मैं 'बिग बॉस' इसलिए देखती हूं...और आप?

मैं 'बिग बॉस' इसलिए देखती हूं...और आप?

1984 - अंग्रेज़ी उपन्यासकार जॉर्ज ओर्वेल का लिखा एक कालजयी उपन्यास है. यह उपन्यास 1949 में पाठकों के बीच आया था जो एक ऐसे काल्पनिक देश की कहानी है जहां 'बिग ब्रदर' की पार्टी का एकछत्र राज है. दिलचस्प बात यह है कि किसी ने 'बिग ब्रदर' को नहीं देखा है, उनके नाम पर सिर्फ एक ‘आंख’ है जो अपनी पार्टी और देश के लोगों पर नज़र रखी हुई है. सिर्फ लोगों के उठने-बैठने-खाने-पीने पर ही नहीं, इस आंख की पहुंच इनके दिल और दिमाग के अंदर तक है, इनके सपनों में भी बिग ब्रदर का दख़ल है. आपका किसके लिए प्यार उमड़ रहा है, किसके खिलाफ आप साज़िश रच रहे हैं, बिग ब्रदर के राज में यह सब सोचने का मतलब है मौत को गले लगाना. आपने पार्टी लाइन से हटकर कुछ भी सोचा तो 'thought police' पहुंच जाएगी आपको गिरफ्तार करने.

यह किताब क्लासिक मानी जाती है और मौजूदा दौर में काफी प्रासंगिक भी लगती है.अचानक बीते दिनों इसकी बिक्री कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है और यह अमेज़न पर नंबर वन बेस्टसेलर किताब बन गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक अधिकारी ने एक चैनल से बातचीत में 'वैकल्पिक तथ्य'  टर्म का इस्तेमाल किया जिस पर पत्रकार ने कहा कि तथ्य तो तथ्य ही होता है, वो वैकल्पिक कैसे हो सकता है. इस इंटरव्यू के बाद लोगों को एक बार फिर इस किताब की याद आ गई जिसमें पार्टी सदस्यों को निर्देश दिए गए थे कि वह अपने दिमाग में 'दो विपरीत विचारों' को एक साथ जगह दे और जरूरत पड़े तो ऐसे किसी भी तरह के 'स्वतंत्र विचार' को तुरंत हटा दे जो पार्टी के सिद्धांत से अलग जाता दिख रहा है.

शायद आप में से कुछ को पता हो कि रिएलटी शो बिग बॉस, दरअसल ओर्वेल के इसी उपन्यास से ही प्रेरित है. पश्चिमी देशों में यह शो 'बिग ब्रदर' के नाम से आता है और भारत में इसे 'बिग बॉस' के नाम से प्रसारित किया जाता है. बताया जाता है कि जब पहली बार 'बिग ब्रदर' का प्रसारण हुआ था तब ओर्वेल एस्टेट ने निर्माताओं पर कॉपीराइट उल्लंघन का मामला दर्ज किया था जिसके बाद आपसी समझौते से मसला रफा दफा हुआ. इसके बाद यह शो अलग अलग देशों में प्रसारित होता रहा और इस बार भी भारत में तमाम विवादों के साथ 'बिग बॉस' अपना 10वां सीज़न पूरा कर रहा है.

हर बार की तरह इस दफे भी मैंने इस पूरे सीज़न को देखा और तीन महीने में कई बार मुझ पर यह सवाल दागा गया कि - क्या???  तुम बिग बॉस देखती हो? दफ्तर, मोहल्ले और फेसबुक – हर जगह कुछ लोग होते हैं जो इस खुलासे के तुरंत बाद ही 'मुझ जैसों' के बारे में राय कायम करना शुरू कर देते हैं. उनकी गलती भी नहीं है, अक्सर लोकप्रिय संस्कृति (पॉप कल्चर) को एलीट वर्ग के बीच अपनी स्वीकृति के लिए इस तरह का संघर्ष करना ही पड़ता है. नेटफ्लिक्स के ज़माने में एक हिंदी एंटरटेनमेंट चैनल देखना और उस पर भी बिग बॉस जिसमें सिवाय लड़ाई झगड़े, गाली गलौज के कुछ नहीं होता, ऐसे शो को देखने वाले व्यक्ति को तो निश्चित ही अपने 'टीवो गोल्स' के बारे में फिर से सोचना चाहिए.

