस्से की आवाज को लगभग खत्म कर दिया है, जो उसके शासन से सहमत नहीं है. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस सरकार के पास आज अफगानिस्तान के लगभग पूरे भूभाग पर नियंत्रण है, उसे दुनिया के अधिकांश देशों ने अभी तक औपचारिक मान्यता नहीं दी है.

1996 और 2021 वाले तालिबान में अंतर क्या है

तालिबान 2.0 को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि 1996 वाला तालिबान और 2021 के बाद वाला तालिबान एक जैसा नहीं है. अंतर यह नहीं कि तालिबान उदार हो गया है. अंतर यह है कि इस बार तालिबान को एक पूरे देश को चलाना है. 1996 में तालिबान सत्ता में आया था तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विरोधियों को हराना थी. आज उसके सामने चुनौती है कि जिस अफगानिस्तान को उसने जीत लिया है, उसे चलाए कैसे. और यहीं से तालिबान 2.0 की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है.

सत्ता जितनी काबुल में दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक कंधार में बैठी है. सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदजादा कंधार से शासन करते हैं. वे सार्वजनिक जीवन में बहुत कम दिखाई देते हैं. लेकिन उनके आदेश पूरे शासन तंत्र की दिशा तय करते हैं. काबुल में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, विदेश मंत्री और दूसरे मंत्री रोजमर्रा का प्रशासन चलाते दिखाई देते हैं, लेकिन अंतिम राजनीतिक और वैचारिक शक्ति कंधार में केंद्रित होती जा रही है. यानी तालिबान ने सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं किया, बल्कि उसे और अधिक केंद्रीकृत कर दिया. 2004 का संविधान निलंबित है. चुनाव नहीं हुए हैं. राजनीतिक विपक्ष के लिए जगह नहीं है. सत्ता की वैधता जनता के मत से नहीं, बल्कि धार्मिक आदेश और तालिबान की अपनी वैचारिक व्यवस्था से आती है. यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है. क्या किसी देश पर नियंत्रण स्थापित कर लेना ही उस देश पर शासन करना है? इसका जवाब अभी अफगानिस्तान की जनता को मिलना बाकी है.

तालिबान सरकार के मंत्री काबुल तो सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदजादा कंधार से शासन करते हैं.

तालिबान सरकार के मंत्री काबुल तो सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदजादा कंधार से शासन करते हैं.
Photo Credit: AP

अफगानिस्तान केवल काबुल नहीं है

यह देश सदियों से अलग-अलग जनजातियों, भाषाई समुदायों, जातीय समूहों और स्थानीय सत्ता संरचनाओं का देश रहा है. पश्तून, ताजिक, हजारा, उज़्बेक और अनेक दूसरे समुदाय अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव के साथ यहां रहते आए हैं. अफगानिस्तान की सबसे पुरानी राजनीतिक समस्या यही रही है कि काबुल की सत्ता और प्रांतों की वास्तविक शक्ति के बीच कितना तालमेल हो. तालिबान ने इस समस्या का कोई नया लोकतांत्रिक समाधान नहीं निकाला है. उसने इसका अपना समाधान निकाला है. 

जो तालिबान नेतृत्व के साथ हैं, उनके लिए सत्ता का रास्ता खुला है. जो वैचारिक रूप से या राजनीतिक रूप से अलग खड़ा है, उसके लिए रास्ता मुश्किल होता गया है. ऐतिहासिक रूप से गैर-पश्तून क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण पदों पर कंधार के प्रति वफादार लोगों की नियुक्ति हुई है. पारंपरिक लोया जिरगा जैसी स्थानीय राजनीतिक परंपराओं की जगह नियंत्रित धार्मिक सभाओं ने ले ली है. लेकिन यह व्यवस्था पूरी तरह शांत भी नहीं है. 2022 में उज़्बेक और ताजिक कमांडरों से जुड़े विवादों ने तालिबान के भीतर तनाव पैदा किया. बल्खाब में हजारा कमांडर का विद्रोह कुचल दिया गया. तालिबान के भीतर ही कंधार के बढ़ते केंद्रीकरण को लेकर असंतोष की खबरें आती रही हैं. इसका मतलब साफ है. तालिबान ने अफगानिस्तान की केंद्र और परिधि की समस्या समाप्त नहीं की है. उसने केवल उसके स्वरूप को बदल दिया है. पहले काबुल और प्रांतों के बीच चुनाव, सत्ता, पैसे और विदेशी सहायता का खेल था. आज वहां वैचारिक निष्ठा, धार्मिक सत्ता और केंद्रीकृत नियंत्रण का खेल है.

