स्टेडियम के नामकरण को लेकर विपक्ष के मोदी सरकार पर हमले

अहमदाबाद में मोटेरा ग्राउंड क्रिकेट स्टेडियम का विस्तार हुआ है. क्षमता के हिसाब से अब यह दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम हो गया है. इसका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा गया है.

बहस की कमी नहीं पड़नी चाहिए. अगर बेरोज़गारी और पेट्रोल के दाम को लेकर लोग ज़्यादा मीम बनाने लगें तो उन्हें नए मीम बनाने का मौका देना भी एक तरह आपदा में अवसर के समान है. लोग खुद ही इस काम में लगे हुए हैं कि मोटेरा क्रिकेट स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम हो गया है. व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का यह फेवरेट टॉपिक है कि किस नेता के नाम पर स्टेडियम से लेकर क्या क्या है. अब बहस का नया टॉपिक आ गया है. वैसे बहस तो इस पर होना चाहिए कि क्या राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री के नाम से किसी चीज़ का उदघाटन किया जाना चाहिए?

अहमदाबाद में मोटेरा ग्राउंड क्रिकेट स्टेडियम का विस्तार हुआ है. क्षमता के हिसाब से अब यह दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम हो गया है. इसका नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा गया है. यानी बुधवार को भारत और इंग्लैंड के बीच जो मैच शुरू हुआ है वह नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टडियम में शुरू हुआ है. नए स्टेडियम का उदघाटन भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया और नए नाम की शिलापट्टिका का लोकार्पण गृहमंत्री अमित शाह और खेल मंत्री किरण रिजीजू ने. इस मौके पर बीसीसीआई के सचिव जय शाह भी मौजूद थे. राष्ट्रपति कोविंद ने बताया है कि इस स्टेडियम की संकल्पना प्रधानमंत्री मोदी ने की थी जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उस समय वे गुजरात क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हुआ करते थे.

इस बात को लेकर विवाद हुआ कि प्रसार भारती और समाचार एजेंसी पीटीआई ने अपने ट्वीट में सरदार पटेल स्टेडियम के उदघाटन की बात लिखी है. इन सब डिटेल में जाने से क्या लाभ. डिटेल कहीं और आपका इंतज़ार कर रहे हैं.

जो लोग नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम से हैरान हैं उन्हें कम से कम मध्य प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री पारस जैन को याद करना चाहिए जिन्होंने मई 2014 में ही कहा था कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में नरेंद्र मोदी के जीवन के बारे में पढ़ाया जाएगा. तब 31 मई 2014 को प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया था कि 'मैं अखबारों में पढ़ रहा हूं कि कुछ राज्य अपने स्कूलों क पाठ्यक्रम में नरेंद्र मोदी के जीवन संघर्ष को शामिल करना चाहते हैं. मैं मानता हूं कि जीवित व्यक्ति के जीवन संघर्ष को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया जाना चाहिए.' एक अन्य ट्वीट में प्रधानमंत्री ने कहा था कि आज के भारत को बनाने वाले नायकों का समृद्ध इतिहास रहा है. युवा मन को उन महान हस्तियों के बारे में पढ़ना चाहिए और प्रेरणा लेनी चाहिए.

इस बात की बहुत तारीफ हुई थी कि प्रधानमंत्री महिमामंडन की राजनीति से दूर हैं. बढ़ावा नहीं दे रहे हैं. उससे कुछ साल पहले यूपी में मायावती की बहुत आलोचना हुई थी कि जीवित रहते हुए भी अपनी मूर्ति बनवा ली. कई नेताओं के जीवन काल में ऐसा हो चुका है. बहरहाल आज पारस जैन खुद को दूरदर्शी महसूस कर रहे होंगे. उन्हें पाठ्यक्रम में शामिल करने से रोक दिया गया लेकिन गृहमंत्री को कौन रोक सकता है.

