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This Article is From Dec 25, 2019

क्या जनसंख्या रजिस्टर NPR से ही NRC नागरिकता रजिस्टर की शुरुआत होती है?

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    दिसंबर 25, 2019 22:45 pm IST
    • Published On दिसंबर 25, 2019 22:45 pm IST
    • Last Updated On दिसंबर 25, 2019 22:45 pm IST

क्या राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर NPR का वाकई NRC नागरिकता रजिस्टर से कोई संबंध नहीं है? मंगलवार को गृहमंत्री अमित शाह ने एक लंबे से इंटरव्यू में बार बार कहा कि NPR सिर्फ जनसंख्या का रजिस्टर है. उसके आधार पर जनगणना की जाती है. उसका नागरिकता रजिस्टर से कोई लेना देना नहीं है. जनसंख्या रजिस्टर तैयार किया जाता है ताकि पता चले कि देश के भीतर कौन कौन रह रहा है और उसके लिए सरकार योजनाएं बना सके. जनसंख्या रजिस्टर का नागरिकता रजिस्टर से कोई संबंध नहीं है.

आपने सुना कि गृहमंत्री अमित शाह ने साफ-साफ कहा कि NPR के तहत जो प्रक्रिया चलेगी उसका कभी भी NRC में इस्तेमाल नहीं होगा. अमित शाह बार बार समझाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि इसे एनआरसी से न जोड़ा जाए. लेकिन जैसे ही आप गृहमंत्री के बयान के बाद गृह मंत्रालय के दस्तावेज़ देखते हैं तो आपके मन में सवाल उठना चाहिए कि किस पर भरोसा करें. गृहमंत्री के ज़ुबानी बयान पर या फिर उनके मंत्रालय के लिखित जवाबों पर. हर जगह लिखा है कि NPR नागरिकता रजिस्टर का पहला चरण है. तो क्या सरकार एनपीआर के नाम पर नागरिकता रजिस्टर का काम शुरू करने जा रही है? क्या जो लोग कह रहे हैं कि एनपीआर शुरू होने का मतलब है कि एनआरसी शुरू होने जा रही है? गृह मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट को आप गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर देख सकते हैं. 2018-19 की सालाना रिपोर्ट के 262 नंबर के पेज पर 15 वां चैप्टर मिलेगा. इसकी शुरूआत में कहा गया है कि एनपीआर एनआरसी की दिशा में पहला कदम है. इसी रिपोर्ट के 273 वें नंबर के पेज पर लिखा है कि बनाने के लिए NPR पहला स्टेज है.

मंत्री जी कहते हैं दोनों में संबंध नहीं हैं. मंत्री जी के मंत्रालय के दस्तावेज़ कहते हैं कि दोनों में संबंध है बल्कि NRC तभी शुरू होगी जब NPR तैयार हो जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने करीब नौ बार कहा है कि NPR के आधार पर ही NRC बनेगी. 9 बार जवाब दिया है तो गलती होने की संभावना न के बराबर होनी चाहिए. 21 अप्रैल 2015 को लोकसभा में गृह राज्यमंत्री हरी भाई परथीभाई चौधरी ने जवाब दिया था कि सरकार ने तय किया है कि एनपीआर पूरा होना चाहिए और उसे अंजाम पर ले जाना होगा यानी जिससे एनआरसी बनेगी.

26 नवंबर 2014 को राज्यसभा में गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू जवाब देते हैं कि एनपीआर एनआरसी की दिशा में पहला कदम है. भारत में रहने वाले सभी लोगों की नागरिकता की पुष्टि करेगा. 2014 से 2016 के बीच तत्कालीन गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने तो संसद में 7 बार जवाब दिया है कि नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के बाद एनआरसी आएगी. फिर भी आप इससे संतुष्ट नहीं हैं तो आप जनगणना की वेबसाइट पर जाइए. censusindia.gov.in पर जाइए, अगर एनपीआर का एनआरसी से कोई संबंध नहीं है तो एनआरसी क्लिक करने पर जो पॉपुलेशन रजिस्टर खुलता है उसके भीतर परिचय में ही एनपीआर क्यों है. जिसमें लिखा है कि भारत में रहने वाले सभी रहवासियों को एनपीआर में पंजीकरण कराना होगा. अनिवार्य है. इस डेटा बेस में डेमोग्रेफिक और बायोमेट्रिक जानकारी होगी. तो इससे आप समझ सकते हैं कि एनपीआर और एनआरसी के बीच संबंध होगा तभी उसे एनआरसी के भीतर रखा गया है.

तो आपने देखा और समझा भी कि एनपीआर और एनआरसी का संबंध है. जबकि अमित शाह दावा करते हैं कि संबंध नहीं है. यही नहीं जनगणना की वेबसाइट पर एनपीआर को लेकर सवाल जवाब का एक सेक्शन है. आप गूगल करें एफएक्यू फॉर एनपीआर सेंसस.

इसी के अंदर सवाल नंबर तीन में बताया गया है कि नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर सरकार के किन कानूनों के तहत होता है. इसमें कहीं भी इसका संबंध जनगणना के लिए बने कानूनों से नहीं है. इसके प्वाइंट नंबर 5 का सवाल है कि क्या एनपीआर के लिए रजिस्टर करना ज़रूरी है? जवाब में कहा गया है कि 1955 के नागरिकता कानून के सेक्शन 14 ए के हिसाब से हर नागरिक के लिए नागरिकता रजिस्टर में दर्ज होना अनिवार्य है. एनपीआर एनआरसी की तरफ पहला कदम है. इसी जनसंख्या रजिस्टर में जो लोग निवासी दर्ज हैं उन्हीं में से नागरिकों का एक हिस्सा अलग किया जाएगा जिनकी नागरिकता की जांच की जाएगी. इसलिए भारत में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य है कि आप अपना नाम राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में दर्ज कराएं.