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अधिक परेशान आम अफगानी है. अफगानिस्तान आज पूरी तरह आर्थिक रूप से तबाह नहीं है. यह कहना गलत होगा. विश्व बैंक के अनुसार अफगान अर्थव्यवस्था ने 2025 में लगातार दूसरे वर्ष वृद्धि दर्ज की. 2025 में आर्थिक वृद्धि लगभग 4.3 फीसद रहने का अनुमान था. कर संग्रह बढ़ा है. गेहूं का उत्पादन बेहतर हुआ है. बाजार में कुछ स्थिरता आई है. लेकिन क्या इससे एक अफगान की जिंदगी बेहतर हो गई? इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है. आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है. प्रति व्यक्ति आय पर दबाव है. युवाओं में बेरोजगारी बहुत अधिक है. बैंकिंग व्यवस्था कमजोर है. लाखों अफगान ईरान और पाकिस्तान से वापस लौट रहे हैं, लेकिन उनके लिए रोजगार कहां है? सितंबर 2023 से जुलाई 2025 के बीच ही 40 से 47 लाख अफगान ईरान और पाकिस्तान से वापस लौटे हैं. इतनी बड़ी संख्या में लौटने वाले लोगों को रोजगार, घर और भोजन देने की क्षमता अफगान अर्थव्यवस्था में अभी नहीं है. यानी अफगानिस्तान में आज युद्ध कम है, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं हुआ. पहले अफगानी गोली से डरता था. आज वह बेरोजगारी, भूख, भविष्य और अपने बच्चों की पढ़ाई से डरता है और अफगान महिलाओं के लिए तो पांच साल का यह सफर और भी भयावह है.

तालिबान ने क्या उपलब्धियां हासिल की हैं

तालिबान 2.0 की कुछ उपलब्धियां भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना ईमानदार विश्लेषण नहीं होगा. सबसे बड़ा उदाहरण अफीम की खेती है. अप्रैल 2022 में तालिबान ने अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगाया और इसके बाद अफीम उत्पादन में लगभग 90 से 95 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई. दुनिया के किसी भी देश में अवैध मादक पदार्थों की खेती में इतनी बड़ी गिरावट दुर्लभ है. तालिबान ने देश में लंबे समय से चले आ रहे व्यापक युद्ध को भी लगभग खत्म कर दिया है. आज अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों में 2001 से 2021 के बीच जैसा लगातार सरकारी सेना और तालिबान का युद्ध नहीं है. सरकार कर वसूल रही है. प्रशासन चल रहा है. सीमाएं और प्रमुख शहर उसके नियंत्रण में हैं. लेकिन हर उपलब्धि के पीछे एक दूसरी कहानी भी है.

अफीम की खेती बंद हुई तो लाखों ग्रामीण किसानों की आमदनी भी प्रभावित हुई. जिन किसानों के पास वैकल्पिक रोजगार नहीं था, उनके लिए अफीम केवल नशे का कारोबार नहीं बल्कि जीवनयापन का साधन भी थी. इसी तरह युद्ध कम हुआ है लेकिन हिंसा खत्म नहीं हुई. इस्लामिक स्टेट खुरासान, जिसे IS-K कहा जाता है, अभी भी तालिबान के लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती है. नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट भी तालिबान के खिलाफ संघर्ष करता रहा है. इसलिए तालिबान की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उसने युद्ध को सीमित किया है. लेकिन शांति अभी पूरी तरह नहीं आई है.

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फिर आती है वह तस्वीर, जिसे तालिबान की कोई भी उपलब्धि छिपा नहीं सकती.

