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This Article is From Mar 05, 2015

'आम' से आलाकमान में बदलते केजरीवाल

Rajeev Ranjan
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  • Updated:
    मार्च 05, 2015 17:35 pm IST
    • Published On मार्च 05, 2015 17:27 pm IST
    • Last Updated On मार्च 05, 2015 17:35 pm IST

ये तो होना ही था क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता ये पार्टी वाकई में बीजेपी, कांग्रेस जैसी दूसरी पार्टियों से अलग नहीं हो जाती और जो हुआ उसकी भूमिका पहले ही लिखी जा चुकी थी। बस पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में इसको औपचारिक अमली जामा पहनाना बाकी था। आखिरकार प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव ने ‘आलाकमान’ पर उंगली जो उठा दी थी।

आलाकमान का हाथ था तभी तो कई गुमनाम चेहरों में भी इतनी हिम्मत आ गई कि उन्होंने इन दोनों महारथियों पर तीखे और ताबड़तोड़ हमले कर दिए। वक्त की आहट भांपकर वो भी बिना उफ़ किए भीष्म की तरह आहत होकर सारे हमले झेलते रहे। जाहिर सी बात है अगर ‘आलाकमान’ नहीं चाहते तो फिर किसी की क्या मजाल थी पार्टी के संस्थापकों को लहुलूहान करने की। ‘आलाकमान’ हमेशा ही मंझे हुए राजनीतिक खिलाड़ी की तरह होता है। यहां भी उसने सारी चालें अपने मन-मुताबिक चली और फिर मैदान से हट गया ताकि उसके ऊपर कोई छीटें ना पड़ें।

बहाना दिया गया कि तबीयत खराब है। लेकिन तबीयत जनता दरबार लगाने से नहीं रोक पाई और न ही शाम तक दफ्तर में बैठकर फाइलें निपटाने से, पर अपनी पार्टी की सबसे अहम बैठक में जाने के लिए जरूर ख़राब हो गई। अंततः, पीएसी यानी कि राजनीतिक मामलों की समिति से इन दोनों बागियों को निकाल दिया गया और केजरीवाल का इस्तीफा राष्ट्रीय संयोजक पद से नामंजूर हो गया।

कुल मिलकर ‘आआपा’ (आम आदमी पार्टी) में भी ‘आलाकमान’ की हुकूमत स्थापित हो गई। जो सवाल योगेन्द्र और प्रशांत ने उठाए थे उस पर क्या हुआ किसी को नहीं पता। मसलन चंदे की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए, पार्टी चंदा लेती है उसका तो जिक्र बेवसाइट पर होता है पर खर्च कहां होता है उसका कोई अता पता नहीं?पार्टी के लोकपाल ने जो सवाल उठाए थे कि पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र की कमी है? टॉप लीडर्स के बीच संवाद की कमी है? आपसी विश्वास घटता जा रहा है? संयोजक का पद किसी और को दे देना चाहिए क्योंकि एक आदमी के पास दो पद होना ठीक नहीं है। ये सभी सवाल अनसुलझे रह गए। बस इन दोनों पर आरोप लगे कि ये पार्टी विरोधी गतिविधियों के साथ साथ राष्ट्रीय संयोजक यानी कि अरविंद केजरीवाल के खिलाफ षडयंत्र रच रहे थे।

लेकिन इन सब अहम मुद्दों पर मीटिंग में कोई चर्चा नहीं हुई। या अगर हुई तो उसे मीडिया से बताना जरूरी नहीं समझा गया। इस बार मीटिंग हुई भी तो पहले की तरह पार्टी दफ्तर या फिर कॉन्टिच्‍यूशन क्लब में या फिर नेता के घर पर नहीं। ये मीटिंग हुई कापसहेड़ा के किलेनुमा कलिस्ता रिसॉर्ट में। जहां से केवल वही खबरें बाहर निकलीं जिसकी इबारत पहले से लिखी जा चुकी थी। कार्यकारणी के 21 सदस्यों में से केवल कुमार विश्वास को बोलने की इजाजत दी गई और वो भी एक लाइन में अपनी बात बोलकर चलते बने।