जैसे नान रेजिडेंट इंडियन भारत में नहीं रहते हैं तो उन्हें एनपीआर में नाम या कोई भी जानकारी देने की ज़रूरत नहीं है. आप बार-बार यही देख रहे हैं कि एनपीआर का संबंध एनआरसी से ही है. जनगणना से नहीं है. तब फिर अमित शाह क्यों कहते हैं कि एनपीआर जनगणना के लिए किया जा रहा है.

अगर आप कानूनी प्रावधानों को देखें तो पता चलता है कि एनपीआर का जनगणना से कोई संबंध ही नहीं है. आप जानते हैं कि जनगणना कानून 1948 का है. एनपीआर इसके तहत नहीं आता है. एनपीआर आता है 1955 के नागिरकता कानून के भीतर. 2003 में वाजपेयी सरकार ने नागरिकता कानून में जोड़ा था कि देश के नागरिकों को पहचानने और रजिस्टर करने के लिए एक एनआरसी बनाई जा सकती है. अगर यह रजिस्टर बनेगा तो उसके नियम क्या होंगे. तो उन नियमों में कहा गया है कि पहले जनसंख्या रजिस्टर बनेगा. घर-घर जाकर जानकारियां हासिल की जाएंगी. इसी रजिस्टर से कन्फर्म किया जाएगा कि कोई नागरिक है या नहीं. अगर आप नागरिक नहीं हैं तो आपको संदिग्ध नागरिकों की सूची में डाल दिया जाएगा और फिर नागरिकता साबित करने का मौका दिया जाएगा.

31 जुलाई 2019 को भारत सरकार एक अधिसूचना जारी करती है जिसमें लिखा है कि 2003 के नियमों के अनुसार केंद्र सरकार ने जनसंख्या रजिस्टर कराने का फैसला लिया है. एनपीआर का काम शुरु होने वाला है. तभी केरल और बंगाल ने एनपीआर करने से मना कर दिया है. रोक लगा दी है. अमित शाह ने कहा कि वे इन राज्यों से अनुरोध करते हैं कि विचार करें. एनआरसी लेकर कई राज्यों ने विरोध किया है जिसमें सिर्फ कांग्रेस की सरकारें नहीं हैं. आंध्र की जगन रेड्डी की सरकार ने मना कर दिया है. उड़ीसा की नवीन पटनायक सरकार ने भी एनआरसी से मना कर दिया है. बिहार में बीजेपी की मदद से चलने वाली नीतीश कुमार की सरकार ने भी एनआरसी से मना किया है.यानी बीजेपी की भी एक सरकार एनआरसी के खिलाफ है.

जनसंख्या रजिस्टर को लेकर गृह मंत्रालय के सारे जवाब और दस्तावेज़ एक ही बात करते हैं सिर्फ अमित शाह ने अलग बात कही है. उन्होंने क्यों कहा है कि दोनों में संबंध नहीं है जबकि प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान में साफ साफ कहा है कि एनआरसी की कोई चर्चा ही नहीं है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि एनआरसी पर कोई चर्चा नहीं हुई है. जबकि गृहमंत्री ने संसद में कह दिया कि एनआरसी लेकर आ रहे हैं. क्यों कहा? क्या उन्हीं के इस बयान से भ्रम नहीं फैला. अब कह रहे हैं कि एनआरसी पर कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं. उन्होंने यह नहीं कहा है कि एनआरसी नहीं होगी. वो यह कह रहे हैं कि जब वक्त आएगा तो किसी से छुपाकर नहीं करेंगे. हमारी पार्टी के घोषणापत्र में ही है. तो क्या अमित शाह को और साफ साफ नहीं कहना चाहिए कि एनआरसी मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में नहीं होगी.

अमित शाह के इंटरव्यू ने एक बार फिर से संसद में दिए गए बयान की तरह उलझा दिया है. एक बात याद रखिए कि कांग्रेस सरकार ने 2010-11 में जनसंख्या रजिस्टर बनाया था तो नागरिकता रजिस्टर नहीं बनाया गया था. इसका मतलब है कि सरकार के विवेक पर है कि वह जनसंख्या रजिस्टर बनाने के बाद नागरिकता रजिस्टर बनाती है या नहीं. इतनी सी बात अगर अमित शाह साफ कर दें कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में एनआरसी नहीं होगी तो शायद स्पष्टता आ सके. लेकिन वो ऐसी बात नहीं करते हैं. सिर्फ इतना कहते हैं कि अभी चर्चा नहीं है. मगर उनकी पार्टी की घोषणापत्र में है. जिसमें नागरिकता कानून का भी वादा था.

प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को आपस में बैठकर एक साथ एक जवाब देना चाहिए. अब देखिए रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री ने कह दिया कि डिटेंशन सेंटर नहीं है. तुरंत उनकी ही सरकार के संसद में दिए गए दो जवाब सामने आ गए कि असम में 6 डिटेंशन सेंटर हैं. उनके बयान के दो दिन बाद अमित शाह कहते हैं कि डिटेंशन सेंटर हैं. इसलिए ज़रूरी है कि दोनों आपस में बात कर एक ठोस जवाब दें.

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