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This Article is From Jun 16, 2015

चढ़ते सूरज को नमस्कार नहीं है सूर्य नमस्कार

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 27, 2016 07:34 am IST
    • Published On जून 16, 2015 10:16 am IST
    • Last Updated On सितंबर 27, 2016 07:34 am IST
सूर्य नमस्कार को हम विवाद के ज़रिये ही जानने लगे हैं। इस विवाद में शामिल होने वाले तथाकथित समर्थकों और विरोधियों से सूर्य नमस्कार के बारे में गहराई से पूछें तो हो सकता है कि कई लोग दांत चियार दें। दांत चियार भोजपुरी का शब्द है, जिसका मतलब है, अवाक हो जाना। लाजवाब हो जाना। सूर्य नमस्कार करना और इसके बारे में जानना दोनों ही आपको दिलचस्प यात्राओं पर ले जाता है। आपका शरीर स्थिर होते हुए भी सक्रिय हो जाता है। सूर्य नमस्कार को किसी योग्य गुरु की संगत में ही सीखा जाना चाहिए। आज कल कई प्रचलित गुरु लोग संस्थान खोलकर हफ्ते दस दिन के कोर्स में योगा टीचर की उपाधि दे देते हैं। ऐसे अज्ञानी गुरुओं से सर्वथा बचिये।

मैं काफी दिनों से प्रयास कर रहा था कि हिन्दी में सूर्य नमस्कार पर अलग से कोई पुस्तक मिले। हज़ारों पन्नों की मूल किताबें पढ़ने के बाद स्वामी सत्यानंद सरस्वती की लिखी पुस्तक मिली है। बिहार के मुंगेर ज़िला स्थित बिहार योग विद्या स्कूल ने इसे प्रकाशित किया है। अत्यंत ही सरल और सुगम हिन्दी में आप स्वामी सत्यानंद सरस्वती की लिखी इस पुस्तक को पढ़ते हुए सूर्य नमस्कार के बारे में अलग से काफी कुछ जान सकते हैं। इस पुस्तक को आप www.biharyoga.net से हासिल कर सकते हैं। सौ पन्नों की इस पुस्तक पर दाम नहीं लिखा है।

सूर्य नमस्कार 12 शारीरिक स्थितियों से बना है। लेकिन इन स्थितियों से गुज़रते हुए आपको अपने शरीर का ध्यान करना चाहिए। स्वामी सत्यानंद सरस्वती लिखते हैं कि अपनी चेतना को सिर से प्रारम्भ करते हुए पैर तक घुमायें। जिस प्रकार एक टॉर्च आप अंधेरे में घुमाते हुए कमरे में पड़ी अलग-अलग चीज़ों को देखते हैं। उसी तरह आप अपनी चेतना को पैर के तलवों पर ले जायें और भूमि और तलवों के सम्पर्क बिन्दुओं का अनुभव करें। बिना इस स्थिति को हासिल किये सूर्य नमस्कार शुरू ही नहीं किया जा सकता है।



मैं इस पुस्तक से कुछ बातों को इसलिए लिख रहा हूं कि ताकि सूर्य नमस्कार को लेकर विवाद ही नहीं विचार भी किया जाए। पुस्तक में साफ-सुथरी तस्वीरों के ज़रिये आसन के बारे में बताया गया है, जिसे देखते और पढ़ते हुए आप सूर्य नमस्कार में दक्षता हासिल कर सकते हैं। बेहतर है कि आप सूर्य नमस्कार सूर्योदय के वक्त करें और खाली पेट करें। दिन में कभी भी कर सकते हैं, लेकिन पेट खाली होना चाहिए। सूर्य नमस्कार के हर आसन के साथ मंत्र भी दिये गए हैं।

प्रणामासन, हस्त उत्तानासन, पादहस्तासन, अश्वसंचालन, पर्वतासन, अष्टांग नमस्कार, भुजंगासन, पर्वतासन, अश्वसंचालन, पादहस्तासन, हस्त उत्तानासन और फिर प्रणामासन। प्रणामासन से आरंभ और उसी पर अंत यानी जहां से चले थे वहीं लौट कर आना है। इसे सूर्य नमस्कार की आधी आवृत्ति कहते हैं। जब आप इसे दो बार करेंगे तो एक गिना जाएगा। एक आवृत्ति के लिए 24 स्थितियां हैं। 12 आसनों का एक समूह होता है, जिसे आपको दो बार करना है। इस तरह से आप 4 या 6 बार करें और फिर धीरे-धीरे आवृत्तियों को बढ़ाते जाएं। स्वामी जी लिखते हैं कि सूर्य नमस्कार के अभ्यास में सभी 24 आसनों को बिना रुके एक ही बार में पूरा करना चाहिए। इस बात का ख़्याल रखिये कि किस आसन के साथ सांस भीतर लेनी है या बाहर छोड़नी है। 6 आसन धीरे-धीरे करें और 6 को कुछ तेज़ गति से। सूर्य नमस्कार के अभ्यास में शरीर पर आवश्यकता से अधिक ज़ोर न डालना एक महत्वपूर्ण बात है।