गृहमंत्री अमित शाह अपने सहयोगी मंत्री के साथ उस नाम पट्टीका का अनावरण कर रहे हैं जिस पर नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम लिखा है. अब कौन याद दिलाना चाहेगा कि इसके लिए प्रधानमंत्री कैसे तैयार हो गए, वो तो अपने बारे में स्कूलों के पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने का विरोध करते थे, अब उनके नाम से क्रिकेट स्टेडियम? प्रधानमंत्री ने भी नहीं सोचा होगा कि शिवराज सिंह के शिक्षा मंत्री को ऐसा करने से रोक दिया लेकिन उन्हीं की सरकार के दो दो कद्दावर मंत्री उनके नाम से स्टेडियम का उद्घाटन कर रहे हैं. 12 फरवरी 2015 की BBC की रिपोर्ट आप पढ़ सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को अपने नाम पर मंदिर बनाने का विचार पसंद नहीं आया है. उन्होंने ट्वीट किया था कि मैंने खबर पढ़ी है कि मेरे नाम से मंदिर बनाया जा रहा है. मैं हतप्रभ हूं. यह भारत की महान परंपराओं के खिलाफ है. यह मंदिर गुजरात के ही एक गांव में बनने वाला था. तब जयेश पटेल ने कहा था कि अब मंदिर में मोदी की जगह भारत माता की प्रतिमा होगी. प्रियंका गांधी ने सरदार पटेल का कथन ट्वीट किया है कि "इस मिट्टी में कुछ अनूठा है, जो कई बाधाओं के बावजूद हमेशा महान आत्माओं का निवास रहा है."

लेकिन अब नरेंद्र मोदी स्टेडियम है. उसका उद्घाटन हो चुका है. यह बहुत अच्छा टॉपिक भी है. बहकाने का मंत्र है या नहीं कह नहीं सकता लेकिन बहस होगी तो शायद यह जवाब भी मिल जाए जो प्रधानमंत्री खुद को पढ़ाए जाने या खुद के मंदिर बनान जाने का विरोध करते थे उनकी नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम को लेकर क्या प्रतिक्रिया है? हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बात करनी है. क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को किसी भौगोलिक सीमा में बंद किया जा सकता है? भारत के संविधान के आर्टिकल 19 की व्याख्या करते हुए पटियाला हाउस कोर्ट कॉम्प्लेक्स के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को भौगोलिक बंदिशों से आज़ाद कर दिया. भारत के भीतर भारत को लेकर, भारत के बाहर भारत को लेकर सवाल इसलिए न उठाए जाएं कि उससे बाहर क्या छवि बनती है या पाकिस्तान के चैनलों में विपक्ष के नेताओं के बयान को कैसे दिखाया जाता है, इन कुतर्कों को लेकर कई साल से गोदी मीडिया के स्टुडियो में बहस होती रही है. व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ज़रिए लोगों का समूह मानने लगा है कि भारत में होने वाले ट्विटर ट्रेंड की खबरें अगर पाकिस्तान या अमरीका में छपती है तो भारत की बदनामी होती है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा के फैसले की कापी में आर्टिकल 19 की व्याख्या पहले से कहीं अधिक व्यापक की गई है.

यहां तक कि भारतीय गणतंत्र के संस्थापकों ने भी अलग अलग मतों को उचित सम्मान दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना. भारत के संविधान के आर्टिकल-19 असहमति के अधिकार को मज़बूती के साथ जोड़ा गया है. मेरे सुचिंतित विचार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में दुनिया भर के श्रोताओं को आकर्षित करने का अधिकार भी शामिल है. संचार पर कोई भी भौगोलिक बंदिश नहीं है. एक नागरिक का मौलिक अधिकार बनता है कि वह देश के बाहर श्रोताओं तक पहुंचने के लिए संचार को प्रेषित करने और ग्रहण करने के श्रेष्ठ माध्यमों का इस्तमाल करे. बशर्ते वह कानून के दायरे में हो.