वैसे इस शो को देखने या नहीं देखने की सबकी अपनी अपनी वजहें हो सकती हैं, मेरे पास भी हैं. एक कारण तो मैं शुरूआत में ही बता चुकी हूं. 1984 मेरे पसंदीदा उपन्यास में से एक है. हालांकि यह शो उससे काफी कम 'क्रूर' और 'डार्क' है लेकिन कहीं न कहीं, यह ओर्वेल के उस डर को ही दिखाता है जिसकी कल्पना उन्होंने इस उपन्यास में 60-70 साल पहले ही कर ली थी जो अब सिर्फ रिएलटी शो नहीं, असलियत में भी हम सबके जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है. क्या बिग ब्रदर की वो आंख, अब सीसीटीवी कैमरा बनकर हमारे जीवन का हिस्सा नहीं बन गई है? इस 'निगरानी' को लेकर ही तो स्नोडेन ने अमेरिका की नाक में दम कर रखा है. इसलिए कहीं न कही यह शो अपने आयडिया के लिहाज़ से ही मुझे काफी प्रासंगिक लगता है.

दरअसल इसकी प्रासंगिकता ही है जो मुझे इससे चिपकाए रखती है. इस शो और इसके प्रतिभागियों में अक्सर राजनीतिक और सामाजिक उठापटक का अक्स नज़र आता है. अब चुनाव का दौर चल रहा है, ऐसे में बाबा स्वामी ओम को देख लीजिए,  वो जब तक बिग बॉस के घर पर रहे, उन्हें देखकर मुझे तीसरे मोर्चे के किसी नेता (आप अपनी मर्ज़ी से किसी को भी चुन लीजिए) का ख्याल आता रहा जिसका अपनी कोई सोच नहीं होती, वो बस उस तरफ होता है, जिसका पलड़ा भारी होता है. कई बार उसका समर्थन इतना जरूरी हो जाता है कि सरकार गिरते गिरते बच जाती है, और इसलिए मौका मिलने पर सरकार भी ऐसे नेता को गिरने से बचा लेती है. स्वामी ओम के साथ भी ऐसा ही होता आया, जब तक वो घर में थे, तमाम बदतमीज़ियों के बावजूद उन्हें किसी न किसी का समर्थन हासिल था. वो किसी न किसी के लिए 'काम के आदमी' ही थे. असलियत में भी तो ऐसा ही होता है ना...बात किसी मंत्रीपद की हो, दफ्तर की हो या फिर घर का कप्तान बनने की, गठबंधन कहां मनचाहे लोगों के साथ हो पाता है..?

इसी तरह सोशल मीडिया के युग में किसी भी बात के सारे पहलूओं को जाने बगैर जिस तरह हम किसी को भी सूली पर लटका देते हैं, उसकी बानगी भी इस शो में देखने को मिलती है. उदाहरण के लिए इस बार जब एक प्रतिभागी लोपामुद्रा ने बानी को कहा कि वह अपनी मां के नाम का इस्तेमाल करके घरवालों का साथ बटोरती है, तो पूरे घर ने एकमत होकर कहा कि लोपा को बानी की मां के बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिए था. लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो लोपा ने बानी की मां के लिए कुछ नहीं कहा था, उसने बानी के लिए कहा था. लेकिन जज बनने की जल्दी में हम अक्सर विवेक का इस्तेमाल किये बगैर ही जजमेंट सुना देते हैं. ऐसी कई बातें बार बार साबित करती हैं कि बहुमत का मतलब 'सच' या 'सही' नहीं होता.

