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This Article is From Jul 05, 2017

प्राइम टाइम इंट्रो : बंगाल में हिंसा के पीछे साज़िश?

रवीश कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 05, 2017 22:01 pm IST
    • Published On जुलाई 05, 2017 21:56 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 05, 2017 22:01 pm IST
बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बीच बातचीत का मसला इतना हावी हो गया कि जिन सांप्रदायिक घटनाओं को लेकर इसकी नौबत आई उसी का डिटेल सामने नहीं आ रहा है. फेसबुक पोस्ट और व्हाट्स अप की दुनिया में हर दिन सैकड़ों मैसेज किसी न किसी धर्म को आहत करते हुए लिखे जा रहे हैं. जब यह लोगों को पता है तो फिर ये कौन लोग हैं जो भीड़ लेकर सड़कों पर उतर आते हैं. इनके ख़िलाफ़ क्या ठोस कार्रवाई हो रही है.

आप यकीन करेंगे कि कोलकाता से 70 किमी दूर बादुरिया की यह तस्वीर इसलिए है कि किसी ने फेसबुक पर पोस्ट किया है. हम क्या मूर्खता की मिसाल कायम करने के लिए उतावले हो रहे हैं. इन लोगों को किसने सड़क पर उतारा, बजाए इसके कानून का रास्ता क्यों नहीं चुना और इंतज़ार किया. बीजेपी का दावा है कि 2000 मुसलमानों ने हिन्दू परिवारों पर हमला किया है. बताया जा रहा है कि कई दुकानें जला दी गईं हैं और घरों पर पथराव किया गया है. हमारी सहयोगी मोनीदीपा बनर्जी इस इलाके के एक हिस्से में गई थीं जहां के घरों के शीशे टूटे हुए थे, उन पर पथराव किया गया था और पास के एक क्लब के सामानों को नष्ट कर दिया गया था. लोगों ने मोनीदीपा को बताया कि वे काफी डरे हुए हैं. पुलिस थाने पर हमला करने और पुलिस की गाड़ियां जलाने की भी खबरें हैं. सांसद की गाड़ी पर भी हमला हुआ है. समझना मुश्किल है कि कौन किसके साथ क्या कर रहा है लेकिन भीड़ का हौसला समझ आ रहा है. पुलिस इस भीड़ के आगे बेबस नज़र आ रही है. उसकी मौजूदगी में किसी के साथ हाथापाई होती लग रही है. सड़कों पर टायर जलाए गए हैं. मंगलवार को मोनादीपा की रिपोर्ट की तस्वीर बताती है कि हिंसा काफी हुई है. 17 साल के लड़के की पोस्ट के जवाब में जिन लोगों को उतारा गया, इनमें से कई किशोर उम्र के नज़र आ रहे हैं.

यह सवाल तो करना होगा कि 17 साल के एक बच्चे के फेसबुक पोस्ट को लेकर क्या शहर या मोहल्ले में आगजनी की जाएगी, रास्ता जाम किया जाएगा तो फिर समाज का क्या होगा. क्या हमारे संबंध इतने खोखले हो चुके हैं. फेसबुक पोस्ट के कारण धार्मिक भावना आहत हो रही है तो इसका मतलब है भावनाओं को ही बीमारी लग गई है. एक बात सभी को याद रखनी चाहिए. बहुसंख्यक सांप्रदायिकता इसी फिराक में रहती है कि कब अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता हरकत करे या कुछ ऐसा करे जिसे सांप्रदायिक रंग देकर उसके जवाब में बहुसंख्यकों को उकसाया जा सके. भीड़ का जवाब भीड़ से देने वाले दोनों तरफ के लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जवाब नहीं दे रहे हैं बल्कि एक-दूसरे का साथ दे रहे हैं. अगर ममता बनर्जी बीजेपी की सरकारों में सांप्रदायिक हिंसा करने वाले सरकार समर्थक दलों या गुटों को संरक्षण देने का आरोप लगाती हैं तो खुद ममता बनर्जी का अपना बेंचमार्क क्या है. उन्होंने दोनों तत्वों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की है, ये बताना चाहिए न कि राज्यपाल के साथ हुए विवाद को प्रमुखता देनी चाहिए.