हम एक ऐसे दौर में जहां लोकल लेवल पर लिखना ग्लोबल हो जाता है. फेसबुक और इंस्टा पर आपका लिखा कहीं भी पढ़ा जा सकता है और आपको कहीं से भी कोई पढ़ सकता है. चीन के अखबार में आपकी टिप्पणी छप जाए इसका मतलब यह नहीं कि आपने चीन से सांठ गांठ कर ली. इकोनामिक टाइम्स की एक खबर है कि 2020 के साल में चीन भारत का पहले नंबर का व्यापारिक साझीदार बन गया. यह भारत सरकार का डेटा है जिस समय 200 से अधिक मोबाइल एप बंद कर, कुछ ठेकों को रद्द कर या फुलझड़ियों लड़ियों के बहिष्कार से आपको राष्ट्रवाद का मंत्र दिया जा रहा था उसी समय में चीन भारत के साथ अपना कारोबार बढ़ा रहा था. भारत आयात किए जा रहा था. अमरीका पहले नंबर का साझीदार था लेकिन अब चीन हो गया है. व्यापार की मात्रा में कमी आई है. जब किसानों को बहकाने के मंत्र मांगे जा रहे हैं तो चेक करते रहिए कि इस तरह से मंत्रों से कहीं आप तो बहकाए नहीं गए हैं. मने कह रहे हैं.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई भौगोलिक सीमा नहीं है. वक्त के साथ संविधान की धाराएं नदियों की धाराओं की तरह नए नए रास्ते खोजती रहती हैं. बिना सबूतों के दिशा को गिरफ्तार कर दिल्ली पुलिस ने संविधान की पाठशाला में दिशा ए रवि को हमेशा के लिए अनिवार्य चैप्टर बना दिया है. क्या इस जजमेंट को अब शिक्षा मंत्रालय की गाइडलाइन के आलोक में देखा जा सकता है?

हाल की इन खबरों और विश्लेषणों पर आपका ध्यान तो गया ही होगा कि 15 जनवरी को शिक्षा मंत्रालय ने अपनी गाइडलाइन में ऑनलाइन सेमिनारों के लिए नए नियम जोड़े गए. यदि कोई सरकारी संस्थान भारत की सुरक्षा और आंतरिक मामलों- जैसे कश्मीर या पूर्वोत्तर के राज्य - पर कोई ऑनलाइन कार्यक्रम/वर्चूअल कॉन्फ़्रेन्स/सेमिनार/ट्रेनिंग/आदि करना चाहते हैं तो उन्हें पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी. गाइडलाइन में लिखा है कि ऐसे किसी कार्यक्रम में भारतीय डेलगेशन द्वारा दी जाने वाली जानकारी और प्रेज़ेंटेशन का विश्लेषण किया जाएगा. उसकी स्क्रूटिनी होगी. मतलब आपके शोध पत्र को कोई जांच करेगा, कौन करेगा इसमें नहीं लिखा है. अनुमति मिलने के दौरान कार्यक्रम का लिंक विदेश मंत्रालय के साथ साझा करना होगा. सभी मंत्रालयों, PSUs, केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान और केंद्र, राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों को कार्यक्रम और उसमें शामिल होने वाले प्रतिभागियों के लिए अनुमति लेनी होगी. जिन कार्यक्रमों में विदेश से फ़ंडिंग और स्पान्सर्शिप मिल रही है या जिसमें विदेशी प्रतिभागी शामिल हैं उन कार्यक्रमों के लिए विदेश मंत्रालय से क्लीयरन्स लेना अनिवार्य है. डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और संयुक्त सचिव और उस से ऊपर के सरकारी अफ़सर को भी विदेश मंत्रालय से अनुमति लेनी होगी.

