विज्ञापन
This Article is From Jun 25, 2015

क्‍या इस्‍तीफा देंगी वसुंधरा राजे?

Ravish Kumar
  • Blogs,
  • Updated:
    जून 25, 2015 21:49 pm IST
    • Published On जून 25, 2015 21:45 pm IST
    • Last Updated On जून 25, 2015 21:49 pm IST
25 जून 1975 को चालीस साल हो गए। इस घटना को याद रखना चाहिए क्योंकि इस तारीख के बाद लोकतंत्र को बचाये और बनाए रखने के लिए एक लंबी लड़ाई शुरू होती है जो आज भी जारी है। उन अर्थों में आपातकाल दोबारा भले न आया हो मगर लोकतंत्र का सारा जश्न मतदान के प्रतिशत और शांतिपूर्ण चुनावों की तैयारियों में ही सिमट कर रह गया है। इसलिए कई बार लगता है कि आपातकाल को याद रखना एक ख़ास किस्म की औपचारिकता में बदल गया है।

प्रधानमंत्री ने 100 शहरों को स्मार्ट बनाने की घोषणा करते हुए आपातकाल की याद तो दिलाई मगर लोकतंत्र का तकाज़ा तो बनता ही है कि 12 दिनों से जो सवाल उठ रहे हैं उस पर वो अपनी बात रखें। लोकतंत्र के आदर का ख़्याल होता तो वसुंधरा राजे भी प्रेस के सामने आकर सवालों के जवाब देतीं। यहां तक कि किसी प्रकार की स्वतंत्र जांच की घोषणा भी नहीं हुई है।

केंद्र सरकार अभी तक नहीं बता पाई है कि उसकी नज़र में ललित मोदी कौन है। बीजेपी और सरकार के हिसाब से ललित मोदी की परिभाषा अलग-अलग हो जाती है। कभी पारिवारिक संबंध का सहारा लिया जाता है तो कभी कमर्शियल संबंधों का। कानूनी जवाबदेही की कोई बात ही नहीं करता है। आरटीआई कानून के तहत सूचना लेना आसान तो है मगर इस कानून को पिछली सरकार के समय से ही सुस्त किये जाने की शुरूआत हो चुकी है। हम पारदर्शिता के भ्रम में जी रहे हैं। मोबाइल ऐप और ई गर्वनेंस पारदर्शिता नहीं हैं।

व्यक्ति ही नहीं संस्थाओं को भी अपने लोकतांत्रिक स्पेस के लिए लड़ना पड़ता है। मानव संसाधन मंत्रालय और आईआईएम के बीच टकराव की स्थिति बन रही है। मामला यह है कि मानव संसाधन मंत्रालय ने एक ड्राफ्ट बिल तैयार किया है जिसकी धारा 35 और 36 के अनुसार इन संस्थानों के बोर्ड ऑफ गर्वनर के फैसले को अब मंत्रालय बदल सकता है। इन्हें अपने फैसले को मंत्रालय से मंज़ूरी लेनी होगी। आईआईएम अहमदाबाद के निदेशक आशीश नंदा ने एनडीटीवी से कहा है कि उनके संस्थान ने मंत्रालय को अपनी आपत्ति बता दी है कि इससे तो बोर्ड ऑफ गर्वनर की स्वायत्ता ही समाप्त हो जाएगी। इस बिल पर जनता भी अपनी राय दे सकती है।

अंग्रेज़ी अख़बार दि इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर का भी ज़िक्र करना चाहूंगा। 2008 के मालेगांव धमाके में विशेष सरकारी वकील रोहिणी सलियन ने आरोप लगाया है कि नेशनल इंवेस्टिगेटिव एजेंसी NIA के एक अधिकारी ने उनसे कहा कि वे मालेगांव के आरोपियों को सज़ा दिलाने की पुरज़ोर कोशिश न करें। यही नहीं उस अधिकारी ने फोन कर कहा कि इस मामले में उनकी जगह कोई और बहस करेगा। तब रोहिणी ने कहा कि इसे नोटिफाई कीजिए कि मैं अब सरकारी वकील नहीं हूं, कोई और है।

रोहिणी सलियन का आरोप है कि अधिकारी ने उनसे कहा कि ऊंचे लोग ऐसा चाहते हैं। उनके अनुसार मालेगांव ब्‍लास्ट मामले में आरोपी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित समेत 12 लोगों को बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है। अजीब बात यह है कि NIA के ख़िलाफ़ मुकदमा लड़ रहे प्रज्ञा ठाकुर के वकील ने कहा है कि सारे आरोप बेबुनियाद हैं। आप दर्शकों को इसमें समझना यह है कि आज भी सिस्टम को अपने फायदे के लिए बदलने का सिलसिला जा रही है। अतीत हो या आज हो, आप किसी भी सरकार या राज्य के हिसाब से देखेंगे तो ऐसे अनेक मामले मिल जायेंगे।

