"यह बुद्धिजीवियों का नया रिवाज़ है और शायद उसी में ख़्याति भी प्राप्त होती है..."
राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की समस्या पर बोलते हुए यह सोचने-विचारने की मांग कर रहे थे कि किसी को इस तरह के बौद्धिक आतंकवाद पर गंभीरता से सोचना चाहिए. उनका कहना है कि इसका नतीजा, परिणाम, अनेक मॉडल पिछले 20 सालों में दिए जाते रहे हैं, कश्मीर को हल करने के लिए. मंत्री जी का कहना है कि हिन्दुस्तान के ऊपर प्रश्नचिह्न लगाकर कुछ लोग अपनी किताबें हिट करवा रहे हैं.
शायद उन्हें ध्यान नहीं रहा होगा कि उनकी विचारधारा और दल के लोगों ने भी कश्मीर पर ख़ूब किताबें लिखी हैं, लेख लिखे हैं, सभाएं और सेमिनार किए हैं. अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग भी उसी बौद्धिक प्रक्रिया की देन है, जिसके तहत कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए अनेक मॉडल दिए गए, जिनके बारे में अब सरकार चर्चा तक नहीं करती. बताती भी नहीं कि क्यों चर्चा नहीं करती है...? क्यों प्रधानमंत्री दो झंडों के पीछे बैठ गए...? उम्मीद है, मंत्री जी ने बौद्धिक आतंकवाद के मॉडल से अपने साथियों और अग्रजों को बाहर रखा होगा.
उनके कहे अनुसार मैं बौद्धिक आतंकवाद पर गंभीरता से विचार करना चाहता हूं. आतंकवाद को लेकर चुनावी राजनीति करने वाले नेता अक्सर भ्रमित रहते हैं. उनकी मनोवृत्ति भ्रमर की होती है. जब कोई बड़ी घटना हो जाती है, तो तुरंत आतंकवाद के मज़हब पर आ जाते हैं, कुछ महीने बाद फिर आतंकवाद के मज़हबी पक्ष को भूल जाते हैं. विपक्ष में रहते हैं तो इस्लामी आतंकवाद हो जाता है, सरकार में आते ही आतंकवाद से इस्लाम ग़ायब हो जाता है. जब तक इस्लामी आतंकवाद होता है, वह किसी धर्म विशेष के ख़िलाफ़ होता है, जैसे ही वह मानवता के ख़िलाफ़ होता है, वह इस्लाम के भी ख़िलाफ़ हो जाता है. इस्लामी आतंकवाद बोलते समय नेता लोग आक्रामक और ओजस्वी लगते हैं, इस्लामरहित आतंकवाद बोलते हुए वे संवेदनशील और तपस्वी लगते हैं.
अब जब हमारे नेता सत्ता में आतंकवाद का धर्म नहीं खोज पाए तो आतंकवाद का बौद्धिक पक्ष खोजना चाहते हैं. आजकल 'इंटेलेक्चुअल टेररिज़्म' यानी बौद्धिक आतंकवाद का जुमला काफी सुनाई देता है. आतंकवाद से इस्लाम का लाइसेंस रद्द करने के बाद फिलहाल सरकारी तौर पर 'बौद्धिक आतंकवाद' ही मान्यताप्राप्त लगता है. अगर आतंकवाद मानवता के ख़िलाफ़ है तो बौद्धिक आतंकवाद किसके ख़िलाफ़ है...? सरकार या मानवता के...?
हमारे नेता भाषा को सबसे हल्का मैदान समझते हैं. उन्हें लगता है कि भाषा किसी ग़रीब या दलित की भूमि है, जब चाहो कपड़े उतारकर मारो, मर्ज़ी आए तो नल से पानी पीने पर मार दो, मन करे तो गांव से ही निकाल दो. समस्या यह है कि आज के परिदृश्य में एक भी नेता ऐसा नहीं है, जो भाषा को लेकर सजग और ग़ज़ब हो. उनकी भाषा में शब्दों की विविधता समाप्त होती चली जा रही है. कोई बौद्धिकता का विरोध कैसे कर सकता है...?
बौद्धिक आतंकवाद क्या होता है...? राज्यसभा के कुछ सदस्यों ने भी कश्मीर की पृष्ठभूमि में भारत से विलय के समय की बातें कहीं. क्या ऐसा कहना बौद्धिक आतंकवाद है...? बुद्धि के ख़िलाफ़ इतनी घृणा क्यों है...? क्या भारत की जनता पढ़ना-लिखना, विचारना-बहस करना छोड़ दे, क्योंकि बुद्धि से सरकार आतंकित हो जाती है...? फिर क्यों सरकार आतंकित होकर पैलेट गन के विकल्प के लिए कमेटी बना रही है...? क्या ऐसा करने का ख़्याल उसे खुद आया या उसी आलोचना या बौद्धिकता से आया, जिसे लिखने-बोलने वालों को जितेंद्र सिंह जी कथित तौर पर बौद्धिक आतंकवाद के दायरे में रखना चाहते हैं. क्या अनुच्छेद 370 हटाने की बात करना एक किस्म की उग्रता नहीं थी, जिसे अब भुलाया जा चुका है.