बेहतर होता कि सूर्य नमस्कार के आसनों का एक बड़ा-सा कैलेंडर होता, जिसे आप कमरे में टांग कर देखते हुए कर सकें। 2011 में निखिल भंडारी ने दिल्ली में टर्मिनल थ्री के नाम से अत्याधुनिक इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सूर्य नमस्कार की शानदार कलाकृति बनाई है। इन मूर्तियों को देखते हुए आप सूर्य नमस्कार के हर आसन को आत्मसात कर सकते हैं। अगर ऐसी मूर्तियां पार्कों में बना दी जाएं तो वहां जमा होने वाले लोग सही तरीके से सूर्य नमस्कार कर सकेंगे।

सूर्य नमस्कार के बाद खड़े-खड़े मूल स्थिति में ही कुछ सेकेंड तक गहराई से सांस लेनी चाहिए फिर शवासन में पीठ के बल लेट जाना चाहिए। इस आसन की भी अपनी एक प्रक्रिया और सावधानियां हैं। सूर्य नमस्कार के हर आसन का शरीर के अलग फायदे हैं। हस्त उत्तानासन से मोटापा कम होता है। पादहस्तासन से लीवर, गुर्दा की मालिश हो ती है। कब्ज़ की बीमारी दूर होती है। मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बढ़ता है। इसके प्रभावों पर अलग से एक चैप्टर है। मैं यहां पूरी किताब नहीं छाप सकता लेकिन इसके कुछ बिन्दुओं के ज़रिये बता रहा हूं कि हर आसन के साथ एक नई किताब खुल जाती है।



शरीर, मन, लय, विचार और जीवन शैली इन सबमें आप सूर्य नमस्कार के ज़रिये संतुलन कायम कर सकते हैं। योग से आपको जगत की दृष्टि ही नहीं मिलती बल्कि शरीर-संसार को भी आप जानने लगते हैं। उसके केंद्रों को साधने लगते हैं। सूर्य नमस्कार कीजिए और सबसे पहले उन्हें ठीक से करने के लिए कहिए जो सूर्य नमस्कार को लेकर अनाप शनाप बयान देते हैं। उनकी ऐसी हरकतों से कोई भी सिद्ध योगी बता सकता है कि बंदा उत्साहित तो है मगर सूर्य नमस्कार का कोई लक्षण नज़र नहीं आता। आप हिंसक बयान तभी देते हैं जब शरीर और मन का संतुलन खो देते हैं। जो अपने आप में प्रमाण है कि ऐसा करने वाला व्यक्ति सूर्य नमस्कार का एक आसन भी ठीक से नहीं जानता होगा। ऐसा करने वाले सभी संप्रदायों और दलों में हैं। सूर्य नमस्कार चढ़ते सूरज को नमस्कार नहीं है, बल्कि सूरज की गति के साथ अपनी शारीरिक और मानसिक दिनचर्या को साधने की कला है। इसे करते हुए ख़ूब आनंद आता है।

योग किसी पर थोपा नहीं जा सकता। उसे अपने भीतर के अनुशासन से साधा जाता है। यह बाहरी प्रचार के लिए नहीं है। आत्मिक संसार में विचरण करने के लिए हैं। इसलिए योग ज़रूर कीजिए। अगर योग करते हुए आपके विचार और जीवन शैली में परिवर्तन नहीं आते हैं तो निश्चित रूप से आपने ग़लत गुरू चुना है या आपने सही तरीके से योग नहीं किया है। कई लोग रोज़ सुबह पांच बजे उठकर पार्क में गलत सलत तरीके से योग करते रहते हैं, उनमें से कइयों की बीमारी बढ़ जाती है और कई बीमार पड़ जाते हैं। इसलिए योग करते समय सावधानी और जानकारी दोनों का ख़्याल रखें।

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