2021 के बाद से तालिबान ने महिलाओं और लड़कियों पर एक के बाद एक प्रतिबंध लगाए. लड़कियों की छठी कक्षा के बाद की शिक्षा बंद है. विश्वविद्यालयों में महिलाओं की शिक्षा पर भी रोक है. महिलाओं के रोजगार, आवाजाही और सार्वजनिक जीवन पर गंभीर प्रतिबंध हैं. दुनिया में अफगानिस्तान आज ऐसा अकेला देश है जहां लड़कियों को छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने से रोक दिया गया है. यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं है. एक देश की आधी आबादी अगर स्कूल नहीं जा सकती, नौकरी नहीं कर सकती, सार्वजनिक जीवन में हिस्सा नहीं ले सकती तो उस देश का भविष्य कैसे बनेगा? यही वह प्रश्न है जिसका जवाब तालिबान के पास नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति को लगातार गंभीर बताया है. मनमानी गिरफ्तारियां, यातना, जबरन गायब किया जाना, सार्वजनिक दंड और राजनीतिक असहमति पर नियंत्रण जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं. तालिबान की अदालतों ने 2025 में ही 1,110 से अधिक लोगों को कोड़े मारने की सजा दिए जाने की सूचना दी. मामला यहीं नहीं रुकता. अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने महिलाओं के उत्पीड़न को मानवता के विरुद्ध अपराध मानते हुए अखुंदजादा और तालिबान के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हकीम हक्कानी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर रखा है.यानी यह अब केवल मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों तक सीमित मामला नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी जवाबदेही का सवाल बन चुका है. इसलिए तालिबान ने राज्य तो बना लिया है, लेकिन वह कैसा राज्य है, यह सवाल अभी भी उतना ही बड़ा है

तालिबान से दुनिया का तालमेल कैसा है

जिस तालिबान को 2021 में दुनिया अलग-थलग समझ रही थी, उसने पांच साल में यह साबित कर दिया कि औपचारिक मान्यता के बिना भी दुनिया से व्यवहार किया जा सकता है. रूस ने जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दी. वह ऐसा करने वाला पहला देश बना. चीन ने तालिबान से शुरुआती दौर से ही संपर्क बनाए रखा. चीन की चिंता केवल अफगानिस्तान के खनिजों तक सीमित नहीं है. उसे सबसे अधिक चिंता अपने शिनजियांग की सुरक्षा और इस बात की है कि अफगान जमीन से उसके खिलाफ कोई आतंकवादी गतिविधि न चले. मध्य एशियाई देशों ने भी तालिबान से दूरी बनाने के बजाय व्यावहारिक संबंधों का रास्ता चुना है. व्यापार, मानवीय सहायता और ट्रांस-अफगान कनेक्टिविटी पर बातचीत चल रही है. अमेरिका अभी तालिबान को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद भी नहीं हैं. यानी दुनिया का बड़ा हिस्सा तालिबान को पसंद नहीं करता, लेकिन उसके साथ बात करना जरूरी समझता है. यही तालिबान 2.0 की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता है. मान्यता नहीं, लेकिन संपर्क. स्वीकृति नहीं, लेकिन संवाद.

लेकिन तालिबान की विदेश नीति का सबसे बड़ा उलटफेर पाकिस्तान के साथ हुआ है. साल 2021 में जब तालिबान काबुल पहुंचा तो पाकिस्तान को लगा था कि उसके पड़ोस में अब एक ऐसी सरकार होगी जिस पर उसका प्रभाव रहेगा. लेकिन पांच साल बाद तस्वीर बिल्कुल अलग है. यह अंतर जितना समझा जाता है, हकीकत उससे कहीं अधिक गंभीर है. तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान (टीटीपी) का मुद्दा, सीमा विवाद और डूरंड रेखा ने दोनों देशों के रिश्तों को खराब कर दिया है. पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की जमीन से टीटीपी पाकिस्तान के खिलाफ हमले कर रहा है. अफगानिस्तान का अपना तर्क है. अक्टूबर 2025 में सीमा पर झड़पें शुरू हुईं. इसने दोनों देशों के बीच व्यापार को पूरी तरह ठप कर दिया. यह तो केवल शुरुआत थी. फरवरी 2026 के आखिर में पाकिस्तान ने काबुल, कंधार और पक्तिया पर व्यापक हवाई हमले किए.इसे क्षेत्रीय विश्लेषकों ने खुला युद्ध करार दिया. 16 मार्च को काबुल के नजदीक एक हमले में करीब 400 लोग मारे गए. यह संघर्ष की सबसे भीषण घटना थी. सऊदी अरब, कतर और तुर्की की मध्यस्थता से ईद पर बमुश्किल पांच दिन का संघर्ष-विराम हुआ.इसके बाद फिर उल्लंघन की खबरें आने लगीं.

