रवीश रंजन शुक्ला का ब्लॉग : दिल्ली की कचरा-कचरा होती राजनीति

रवीश रंजन शुक्ला का ब्लॉग : दिल्ली की कचरा-कचरा होती राजनीति

नई दिल्ली:

जाने-माने पत्रकार राजेंद्र माथुर ने लिखा कि सभ्यता की एक महान समस्या कचरा है। समस्या तब ज्यादा बड़ी हो जाती है जब आदमी अपने हिसाब से हवा, पानी और जमीन को कचरे में बदलने लगता है। लेकिन दिल्ली के कचरे ने कतई नहीं सोचा होगा कि हमारे नेता कचरा की राजनीति भी कर लेंगे। ये दिल्ली के कचरे को अपने हिसाब से कचरा बनाने की कवायद शुरू हो चुकी है। ये अनोखा प्रयोग दिल्ली में हो रहा है।
 
दिल्ली के अंदर बसी है यमुना पार की एक दिल्ली, जहां आबादी है, शोर-शराबा है, गरीबी है, अपराध है, बजबजाते नाले हैं, गाजीपुर में कचरे का पहाड़ है और अब कचरे की राजनीति, से यहां के लोग रूबरू हो रहे हैं।


पेशे से वकील पचपन साल की एक प्रौढ़ महिला से मिला। वह नाक पर रुमाल रखकर कहती हैं कि अस्थमा की मरीज हूं। आठ दिनों से कचरे को बच्चे से बड़ा होता देख रही हूं। दिल्ली सरकार और नगर निगम की आपसी राजनीति से अगर सड़क पर पड़ा ये कचरा बूढ़ा हो गया तो मेरी जान की खैर नहीं है। इतना बताकर निराश चेहरे लिए वह वहां से चलती बनी।
 
वेस्ट विनोद नगर की उस सड़क पर पड़े कचरे से हर रोज़ मेरी मुलाकात हो रही है। जिसका दायरा फुटपाथ से बढ़कर सड़क तक हुआ आज देखा तो कार पार्किंग तक फैल गई थी। सड़क किसी कचरे के ढलाव में तब्दील हो गई है। यहीं से कुछ दूर पर पूर्वी दिल्ली नगर निगम का मुख्यालय है, जहां गेट के सामने पड़े कचरे के बगल में सफाई कर्मचारियों की जिंदाबाद-मुर्दाबाद चल रही है। सफाई कर्मचारी कहते हैं कि तनख्वाह नहीं मिलेगी तो खाएंगे क्या...

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दरअसल पूर्वी दिल्ली नगर निगम जब कांग्रेस ने बनाया था तभी से कचरा राजनीति की शुरुआत हुई और 2015 आते-आते इस कचरा राजनीति का शिकार आम लोग हो गए। अब इस कचरे के ढेर पर चढ़कर आम आदमी पार्टी और बीजेपी कंधे पर बोरा लेकर राजनीतिक फायदा खोज रहे हैं। इनके हाथ उतने ही काले हैं जितना गाजीपुर कचरे के पहाड़ में काम करने वाले उस शख्स के जो फायदे के लिए कचरे को जितना खोदता-कुरदेता उतना ही बदबू और गंदगी फैलती। लोग मुंह पर रुमाल रखकर मुंह फेरने की कोशिश करते।