ध्यान रहे, जिन दो लोगों को पार्टी के पीएसी से निकाला गया है वो कोई मामूली आदमी नहीं है। अपनी फील्ड के धुरंधर है। उनकी अपनी पहचान है, अलग साख है और अपनी अलग सोच भी है। वहीं, आरोप लगाने वालों की क्या पहचान है? पार्टी बनी तो पहचान बनी। बगैर अरविंद के इशारे के उनकी ना तो इतनी हिम्मत थी और ना ही इतना साहस कि इस तरह के ओछे आरोप इन दोनों पर लगाएं। दरअसल आम आदमी पार्टी में ज्यादातर तीन तरह के लोग आए। पहले तो आंदोलन के साथ, दूसरे समाजवादी विचारधारा के लोग और तीसरे ऐसे लोग जो पार्टी को फलते फूलते देख साथ आ गए। पार्टी के जन्म से ही दावा किया गया था कि ये दूसरी पार्टियों से अलग वैकल्पिक राजनीति करेगी। पर अब शायद मुश्किल है क्योंकि इस राजनीति के अगुवा कहे जाने वाले इन दोनों को तो बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हद तो तब हुई जब योगेन्द्र को मुख्य पार्टी प्रवक्ता पद से भी हटा दिया गया।

करीब चार पांच-साल पहले जब अन्ना की अगुवाई में सब लोग जंतर मंतर पर धरना दे रहे थे तो अरविंद जैसे लोग ही योगेन्द्र को मंच पर ले गए थे। उस वक्त इनमें से किसी की कोई खास पहचान नहीं थी। ना तो गुरु की और ना ही चेलों की। ठीक है प्रशांत और योगेन्द्र दोनों मास लीडर या भीड़ जुटाने वाले नेता नहीं हैं। पर ये नहीं भूलना चाहिए कि पार्टी की जो छवि बनी है और जो इसने मुकाम तय किया है उसमें इन दोनों की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता।

इससे ये भी साफ हो गया कि पार्टी में अब ऐसे लोगों के लिए शायद ही कोई जगह बची है जिनका अपनी वजूद है, सोच है, नजरिया है। पार्टी का आगे का रोड मैप भी साफ हो गया है कि पार्टी किस रास्ते और कहां तक जाएगी। अगर अरविंद चाहते कि इन दोनों को पीएसी से निकाला ना जाए तो ऐसा कुछ भी होता भी नहीं। याद होगा जब दिल्ली का ताज छोड़ने पर किसी ऑटो वाले ने चांटा जड़ दिया था तो उसे माफ करने अरविंद उसके घर तक पहुंच गए थे। इस बार तो बात उन साथियों की थी जिसके साथ अरविंद ‘बड़े’ बने हैं, आन्दोलनकारी से मुख्यमंत्री में तब्दील हुए हैं और एक एक्टिविस्ट से ‘जननेता’ बने हैं। अगर वो चाहते तो घर जाकर गि‍ले शिकवे दूर कर सकते थे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया। एक जगह उदारता और दूसरी जगह अनुदारता।

खबर ये भी है कि प्रशांत ने पहले तो मीटिंग में आने से मना किया पर बाद में जोर देने पर वो दिल्ली आए। पहले कोशिश की अरविंद से मिलने की पर बात नहीं बनी। मीटिंग में भी बीच का रास्ता निकालने का प्रयास प्रशांत और योगेन्द्र ने किया। पर जब ठान ही लिया गय़ा था कि अपमानित करके इन दोनों को बाहर निकालना ही है तो फिर क्या सुलह और क्या सफाई? फिर भी 19 में से आठ का समर्थन मिलना किसी भी मायने में कम नहीं है। शेष दो लोगों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था।

इतने लोगों का खुलकर समर्थन में आना साफ़ जाहिर करता है कि समस्या का अंत नहीं हुआ है बल्कि नए विरोध का आगाज हुआ है तभी तो मीटिंग खत्म होने पर प्रशांत से मिलने के बाद योगेन्द्र ने कहा ना तोड़ेंगे और ना छोड़ेंगे। इशारा साफ है नई जंग के लिए मैदान सज चुका है। मयंक गांधी ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। वैसे कहा जाता है कि करिश्मा एक वक्त के बाद धुंधला पड़ने लगता है, उसकी चमक फीकी पड़ जाती है औऱ आखिर तक टिकता वही है जिसके पास जमीन या विचार होता है। इसलिए अब देखना यह है कि भविष्य के पन्नों पर क्या कहानी लिखी जाती है और बदलाव की प्रतीक बनी यह पार्टी खुद में कितना बदलाव ला पाती है।

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