अफगानिस्तान-पाकिस्तान का अनसुलझा सीमा विवाद

यह अब सीमा विवाद भर नहीं रहा. यह दक्षिण एशिया का एक जीवंत, अनसुलझा युद्ध बन चुका है. तालिबान अब पाकिस्तान का वह मोहरा नहीं है, जैसा कई लोगों ने 2021 में मान लिया था. उसने दक्षिण एशिया की एक पुरानी धारणा को बदल दिया है. तालिबान पाकिस्तान के प्रभाव में पैदा हुआ संगठन जरूर रहा हो, लेकिन तालिबान की सत्ता में आने के बाद उसकी अपनी राष्ट्रीय और रणनीतिक प्राथमिकताएं भी हैं. यही कारण है कि आज अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंध दक्षिण एशिया की सबसे अस्थिर धुरी में बदल चुके हैं.

भारत दौरे पर विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर से मिलते अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी.

भारत दौरे पर विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर से मिलते अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी.
Photo Credit: AP

भारत ने इस पूरे घटनाक्रम को बहुत सावधानी से देखा है. 2021 में तालिबान के आने के बाद भारत ने तत्काल कोई जल्दबाजी नहीं की. 2022 में सीमित तकनीकी मिशन के माध्यम से काबुल में अपनी उपस्थिति बनाए रखी. फिर जनवरी 2025 में विदेश सचिव विक्रम मिस्री और आमिर खान मुत्तकी की मुलाकात हुई. इसके बाद अक्टूबर 2025 में मुत्तकी भारत आए. दोनों देशों के बीच राजनीतिक, सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और संपर्क के विषयों पर बातचीत हुई. स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग की बात केवल कागजी नहीं रही, थैलेसीमिया केंद्र, काबुल के बगरामी इलाके में नया अस्पताल और हेरात के सलमा बांध से जुड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पर सहयोग जैसी ठोस प्रतिबद्धताएं इसका हिस्सा बनीं. 21 अक्टूबर 2025 को भारत ने काबुल में अपने तकनीकी मिशन को पूर्ण दूतावास में बदल दिया. तालिबान ने पहलगाम आतंकवादी हमले की निंदा की और यह आश्वासन दिया कि अफगानिस्तान की भूमि भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने दी जाएगी. पाकिस्तान की प्रतिक्रिया तीखी और तत्काल थी. उसने अफगान राजदूत को तलब किया और संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के जिक्र पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई. यह इस बात का साफ संकेत था कि पाकिस्तान भारत-अफगानिस्तान की बढ़ती नजदीकी को कितनी गंभीरता से ले रहा है. भारत के लिए तालिबान का यह आश्वासन मामूली बात नहीं है. अफगानिस्तान भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश नहीं है. यह पाकिस्तान, मध्य एशिया, ईरान और चीन के बीच स्थित वह भूभाग है, जहां होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव भारत की सुरक्षा को प्रभावित करता है. भारत की समस्या दोहरी है. एक ओर उसे अफगान जनता के साथ अपने पुराने संबंधों को बचाना है. दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना है कि अफगानिस्तान फिर से भारत विरोधी आतंकवाद का ठिकाना न बने. भारत ने इसलिए तालिबान को औपचारिक मान्यता दिए बिना उससे संवाद का रास्ता चुना है. यही भारत की वर्तमान अफगान नीति की सबसे बड़ी विशेषता है. 

