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This Article is From Feb 07, 2018

संसद में प्रधानमंत्री की तल्खी, गलती और ताने

प्रियदर्शन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 07, 2018 18:57 pm IST
    • Published On फ़रवरी 07, 2018 18:57 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 07, 2018 18:57 pm IST
प्रधानमंत्री अक्सर जिस संसदीय और संवैधानिक गरिमा की बात करते हैं, क्या वह राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देते हुए उनके वक्तव्य में थी? यह ठीक है कि सांसदों का एक समूह उनके भाषण के बीच भी हंगामा कर रहा था, लेकिन क्या यह उचित था कि इस हंगामे से वे इतने विचलित हो जाएं कि अपने पूरे वक्तव्य को एक तल्ख़ राजनैतिक वक्तव्य में ही नहीं, लगभग एक प्रतिशोधी कार्रवाई में बदल डालें?

ध्यान से देखें तो प्रधानमंत्री ने सदन में एकाधिक ऐसी बातें कहीं जिन्हें कोई दूसरा कहता तो कांग्रेस शायद संसद चलने नहीं देती. इस लिहाज से कांग्रेस ने शालीनता दिखाई. प्रधानमंत्री ने भारत विभाजन के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया. ऐतिहासिक तौर पर उस समय की सबसे बड़ी और देश की प्रतिनिधि पार्टी होने के नाते कांग्रेस विभाजन की ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती- विभाजन के गुनहगारों को लेकर जो किताबें लिखी गई हैं, उनमें कांग्रेसी नेताओं को बख़्शा नहीं गया है. विभाजन और दंगों से गांधी इतने दुखी थे कि आज़ादी के दिन उन्होंने दिल्ली में रहना कबूल नहीं किया था. लेकिन प्रधानमंत्री किस कांग्रेस की बात कर रहे हैं? क्या वे पटेल उस कांग्रेस में शामिल नहीं थे, जिसने विभाजन का प्रस्ताव माना? और उन दिनों श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहां थे?

1951 में जनसंघ की स्थापना से पहले वे कांग्रेस में थे और नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल थे. जाहिर है, विभाजन की गुनहगार जो कांग्रेस थी, उसमें नेहरू भी थे, पटेल भी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी. लेकिन जब आप इतिहास को अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए इस्तेमाल करते हैं तो सुविधापूर्वक कुछ चीज़ों को भूल जाते हैं, कुछ को याद रखते हैं. प्रधानमंत्री पूरे भाषण में लगातार यह काम करते रहे. कश्मीर को लेकर उन्होंने बीजेपी की वह पिटी हुई धारणा ही दुहराई हुई कि सरदार पटेल होते तो पूरा कश्मीर हमारा होता. जबकि इतिहास में यह बात दर्ज है कि सरदार पटेल बिल्कुल शुरुआती दिनों में जिस तरह जूनागढ़ और हैदराबाद को उनके निजामों की चाहत के बावजूद छोड़ने को तैयार नहीं थे. उसी तरह जम्मू-कश्मीर में भारत के विलय के बहुत उत्सुक नहीं थे. यह नेहरू थे जिन्होंने अपनी धरती का हवाला देते हुए माउंट बेटन से गुज़ारिश की कि वे श्रीनगर जाकर महाराज हरि सिंह से मिले. तब यह मुलाकात नहीं हो पाई. बाद में कबायली हमलावरों की आड़ लेकर पाकिस्तान ने जो हमला किया, उससे हालात बदल गए. 

