भारत मंडपम में चल रहे AI इंपैक्ट समिट के दौरान Galgotias University की प्रस्तुति को लेकर सोशल मीडिया और कुछ टिप्पणीकारों में जिस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली, वह घटना से ज्यादा भारत की सामूहिक मानसिकता पर रोशनी डालती है. सोशल मीडिया में जिस तरह की प्रतिक्रिया आई है उसने एक बार फिर दिखा दिया कि भारत में हम मुद्दे से ज्यादा तमाशे में रुचि रखते हैं.
घटना को तुरंत 'राष्ट्रीय शर्म', 'भारत की AI हैसियत का पर्दाफाश' और 'वैश्विक अपमान' के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया. ऐसे तोहमत भरे शब्द सोशल मीडिया को लुभाते जरूर हैं, लेकिन यह कोई गंभीर विश्लेषण नहीं है.
पहला और सबसे बुनियादी तथ्य यह है कि यह प्रस्तुति भारत की आधिकारिक तकनीकी क्षमता का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी. न यह किसी सरकारी AI मिशन का showcase था, न किसी राष्ट्रीय रणनीति का संकेतक. यह एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी की भागीदारी थी, जिसे पूरे देश की क्षमता का प्रतीक बना देना विश्लेषण नहीं, अतिशयोक्ति है.
दूसरा, ग्लोबल टेक सम्मेलनों की वास्तविकता पर नजर डालना जरूरी है. CES से लेकर Web Summit तक, हर बड़े मंच पर प्रस्तुतियां असमान होती हैं. कुछ अत्याधुनिक, कुछ प्रयोगात्मक और कुछ साधारण. अंतर यह है कि वहां साधारण को सभ्य आलोचना मिलती है; भारत में वही चीज तुरंत राष्ट्रीय हीनता में बदल दी जाती है.
तीसरा, इस प्रतिक्रिया में एक परिचित पैटर्न दिखता है. हम भारत की किसी भी कमी को सिस्टम सुधार की समस्या की तरह नहीं, बल्कि सभ्यतागत विफलता की तरह देखने लग जाते हैं. यह दृष्टि न तो उत्पादक है, न निष्पक्ष. एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी की औसत प्रस्तुति से भारत की ISRO, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर या स्टार्टअप क्षमता जैसी उपलब्धियां खारिज नहीं हो जाती हैं. हम जिस सेक्टर में अव्वल हैं, उसका लोहा दुनिया मानती है और दुनिया को मानना ही होगा.
चौथा, यदि मुद्दा वास्तव में गुणवत्ता का है और होना चाहिए तो इसका समाधान सार्वजनिक अपमान नहीं, बल्कि संस्थागत उत्तरदायित्व है. accreditation के कड़े मानक, funding से जुड़ी performance metrics, और academic transparency. इस तरह सोशल मीडिया पर एक यूनिवर्सिटी का मजाक उड़ाना उसके शिक्षा स्तरों को कमतर आंकने जैसा है. इससे न तो देश की शिक्षा सुधरती है और न तकनीक. इस तरह की ट्रोलिंग का नुकसान यह होगा कि भविष्य में अन्य विश्वविद्यालय ऐसे प्रयोगों को आमतौर पर दुनिया के सामने रखने से डरेंगे और इससे देश को नुकसान होना तय है.
अंततः, यह प्रकरण गलगोटिया से कम और हमसे ज्यादा जुड़ा है. एक आत्मविश्वासी देश अपनी कमजोर कड़ियों को पहचानता है, उन्हें अलग करता है और सुधार की प्रक्रिया में लग जाता है. एक असुरक्षित समाज हर चूक को प्रमाण बना लेता है कि 'हम कुछ भी नहीं कर सकते.' यहां मेरा यह भी मानना है कि हमें गलगोटिया के इस झूठ को क्लीनचिट नहीं देनी चाहिए, उस पर एक्शन तो हो. लेकिन सोशल मीडिया ट्रायल न हो, क्योंकि इस तरह की सोशल मीडिया ट्रोलिंग भारत को काफी पीछे ले जाती है.
आज जिस वैश्विक आलोचना के नाम पर हम डर रहे हैं हमें वास्तविकता में उससे कहीं आगे सोचने की जरूरत है. हर देश अपनी शुरुआत में विफल होता है. लेकिन हार नहीं मानता. लेकिन हम भारतीयों ने गलगोटिया की प्रस्तुति को राष्ट्रीय अस्मिता का विषय बना लिया. यहां गौर करने वाली बात है कि भारत को दुनिया में सम्मान पाने के लिए बेदाग दिखने की नहीं, बल्कि संतुलन, समझ और मजबूत संस्थाओं की जरूरत है. हर साधारण प्रदर्शन को राष्ट्रीय शर्म बताना गंभीरता नहीं, बल्कि हमारी असुरक्षा दिखाता है. और ऐसे ही डरे हुए देश कभी नेतृत्व नहीं कर पाते.
(डिस्क्लेमर: सत्यम बघेल NDTV में चीफ सब एडिटर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.)