राष्ट्रवाद की आड़ लेकर पहले सांप्रदायिकता को शह दी गई, अब इसकी आड़ में बौद्धिकता को आतंकवाद बताने का प्रयास किया जा रहा है. कोई सरकार बुद्धि विश्लेषण से कैसे चिढ़ सकती है...? राज्यसभा में वही तो हो रहा था. क्या वहां बौद्धिकता के अलावा कुछ हो रहा था...? बग़ैर बौद्धिकता संवेदनशीलता नहीं आती है. इसी तरह सहिष्णुता-असहिष्णुता का खेल खेला गया. सहिष्णुता का मज़ाक़ उड़ाया गया, उसकी बात करने वालों के ख़िलाफ़ रैली निकाली गई. उस बहस की बुनियाद में गोरक्षकों जैसी आक्रामकता ही तो थी, जिसका फ़िल्मों से आए लोग समर्थन करने के लिए दिल्ली की सड़कों पर उतारे गए थे.
अब गोरक्षकों से छवि बिगड़ने लगी और लोग ख़िलाफ़ होने लगे तो 70-80 फीसदी गोरक्षकों को असामाजिक तत्व बता दिया गया. क्या यह सहिष्णुता की बात करने वालों की जीत नहीं है...? ठीक है, उन्होंने इस जीत पर जश्न नहीं मनाया या खुलकर स्वागत नहीं किया, लेकिन मेरे हिसाब से यह बड़ी जीत है. यह सरकार की भी जीत है और समाज की भी. प्रधानमंत्री की तरफ से सिर्फ बयान नहीं आया है, बल्कि गृह मंत्रालय से राज्यों को बाकायदा निर्देश भेजा गया है कि गोरक्षा के नाम पर किसी भी भीड़ या व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने की इजाज़त नहीं है.
कल तक जो बातें असहिष्णुता और बौद्धिक आतंकवाद के दायरे में फिट बैठ रही थीं, आज वही सरकार के अच्छे विवेक का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं. क्या यह परिवर्तन सहिष्णुता का विरोध करने वाले महान बुद्धिजीवियों के कारण आया...? सरकार जब सुनती है, समझती है, तो अच्छा लगता है, इसलिए बौद्धिक आतंकवाद को परिभाषित करने में वक्त ज़ाया न करें, वर्ना एक दिन कहना पड़ सकता है कि आतंकवाद का बुद्धि से क्या लेना-देना. आतंक की कोई मति नहीं होती है.
राष्ट्रवाद किसी विषय पर सोचने की अंतिम सीमा नहीं है. खुद राष्ट्रवाद का अपना कोई ठिकाना नहीं. इसका न एक भूगोल है, न एक परिभाषा, इसलिए ठीक से तय कर लीजिए, आतंकवादी कौन है...? अगर सही से जानना है तो पता कीजिए, आईएसआईएस आतंकवादी गुट को किसने खड़ा किया...? किसने हथियार दिए...? विकीलीक्स ने दावा किया है कि हिलेरी क्लिंटन ने आईएसआईएस को हथियार बेचे हैं. हिलेरी इंकार कर रही हैं. विकीलीक्स कह रहा है उसके पास प्रमाण हैं. ब्रिटेन में चिल्कॉट कमेटी की रिपोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के खिलाफ प्रमाण दिए हैं कि उन्होंने झूठ बोलकर इराक पर हमला किया. इराक युद्ध में मारे गए ब्रिटिश सैनिकों के परिजनों ने ब्लेयर को आतंकवादी कहा है.
इसलिए हम बौद्धिकता को किसी सीमा में नहीं बांध सकते. हम या आप या कोई भी अंतिम रूप से कुछ नहीं जानता है. फिर भी इतने प्रमाण तो आने लगे हैं कि दुनियाभर में आतंकवाद को कौन प्रायोजित कर रहा है. अगर आपने वाक़ई आतंकवाद के पीछे धर्म के होने की अवधारणा से मुक्ति पा ली है तो आइए, उसी बौद्धिकता के साथ हो लीजिए, जो दुनिया में आतंकवाद को पालने-पोसने में शामिल राष्ट्र प्रमुखों, संभ्रांत नेताओं और कॉरपोरेट के मिले होने के विश्लेषणों में शामिल हैं. जिस बौद्धिकता को आप आतंकवाद बताना चाहते हैं, दरअसल वह कुछ और नहीं, मानवतावाद है.
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This Article is From Aug 11, 2016
मंत्री जी, यह बौद्धिक आतंकवाद नहीं, मानवतावाद है...
Ravish Kumar
- ब्लॉग,
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Updated:अगस्त 11, 2016 10:17 am IST
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Published On अगस्त 11, 2016 10:17 am IST
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Last Updated On अगस्त 11, 2016 10:17 am IST
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