इस तरह तो विदेश मंत्रालय यूनिवर्सिटी का एक और वाइस चांसलर बन जाएगा. पहले भी अनुमति की प्रक्रिया थी लेकिन प्रजेंटेशन की जांच शोध पत्र की जांच क्या ऐसे नियम किसी लोकतांत्रिक देश की गरिमा को बढ़ाते हैं? इस तरह की गाइडलाइन को देखकर दुनिया विश्व गुरु भारत और उसकी खस्ता हाल यूनिवर्सिटी के बारे में क्या सोचेगी? कश्मीर पर शोध पत्र पढ़ना हो तो क्या उसकी जांच मंत्रालय के अधिकारी करेंगे?

अगर उन्होंने रोक दिया या कुछ हिस्सा हटा दिया तो क्या उसे लेकर शोधकर्ता को कोर्ट जाना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हुआ है. 20 फरवरी के इंडि‍यन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक The Indian Academy of Sciences, the Indian National Academy of Sciences और National Academy of Sciences से जुड़े वैज्ञानिकों ने अपने पत्र में लिखा है कि हमारे देश की सुरक्षा की रक्षा अवश्य करनी चाहिए लेकिन भारत के आंतरिक मामलों में ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित करने से पहले अनुमति लेनी होगी. इन वैज्ञानिकों ने पूछा है कि आंतरिक मामले क्या होते हैं? इससे तो भारत में विज्ञान के विकास की प्रक्रिया संकुचित होती चली जाएगी.

आपको लगता है कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, येल यूनिवर्सिटी, कोलंबिया यूनिवर्सिटी अपने देश में ऐसे नियमों को स्वीकार कर लेते या भारत के ऐसे नियमों से वहां जाने वाले भारतीय डाक्टरों, वैज्ञानिकों और प्रोफेसरों की साख अच्छी होगी. जब प्रधानमंत्री जहाज़ चलाने का काम बाबुओं को नहीं देना चाहते तो बाबुओं को शोध प्रत्र पढ़ने जांचने का काम क्यों देना चाहते हैं? क्या यह एक तरह का कंट्रोल नहीं है. 

दिशा ए रवि के मामले में जहां पटियाला हाउस कोर्ट के जज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भोगौलिक सीमाओं से आज़ाद कर रहे हैं वहीं भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय आंतरिक मामलों के नाम पर अभिव्यक्तियों को भौगोलिक सीमाओं में बांध रहा है. 22 फरवरी के इंडियन एक्सप्रेस में भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन ने कहा है कि सरकार इन नियमों में बदलाव करेगी. उम्मीद है इस जजमेंट को भी पढ़ लेगी. जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ग्लोबल हो सकती है तो फिर अकादमिक शोध पत्र आंतरिक मामला कैसे हो सकता है?

22 साल की यह लड़की बिना किसी गुनाह और सबूत के सात दिनों तक जेल में रखी गई. उसने उस राज्य की शक्ति को करीब से देखा होगा जो तरह तरह की बातें बनाकर किसी को आतंकवादी साबित कर देने की क्षमता रखता है. जज ने अपने फैसले में कई बार लिखा है कि हिंसा, साज़िश से जुड़े सवालों को लेकर पुलिस कोई सबूत पेश नहीं कर पाई. इस फैसले में लिखा है कि सरकारी वकील ने मान लिया है कि टूलकिट का गणतंत्र दिवस के दिन हुई हिंसा से कोई संबंध था, इसका कोई सीधा सबूत नहीं है. यह बात दिल्ली पुलिस के लिए कितनी शर्मनाक है. व्यापक साज़िश की दलील भी दलदल में उलझ गई. जज ने बांबे हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया कि इधर उधर की बातों से साजिश साबित नहीं होती, सबूत चाहिए होते हैं. सरकारी वकील के पास कोई सबूत नहीं था. जब पूछा गया कि PJF क्या प्रतिबंधित संगठन है, क्या कोई केस चल रहा है तो उसका जवाब भी ना में था. गणतंत्र दिवस की हिंसा के मामले में गिरफ्तार लोगों से हुई पूछताछ से भी दिशा को लेकर कोई बात सामने नहीं आई है. दिशा के खिलाफ हर वो दलील जो गोदी मीडिया और नेताओं के ज़रिए आप तक पहुंचाई गई पुलिस कोर्ट में साबित नहीं कर सकी. 