बहरहाल, नेहरू और पटेल को आमने-सामने खड़ा करने वाली बीजेपी और उनके प्रधानमंत्री मोदी शायद यह नहीं जानते कि राज्यों के भाषावार पुनर्गठन के मसले पर नेहरू और पटेल दोनों की दुविधा एक सी थी. जिस आंध्र का वह ज़िक्र कर रहे थे, वहीं तेलुगू के आधार पर अलग राज्य के लिए चले आंदोलन के दोनों ख़िलाफ़ थे. क्योंकि उन्हें डर था कि एक बार धर्म के नाम पर बंटा देश अब भाषाओं के नाम पर न बंटने लगे. लेकिन आंध्र प्रदेश के अलग राज्य बनने के बाद के अनुभव ने दोनों को आश्वस्त किया कि देश भाषाओं के आधार पर बंटेगा नहीं, बल्कि बंधेगा. कश्मीर या आंध्र का ज़िक्र यह समझने में भी सहायक हो सकता है कि आज़ादी और बंटवारे के बाद 600 रियासतों में बंटे देश को जोड़ना और उसका राजनीतिक नक्शा तैयार करना एक साझा उपक्रम था, जिसमें बहुत सारे लोग शामिल थे. इस प्रक्रिया में कई बार नेहरू-पटेल साथ चले होंगे और कई बार असहमत रहे होंगे. दोनों की चिट्ठियां इसकी गवाही देती हैं, लेकिन उन्हें एक-दूसरे के विरोधी के तौर पर पेश करने की जो संकीर्ण भाजपाई दृष्टि रही है. उसे संसद में रखना प्रधानमंत्री की मर्यादा के अनुरूप नहीं था.

बहरहाल, यह सच है कि आज़ादी के बाद सत्ता पर सबसे लंबे समय तक काबिज़ कांग्रेस के गुनाह कम नहीं रहे हैं. भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तमाम तरह की जो रुग्णताएं दिखाई देती हैं, उन सबके बीज कांग्रेस में रहे हैं. लेकिन यह याद रखने की ज़रूरत है कि नेहरू ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया था. वे कांग्रेस के बड़े नेताओं के आपसी झगड़े में गूंगी गुड़िया की तरह आगे बढ़ाई गईं. यह गूंगी गुड़िया जब बोलने लगी तो उन्हीं कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें किनारे करने की कोशिश की. कांग्रेस टूटी और संगठन कांग्रेस दूसरों के पास चली गई. यह वही दौर है जब इंदिरा गांधी प्रिवी पर्स की समाप्ति, बैंकों और कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण करती दिखाई पड़ती हैं और 1971 में गरीबी हटाओ के नारे के साथ जीत कर लौटती हैं.

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी प्रधानमंत्री को याद है जिसे उन्होंने संसद में भी दोहराया. बेशक यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय है, जिसकी सज़ा उन्हें जनता ने दी, लेकिन इसी इंदिरा गांधी को बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद मोदी के प्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने देवी दुर्गा कहा था, यह वे भूल गए. अपनी चुनी हुई सच्चाइयों का बयान नेताओं की ही नहीं, कई बार विचारधारा से बंधे इतिहासकारों की फितरत भी होती है, लेकिन एक प्रधानमंत्री को कम से कम संसद में ऐसी चुनी हुई सच्चाइयां नहीं रखनी चाहिए. प्रधानमंत्री पूरी तल्खी के साथ यह करते रहे और इसमें तथ्य भी भूल गए. 
1972 के शिमला समझौते को उन्होंने इंदिरा गांधी और बेनज़ीर भुट्टो के बीच का समझौता बता डाला, जबकि वह बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फिकार अली भुट्टो का किया हुआ समझौता था. यह अलग बात है कि इस गलती के लिए कोई उन्हें उस तरह ट्रोल न करे जैसे राहुल गांधी को किया जाता. प्रधानमंत्री की इस राजनीतिक तल्खी ने नई और अरुचिकर अति राज्यसभा में की जहां कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी की हंसी पर उन्होंने कटाक्ष किया- कहा कि ऐसी हंसी रामायण सीरियल ख़त्म होने के बाद पहली बार सुनी. देश की एक सांसद के लिए ऐसी राक्षसी हंसी का इशारा क्या प्रधानमंत्री को शोभा देता है? लेकिन हिंदी के एक कवि शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा है- 'जो नहीं है. उसका ग़म क्या. जैसे सुरुचि.'

प्रियदर्शन एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एडिटर हैं

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