हमारे सामाजिक गठन का एक मिनी रूप इस शो में नज़र आता है. जैसे पूरी दुनिया में महिलाओं के अधिकारों और पितृसत्ता के खिलाफ आवाज़ उठ रही है, डोनाल्ड ट्रंप के महिला विरोधी बयानों को लेकर मार्च निकाली जा रही है. वहीं समाज का यह पहलू इस शो में भी अछूता नहीं है. किसी महिला प्रतिभागी के अपनी बात रखने पर अक्सर बड़ी ही आसानी से उसके चरित्र, उसके पहनावे, उसके स्टेटस पर सीधा हमला बोल दिया जाता है जो कि वास्तविकता से बिल्कुल अलग नहीं है. शायद इसलिए इस शो के स्क्रिप्टेड होने की बात जब कही जाती है तो यकीन कम होता है, क्योंकि यह सब बातें तो हमारे समाज के भीतर इस तरह जमी हुई हैं कि इसे किसी को लिखकर देने की जरूरत नहीं है,  ये अपने आप ही मुंह से तड़ातड़ निकलती जाती होगी?

देश में पिछले कुछ सालों में ‘आम आदमी’  टर्म को काफी भुनाया जा रहा है. इस शो में भी इस बार भुनाया गया और सेलिब्रेटी के साथ साथ आम लोगों को भी बुलाया गया. हालांकि शुरूआत के बाद धीरे धीरे ये सेलिब्रेटी और कॉमन मैन की दीवार को हटा दिया गया लेकिन जिस तरह कुछ राजनेता अपने हितों और वोटबैंक दोनों के लिए उस सिद्धांत को नहीं भूलते जिस पर उनकी पार्टी का निर्माण हुआ था, उसी तरह शो में मनवीर और मन्नु जैसे चेहरे भी आखिर तक ‘कॉमन मैन’ के मुद्दे को लेकर चले और काफी हद तक उसमें सफल भी रहे.

वैसे इस 'प्रासंगिकता' फैक्टर के अलावा इस शो को देखने की कुछ मामूली से कारण भी हैं. दिन भर समाचारों के बीच रहने के बाद टीवी पर न्यूज़ चैनल नहीं लगता. इसके अलावा जो एंटरटेनमेंट शो टीवी पर आते हैं, वो अनंतकाल तक चलते हैं लेकिन बिग बॉस के साथ ऐसा नहीं है. आपको पता होता है कि ये सिर्फ तीन महीने ही चलेगा यानि ये अपने तय वक्त पर खत्म हो जाता है. दो साल पहले चैनल ने इस शो को 15 दिन और बढ़ा दिया था, मैंने देखना छोड़ दिया था. शो देखने की एक वजह सलमान खान भी है. यह देखना दिलचस्प होता है कि आमतौर पर अपने बयानों के लिए विवादों में घिरने वाले सलमान किस तरह शो में एक विवेकशील व्यक्ति की तरह नज़र आते हैं. अब ये उनका कमाल है या स्क्रिप्ट का, ये तो वही बता सकते हैं.

ऐसा बिल्कुल हो सकता है कि मेरी बताई इन वजहों से कहीं ज्यादा बेहतर कारण इसे न देखने के हों,  लेकिन इसके विपक्ष में दी जाने वाली कुछ दलीलें ज़रा तर्कसंगत नहीं लगती. जैसे किसी किताब प्रेमी ने एक 'भावुक' पोस्ट शेयर की थी जिसमें लिखा गया था कि 'जब जब आप बिग बॉस देखते हैं, तब तब एक किताब का खून होता है.'  लेकिन फिर ये बात तो उस फेसबुक के लिए भी लागू होती है न जिस पर उन्होंने अपनी यह भावनाएं पोस्ट की थी. मतलब जितना वक्त आपने फेसबुक पर इस पोस्ट को लिखने में बिताया, उतनी देर में भी किसी न किसी बुक ने आत्महत्या कर ली होगी.

तो अगली बार गलती से ही सही अगर आपके टीवी पर बिग बॉस लग जाए तो मेरी बताई वजहों पर गौर कीजिएगा, फिर चाहें तो चैनल बदल दीजिएगा. वादा करती हूं, मैं आपसे नहीं पूछुंगी कि – तुम बिग बॉस क्यों नहीं देखते??

कल्पना एनडीटीवी ख़बर में कार्यरत हैं.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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