प्रदूषण, हीटवेव, चक्रवात, क्लाइमेट रिफ्यूजी जैसी समस्याएं, भारत में कब बनेंगे चुनावी मुद्दे?

पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीतिक दलों की चुप्पी हैरत करने वाली नहीं मानी जा सकती है. संसदीय राजनीति में कोई भी दल उसी मुद्दे को उठाता है जिसकी मांग जनता की तरफ से होती है.

प्रदूषण, हीटवेव, चक्रवात, क्लाइमेट रिफ्यूजी जैसी समस्याएं, भारत में कब बनेंगे चुनावी मुद्दे?

कोरोना संकट से देश बाहर आ रहा है. मौत के आंकड़ों को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार बीच तकरार जारी है. आंकड़ें जो भी रहे हों लेकिन भारत में शायद ही कोई ऐसा गांव रहा है जिसने कोविड-19 का कहर नहीं झेला. सामाजिक और आर्थिक स्तर पर जो भी असर रहे हों लेकिन राजनीतिक तौर पर कोरोना ने राजनीतिक दलों के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं डाला. भारत में कोरोना का कहर राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाया. हालांकि अगर हम ध्यान दें तो भारत में आम लोगों की होने वाली मौत कभी भी राजनीति के केंद्र में नहीं रहा है.

भारत अपनी भौगोलिक बनावट और पॉजिशन के कारण गंभीर पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को झेल रहा है. खराब पर्यावरण और बदलते जलवायु के कारण हर साल देश में लाखों लोगों की मौत हो रही है. लाखों लोग विस्थापित हो रहे हैं. लेकिन अगर भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों के 2 दशक के चुनावी घोषणापत्र पर ही नजर डाला जाए तो इसमें पर्यावरण और जलवायु जैसे मुद्दे सबसे नीचे ही दिखते हैं.

एनवायर्नमेंटल रिस्क आउटलुक 2021 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी समस्याओं का सामना करने वाले 100 शहरों में से 43 सिर्फ भारत में हैं. रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया में जकार्ता के बाद भारत की राजधानी दिल्ली सबसे अधिक खराब हालत में है.  प्राकृतिक आपदाओं, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जलसंकट, जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं दिल्ली शहर में सबसे अधिक है. सिर्फ दिल्ली ही नहीं चेन्नई,कानपुर, आगरा,लखनऊ, बेंगलुरु जैसे शहर भी दुनिया भर में मानवों के रहने वाले जगहों में सबसे खतरनाक जगहों में से एक बनते जा रहे हैं. लेकिन भारत जैसे राष्ट्र में यह राजनीति की मुख्य धारा के लिए अहम मुद्दा नहीं रहा है.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) की रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 में जलवायु से जुड़ी आपदाओं के कारण भारत को  6.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा था. यह नुकसान हर साल बढ़ते ही रहे हैं.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन WMO द्वारा जारी स्टेट ऑफ क्लाइमेट सर्विसेज़ रिपोर्ट-2021 के अनुसार भारत में 'स्थलीय जल संग्रहण' में हर साल 3 सेमी. की दर से गिरावट दर्ज की जा रही है. कुछ क्षेत्रों में गिरावट की दर प्रतिवर्ष 4 सेमी. से भी अधिक देखी गयी है. औसत वार्षिक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता वर्ष 2011 में घटकर 1,545 क्यूबिक मीटर हो गई थी, जो वर्ष 2001 में 1,816 क्यूबिक मीटर थी. रिपोर्ट में इस बात की आशंका व्यक्त की गयी है कि साल 2031 तक यह घटकर 1,367 क्यूबिक मीटर तक ही रह जाएगी.

आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र (IDMC) का कहना है कि भारत में लगभग 1.4 करोड़ लोग जलवायु और पर्यावरणीय आपदाओं के कारण विस्थापित हुए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु संकट जैसे मुद्दों पर निष्क्रियता के कारण 2050 तक 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को अपने घरों से पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. अर्थात भारत में 2050 तक 4.5 करोड़ से अधिक लोग क्लाइमेट रिफ्यूजी बन जाएंगे. जिस देश में भाषा और सांस्कृतिक विविधता को लेकर आए दिन समस्याएं उत्पन्न होती रहती है ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में बनने वाले क्लाइमेट रिफ्यूजी देश के लिए एक बड़ी समस्या बन कर सामने आएंगे. हालांकि सरकार की तरफ से देश की संसद में हाल ही में दावा किया गया है कि भारत सरकार जलवायु शरणार्थी जैसे मुद्दों को लेकर गंभीर है. हालांकि साल 2020 में बंगाल और ओडिशा के तट पर आए अम्फान तूफान से विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास को लेकर आंकड़ें अब तक बहुत अच्छे नहीं हैं. यही हालात बिहार और असम में बाढ़ से विस्थापित होने वाले लोगों के लिए भी देखने को मिलते हैं.

पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीतिक दलों की चुप्पी हैरत करने वाली नहीं मानी जा सकती है. संसदीय राजनीति में कोई भी दल उसी मुद्दे को उठाता है जिसकी मांग जनता की तरफ से होती है. आम लोग इस समस्या को झेल रहे हैं. लेकिन उनके बीच जागरुकता की बेहद कमी है. आम लोगों को जागरूक करने का काम सिविल सोसायटी और दवाब समूह कर सकते हैं. लेकिन शायद वो अपनी जिम्मेदारी को पूरी नहीं कर रहे हैं.

अगर आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो 100 से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ और अलग-अलग संगठन पर्यावरण के मुद्दे पर भारत में कागज पर काम करते हुए देखे जा सकते हैं. लेकिन जमीनी सच्चाई काफी अलग रही है. पर्यावरण के नाम पर मोटी कमाई करने वाले इन सिविल सोसायटी के द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिए उठाए गए कदम अब तक नाकाफी ही रहे हैं.

आजादी के बाद महानगर केंद्रित विकास और नई आर्थिक नीतियों के बाद देश में आम लोगों के बीच विकास की एक अलग ही अवधारणा विकसित हुई है.  पश्चिमी राष्ट्रों के लिए एक बड़े बाजार के तौर पर चिन्हिंत होने के फलस्वारूप आम भारतीयों में उपभोक्तावाद की एक गजब की ललक देखने को मिलती है. जागरूकता की कमी और रहन सहन की पद्धति में अंतर ने लोगों को आत्मकेंद्रित बना दिया है. आम भारतीय की सोच में पर्यावरण जैसे मुद्दों का समावेशन बहुत कम ही देखने को मिलता है. लोगों के बीच जागरूकता की कमी के लिए मीडिया संस्थानों की बेरुखी को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है. अंग्रेजी से इतर बहुत कम ही भारतीय भाषाओं में काम करने वाले अखबारों और वेबसाइटों में  पर्यावरण संकट जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर खबरें देखने को मिलती है. जनजागरण के अभाव में छोटे-छोटे आंदोलनों के दम तोड़ देने के कारण सूखा, बाढ़, चक्रवात, हीटेवेव जैसी समस्याएं लगातार गंभीर संकट की तरफ बढ़ रही है. लेकिन यह संकट चुनावी राजनीति के लिए मुद्दा नहीं बन रहा है.

सचिन NDTV में सीनियर सब एडिटर हैं...

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.