अब सवाल है कि आगे क्या होगा? क्या तालिबान गिरेगा? क्या अफगानिस्तान में फिर कोई नया राजनीतिक प्रयोग होगा? क्या लोकतंत्र लौटेगा? इनमें से किसी भी सवाल का अभी निश्चित उत्तर नहीं है. फिलहाल तालिबान के तत्काल गिरने के कोई ठोस संकेत नहीं हैं. लोकप्रिय विद्रोह इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह सत्ता बदल सके. सशस्त्र प्रतिरोध भी तालिबान को हटाने की स्थिति में नहीं है. इसलिए निकट भविष्य में तालिबान का शासन जारी रहने की संभावना अधिक है. लेकिन तालिबान के भीतर की राजनीति महत्वपूर्ण हो सकती है. कंधार और काबुल के बीच बढ़ती दूरी, तालिबान के विभिन्न गुटों के बीच शक्ति संतुलन और प्रांतों में स्थानीय असंतोष भविष्य में बदलाव का रास्ता खोल सकते हैं. अफगान समाज में प्रतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. महिलाओं की भूमिगत शिक्षा, विदेशों में बसे अफगान समुदायों की सक्रियता और नागरिक समाज के बचे हुए नेटवर्क यह बताते हैं कि अफगान जनता ने अपनी आवाज पूरी तरह खोई नहीं है. लेकिन फिलहाल वह आवाज सत्ता बदलने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं है.

अफगानिस्तान के सामने बड़ी चुनौतियां क्या हैं

अफगानिस्तान के सामने आने वाले वर्षों में कई चुनौतियां हैं. बढ़ती आबादी. बेरोजगारी. जलवायु परिवर्तन. सूखा. ईरान और पाकिस्तान से लौटते लाखों अफगानी. कम होती विदेशी सहायता. आतंकवाद. नशीले पदार्थों की बदलती अर्थव्यवस्था. पाकिस्तान के साथ अनसुलझा संघर्ष. सबसे बढ़कर, ऐसा राजनीतिक ढांचा जिसमें जनता की भागीदारी लगभग समाप्त है. भारत इस पूरे संकट का समाधान नहीं कर सकता. लेकिन भारत की भूमिका महत्वपूर्ण जरूर हो सकती है. भारत मानवीय सहायता दे सकता है. स्वास्थ्य और शिक्षा में सहयोग बढ़ा सकता है. अफगान युवाओं के लिए अवसर बना सकता है. चाबहार और दूसरे संपर्क मार्गों के जरिए अफगानिस्तान को एक से अधिक आर्थिक रास्ते उपलब्ध करा सकता है. आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा संवाद जारी रख सकता है. सबसे महत्वपूर्ण, अफगान जनता के साथ अपने पुराने भरोसे को बनाए रख सकता है. भारत को तालिबान से बात करनी होगी, लेकिन तालिबानी तहज़ीब से परहेज़ रखकर.  यही अंतर भारत की अफगान नीति की असली पहचान होनी चाहिए.

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काबुल पर तालिबान के कब्जे के पांच साल बाद अफगानिस्तान को देखकर एक बात साफ दिखाई देती है. तालिबान ने युद्ध को बहुत हद तक खत्म कर दिया है, लेकिन उसने अफगानिस्तान की समस्याओं को खत्म नहीं किया. उसने राज्य पर कब्जा कर लिया है, लेकिन समाज को अपने साथ नहीं जोड़ पाया. उसने राजस्व बढ़ाया है, लेकिन रोजगार नहीं पैदा कर पाया. उसने अफीम की खेती रोक दी है, लेकिन किसानों के लिए पर्याप्त विकल्प नहीं बनाए. उसने सुरक्षा दी है, लेकिन स्वतंत्रता नहीं दी. उसने दुनिया से संवाद शुरू कर दिया है, लेकिन दुनिया की व्यापक मान्यता अभी भी हासिल नहीं कर पाया. सबसे बड़ा सवाल वही है जो पांच साल पहले काबुल एयरपोर्ट पर भागते हुए अफगानियों की आंखों में था. तालिबान से बचकर अफगानिस्तान से बाहर निकल जाना शायद आसान नहीं था. लेकिन क्या तालिबान के साथ रहकर अफगानिस्तान में एक बेहतर भविष्य बनाना संभव होगा? आज पांच साल बाद भी इस सवाल का जवाब अफगानिस्तान के पास नहीं है. शायद यही तालिबान 2.0 की सबसे बड़ी विडंबना है. राज्य बचा हुआ है. सत्ता चल रही है. युद्ध कम हुआ है लेकिन अफगानी अभी भी अपने भविष्य की तलाश में है.

(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से पीएचडी और एमफिल हैं. इस समय वो एमिटी यूनिवर्सिटी के नोएडा कैंपस के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल) हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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