हमारे राजनीतिक दल पहले से और भी कम पारदर्शी हो गए हैं। फिर भी लोकतंत्र ज़िंदा है वर्ना बीजेपी के सांसद कीर्ति आज़ाद अपने वित्त मंत्री जेटली के ख़िलाफ़ एफआईआर के लिए थाने में तहरीर न देते और आपातकाल पर आयोजित बीजेपी अपने कार्यक्रम में आडवाणी और यशवंत सिन्हा को नहीं बुलाती है। गुरुवार को वसुंधरा राजे के मीडिया सलाहकार महेंद्र भारद्वाज ने एक प्रेस रीलीज़ जारी किया है जिसमें कहा गया है कि कुछ इलेक्ट्रॉनिक चैनल लगातार सत्य से परे खबरें चला रहे हैं। कृपया कोई भी खबर चलाने से पूर्व उसकी पुष्टि या जांच अवश्य कर लें। मुख्यमंत्री जी की छवि खराब कर उन्हें राजनैतिक नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से चलाई जा रही असत्य खबरों तथा अफवाहों के आधार पर खबरें नहीं चलाए।

मीडिया सलाहकार जी ने ये नहीं बताया कि कौन सी ख़बर ग़लत है। हलफनामा से इंकार किया तो दस्तख़त वाली कॉपी आ गई। क्या वे उसे ग़लत बता रहे हैं। ललित मोदी ने इसे सही बताया है। वसुंधरा ने खुद ही माना है कि पारिवारिक संबंध हैं तो ग़लत क्या है।

ट्वीटर अकाउंट के दौर में चार पंक्तियों वाली प्रेस रीलीज़ काम आ रही है। सुषमा स्वराज की तरह वसुंधरा राजे भी ट्वीट कर सकती थीं। ट्वीटर के मनोविज्ञान का अध्ययन करने वाले दो बातें बताते हैं। ट्वीट की आदत लग जाए तो न करने पर मन बहुत बेचैन रहता है और मन को बहलाने के लिए ट्वीटर अकाउंट वाला दायें बायें की तस्वीर अपलोड करने लगता है। इधर सूत्रों के हवाले से ख़बर आ रही है कि बीजेपी अब ये लाइन ले सकती है कि वसुंधरा ने यह दस्तखत निजी हैसियत से किये थे न कि राजस्थान में विपक्ष के नेता पद की हैसियत से। लेकिन उस हलफाने की एक एक लाइन पढ़ेंगे तो उसमें वसुंधरा यही बता रही हैं कि वे विपक्ष की नेता हैं, बीजेपी में उनकी क्या हैसियत है, उनकी मां बीजेपी की संस्थापक सदस्य हैं।

एनडीटीवी की बरखा दत्त की रिपोर्ट के अनुसार NDTV ने 2011 के कुछ दस्तावेज़ निकाले हैं जिससे साबित होता है कि 2011 की जुलाई में वसुंधरा राजे लंदन में थीं। उनके साथ बीजेपी के सहयोगी और पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और महिला मोर्चा की अध्यक्ष स्मृति ईरानी भी थी। कार्यक्रम का आयोजन overseas friends of BJP ने किया था। बरखा को सूत्रों ने बताया है कि बाकी लोग तो वापिस आ गए मगर वसुंधरा राजे वहां कुछ हफ्ते रुक गईं। वहां ललित मोदी के वकीलों की मौजूदगी में 18 अगस्त को दस्तावेज़ पर दस्तखत किये इस शर्त पर कि भारत सरकार को नहीं बताया जाएगा।

हमारा मकसद इतना बताना भर है कि आधिकारिक तौर पर वसुंधरा राजे बीजेपी के नेताओं के साथ लंदन में मौजूद थीं। बरखा ने जयपुर के स्थानीय अखबारों में भी छानबीन की तो पता चला कि उस वक्त जयपुर के दैनिक भास्कर में टिप्पणी की जाती है कि वसुंधरा राजे कितने दिनों से जयपुर से ग़ायब हैं। जून 2011 में वसुंधरा ने कहा था कि वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से एक कोर्स करने जा रही हैं। उसके बाद हमें खबर मिली कि बीजेपी के नेताओं के साथ जा रही हैं।

अरुण जेटली का बयान आया है कि कोई डेंटेड नहीं है या कोई दागदार नहीं है। अभी तक वो बयान दे रहे थे कि किसी को क्लीन चिट नहीं दिया। जिन पर आरोप है वो अब अदालत बनकर मैदान में आ रहे हैं। मानवीय आधार से मामले को निकाल कर अब निराधार साबित किया जा रहा है।

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
ललितगेट, वसुंधरा राजे, अरुण जेटली, स्‍मृति ईरानी, रवीश कुमार, प्राइम टाइम इंट्रो, Lalitgate, Lalit Modi, Vasundhara Raje, Smriti Irani, Arun Jailtey, Ravish Kumar, Prime Time Intro