सोचिए एक तरफ 22 साल की एक लड़की है और दूसरी तरफ सरकार के कद्दावर मंत्री, बीजेपी के नेता, और मीडिया का बड़ा हिस्सा. यह सब कुछ बिना सबूत के हुआ. 

यह कोई साधारण केस नहीं था. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू पुलिस की तरफ से पैरवी कर रहे थे. उनके सामने थे दिशा के वकील सिद्दार्थ अग्रवाल. सिद्धार्थ अग्रवाल के जिरह की भी तारीफ हो रही है. सिद्धार्थ अग्रवाल ने कोर्ट में अपनी मुवक्किल की तरफ से कहा था, ''अगर अपराध यह है कि मैंने शांतिपूर्वक विरोध किया, तो मैं दोषी हूं! यदि अपराध यह है कि मैंने इस शांतिपूर्ण विरोध के बारे में विज्ञापन दिया है, तो मैं दोषी हूं_ यदि यह पैमाना है, तो मैं निश्चित रूप से दोषी हूं. मसलन, अगर योग है. और मुझे योग की जगह कुंग फू पसंद है. क्या मैं चीनी जासूस बन जाऊंगा? यह मैं नहीं कह रहा हूं. यह उनकी एफआईआर में है. एफआईआर में उनका आरोप है कि मैंने चाय और योग पर हमला किया है. क्या यह देशद्रोह का पैमाना है?"


मगर फैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि बेल के आदेश में बातें ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण हैं लेकिन बेल के आदेश की सीमाएं भी हैं. जैसे एक एक लाख के मुचलके पर छोड़ा जाना. यह राशि कम भी हो सकती थी. ख़ैर. फैज़ान मुस्तफा का कहना है कि बेल के आदेश में इतना कुछ लिखने से बचा जाना चाहिए. उनकी यह दलील अन्य मामलों में भी रही है, खासकर जब कन्हैया को बेल मिलने के आदेश में लिखा गया था कि जो नारे JNU में लगे वो एक संक्रमण की तरह हैं जिसे महामारी बन जाने से पहले ही रोक देना चाहिए. छह महीने की बेल देते हुए कोर्ट ने कहा था कि संक्रमण फैल जाए तो दवाई देनी पड़ती है नहीं तो गैंग्रीन हो जाता है, हाथ-पैर काटना पड़ जाता है. मगर अभी कोर्ट दवाई देने का काम कर रहा है. आदेश में ऐंटी नेशनल शब्द का इस्तेमाल किया था जो भारतीय क़ानून में नहीं है. फैज़ान मुस्तफा अब भी कह रहे हैं कि बेल का ऑर्डर संक्षिप्त होना चाहिए.

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दिशा के मामले में एक अन्य आरोपी शांतनु मुलुक की ज़मानत याचिका पर बुधवार को सुनवाई होनी थी, अब 25 फरवरी को होगी. उधर नौदीप कौर की ज़मानत पर सुनवाई अब 26 को होगी. आज नहीं हो सकी क्योंकि हरियाणा सरकार नौदीप कौर की मेडिकल रिपोर्ट पेश नहीं कर सकी. कुछ चीज़ें बगै़र टिप्पणी के भी समझी जानी चाहिए. यह याद रखते हुए कि भारत में 60 प्रतिशत गिरफ्तारियां ग़ैर ज़रुरी, अनुचित होती हैं. सोचिए राष्ट्रीय पुलिस कमिशन अपनी तीसरी रिपोर्ट में कहती है कि 60 प्रतिशत गिरफ्तारियां ग़ैर ज़रूरी या अनुचित हैं.