बिहार चुनाव से पहले 'इंडियन एक्सप्रेस' के लिए अप्पू एथोस सुरेश ने एक शानदार रिपोर्टिंग की थी. 21 अगस्त 2015 की इस रिपोर्ट में अप्पू ने बताया था कि बीजेपी और जेडीयू के अलग होने के बाद बिहार में सांप्रदायिक हिंसा तीन-चौथाई बढ़ गई. जब दोनों साथ थे तो पूरे बिहार में साढ़े तीन साल के दौरान 226 सांप्रदायिक हिंसा की घटना हुई थी. जून 2013 में दोनों अलग हुए और अलग होने के दो साल के अंदर सांप्रदायिक हिंसा और तनाव की 667 घटनाएं दर्ज की गईं. ज़्यादातर घटनाएं मंदिर मस्जिद में मांस फेंकने को लेकर शुरू हुई थीं. नीतीश कुमार अपने कैंपेन के हर भाषण में कहा था कि मांस फेंकने पर मत भड़कियेगा. ममता को अपने ही सहयोगी से सीख लेना चाहिए. 'इंडियन एक्सप्रेस' की मार्च 2014 की एक रिपोर्ट है जिसमें पुलिस रिकार्ड का हवाला देते हुए बताया गया है कि ग्रामीण बंगाल में सांप्रदायिक झगड़े बढ़ गए हैं. 2008 में सांप्रदायिक हिंसा की 12 घटनाएं दर्ज होती हैं, वहीं 2013 में बढ़कर 106 हो गईं थीं. राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो के आंकड़े के अनुसार 2015 में देश के 53 बड़े शहरों में दंगों के 6,270 केस दर्ज हुए हैं, जिसमें से कोलकाता में 293 केस दर्ज किये गए.

2016 में बंगाल विधानसभा का चुनाव हुआ तब ममता को 211 सीटें आ गई और बीजेपी को 3 सीट मिली, लेकिन हर बार नुकसान नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है. उन्हें अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोपों को भी गंभीरता से लेनी चाहिए और ऐसे आरोपों के बहाने बहुसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति पर भी लगाम लगानी चाहिए. ऐसा लग रहा है जैसे कोई बंगाल को लगातार उबाल पर रखना चाहता है. धार्मिक जुलूसों और यात्राओं का स्केल ज़रूरत से ज़्यादा बड़ा किया जा रहा है. इन जुलूसों के ज़रिये सदियों पुराने वही ढोल बजाए जा रहे हैं कि लाउडस्पीकर की आवाज़ तेज़ थी या किसी ने मांस फेंक दिया. मुस्लिम समाज का एक हिस्सा इस खेल को समझ भी रहा है, तभी कोलकाता के टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम बरकती को इमाम के पद से हटा दिया गया. शाही इमाम बरकती के निजी अल्बम में उन नेताओं की भी तस्वीरें हैं जो उनके बयानों को लेकर राजनीति करते हैं. मगर मई महीने में जब इस शख्स ने बयान दिया कि हम इमाम हैं किसी के गुलाम नहीं. अपनी कार से लाल बत्ती नहीं उतारेंगे तब मीडिया में खूब बयानबाज़ी हुई. स्थानीय मुस्लिम समाज और मस्जिद का बोर्ड सतर्क हो गया कि इसे लेकर बहुसंख्यकों के बीच किस तरह की बातें फैलाई जाएंगी. इमाम को गद्दी से उतार दिया. इमाम साहब कहते रहे कि उन्हें मुख्यमंत्री का समर्थन प्राप्त है, मगर गद्दी नहीं बचा सके. बाद में तृणमूल कांग्रेस के मंत्री ने भी इमाम के खिलाफ मस्जिद के बाहर प्रदर्शन किया. इमाम ने पाकिस्तान समर्थक बयान दे दिया था. इस इमाम का यही काम था कि कुछ बयान दे दो जिससे बहस छिड़े और सांप्रदायिकता का खुराक मिले. बहुत लोगों की दुकान ही इस तरह के बयानों से चलती है.

अगर इस तरह की घटनाओं को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा और समाज के भीतर से समाज के लिए आवाज़ नहीं आई तो लोग एक दूसरे को पहचानने और दुआ सलाम करने लायक नहीं बचेंगे.

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