1980 के दशक की शुरुआत में माओवादी बंगाल में अपने विफल प्रयोग के बाद दंडकारण्य के जंगलों में आए थे, तब भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक अध्ययन करवाया था. वो यह जानना चाहती थीं कि बंगाल में जिस तरह सिद्धार्थ शंकर रॉय के नेतृत्व में पुलिस ने नक्सलियों को पराजित किया, क्या उससे अलग भी कोई रास्ता हो सकता है?
यह अध्ययन दुर्भाग्य से इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरा हुआ. इसे कभी लागू नहीं किया गया. इसमें दो महत्वपूर्ण बातें कही गई थीं. पहली कि आदिवासी किसान अभी केवल एक फसल उगाते हैं और यदि हम चाहते हैं कि वे नक्सलियों से न जुड़ें, तो हमें उन्हें दूसरी फसल के लिए सिंचाई की सुविधा देनी होगी. और दूसरा यह कि हमें उनकी जंगल से होने वाली आय को बढ़ाना होगा. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आदिवासियों की जंगल से आय अधिकतम हो.
बस्तर में कितनी है सिंचाई योग्य जमीन
तत्कालीन मध्य प्रदेश योजना आयोग के उपाध्यक्ष रामचंद्र सिंहदेव के नेतृत्व में तैयार की गई 'बस्तर विकास योजना'में कहा गया था, "अभी बस्तर में केवल एक फीसदी क्षेत्र में सिंचाई है. हमें तालाब और चेक डैम बनाकर इसे काफी बढ़ाना होगा. यदि बस्तर का आदिवासी आठ महीने खेती में व्यस्त रहेगा, तो बाकी समय वह नाच-गान करेगा और उसके पास नक्सलियों से जुड़ने का समय ही नहीं बचेगा."
अब 40 साल बाद हमने बंदूकों से फिर से माओवादियों को पराजित किया. आश्चर्यजनक रूप से बस्तर में सिंचित क्षेत्र आज भी एक-दो फीसदी ही है. उत्तर छत्तीसगढ़ के गैर-माओवाद प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में यह आंकड़ा एक फीसदी से भी कम है. राष्ट्रीय स्तर पर भारत में लगभग 44.4 फीसदी क्षेत्र सिंचित है. छत्तीसगढ़ में यह 23 फीसदी है. हम माओवादियों और पहाड़ी इलाके को दोष दे सकते हैं, लेकिन माओवाद के बाद अब हमें कुछ ठोस करना ही होगा.
तकनीक हमारी मदद के लिए तैयार है. छत्तीसगढ़ सौर जल पंपों में एक सफलता की कहानी है. देश के केवल 2.8 फीसदी भूमि वाले इस राज्य में देश के करीब 30 फीसदी सौर जल पंप लगाए जा चुके हैं. छत्तीसगढ़ में ढेरों सामुदायिक तालाब बने हुए हैं, उन्हें 'जी राम जी' के तहत आगे बढ़ाने की जरूरत है. लेकिन माओवाद के बाद के भविष्य के लिए छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों के हर किसान के लिए एक सौर जल पंप की जरूरत है.
क्या सौर पंपों की घटती कीमत से होगा फायदा
मोबाइल फोन की तरह सौर पंपों की कीमत भी पिछले कुछ सालों में काफी घट गई है. केंद्र सरकार PM-KUSUM योजना के तहत सौर पंपों में 30 फीसदी सब्सिडी देती है. छत्तीसगढ़ की 'सौर सुजला योजना' 30 फीसदी की अतिरिक्त छूट देती है. जरूरत है इसे मिशन मोड में करने की. इसके लिए इससे बेहतर समय क्या हो सकता है जब हम माओवाद के बाद के भविष्य पर विचार कर रहे हों. एक सौर पंप यहां हर आदिवासी किसान की आय दो से तीन गुना तक बढ़ा सकता है.
वन अधिकार अधिनियम के बाद छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में औसतन हर किसान के पास दो से चार एकड़ खेत का मालिकाना है. एक मानसून फसल से यह किसान सालाना 30-40 हजार रुपये प्रति एकड़ कमाता है. इसकी तुलना में, एक औसत आदिवासी परिवार लघु वनोपज बेचकर करीब डेढ़ लाख रुपये सालाना कमाता है. एक सौर पंप की कीमत, बोरवेल और फेंसिंग सहित दो से पांच लाख रुपए होती है.
बस्तर में छह-सात लाख किसान परिवार हैं. यदि राज्य प्रति परिवार पांच लाख रुपये भी खर्च करे तो 35 सौ करोड़ रुपये चाहिए. राज्य कई दशकों से माओवादियों से लड़ने पर हर साल कम से कम तीन-चार हजार करोड़ रुपये खर्च करता रहा है. कुछ लोग इस आंकड़े को दोगुना बताते हैं. छत्तीसगढ़ खनन से सालाना करीब 15 हजार करोड़ रुपये कमाता है (यदि केंद्र की आय भी जोड़ें तो यह आय 35-40 हजार करोड़ रुपये हो जाती है). इस आय में से आधे से अधिक अकेले बस्तर से आता है.
कितना हो सकता है आदिवासी किसानों का फायदा
ऐसे में इन आंकड़ों को देखते हुए क्या यह कहना तार्किक है कि राज्य (और केंद्र) के पास बस्तर के प्रत्येक परिवार को सौर पंप, बोरवेल और बाड़बंदी देने के लिए पैसे नहीं हैं, जो उनकी खेती से आय को दोगुना-तिगुना कर सके? बेशक यह एक जटिल मुद्दा है. केवल सौर पंप देने से बहुत कुछ नहीं बदलेगा. आदिवासी किसान को यह विश्वास दिलाना होगा कि दूसरी और तीसरी फसल में निवेश उसकी आय बढ़ाएगा.ऐसी कई कहानियां हैं कि किसी किसान ने पंप की मदद से ढेर सारे टमाटर उगाए (अक्सर बिजली या डीजल पंप से, जिसमें नियमित खर्च होता है), लेकिन बाजार न मिलने से उसे अच्छा दाम नहीं मिला और नुकसान हुआ. इसलिए जैसे सौर पंप के साथ बोरवेल और फेंसिंग जरूरी है, उसी तरह इसे सप्लाई चेन और कोल्ड स्टोरेज से भी जोड़ना होगा. किसानों को किसान उत्पादक कंपनियों (FPO) के तहत संगठित करना भी जरूरी है. इसके साथ में कंपनी के साथ रिपेयर के लिए लंबे समय का करार और स्थानीय युवाओं को मैकेनिक की तरह प्रशिक्षण महत्वपूर्ण होगा.
जब 45 साल पहले जब माओवादी आए,तब बस्तर में सिंचाई एक फीसदी थी. अब जब 45 साल बाद जब माओवादी गए, हम अभी भी 1.6 फीसदी पर हैं. एक मिशन मोड परियोजना से हम इसे एक साल में 100 फीसदी तक ले जा सकते हैं, वह भी बिना किसी अतिरिक्त खर्च के. यदि हम माओवादियों से लड़ने में हर साल जो खर्च करते थे या बस्तर से एक साल के खनन राजस्व का 10 फीसदी लगाएं, तो यह चमत्कार संभव है. वन और खनन आय से मिलने वाले लाभ दो और विषय हैं, जिन पर भी हमें एक साथ सोचना होगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)