कोविड महामारी के बाद दुनिया भर में विकास को देखने और परखने का नज़रिया मूल रूप से बदला है. अब यह स्पष्ट हो चुका है कि विकास केवल आर्थिक वृद्धि या आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि यह मानवीय सुरक्षा, स्वास्थ्य, गरिमा और अवसरों से गहराई से जुड़ा हुआ प्रश्न है. महामारी ने यह भी दिखाया कि आपस में जुड़ी हुई दुनिया में साझा चुनौतियों के समाधान भी साझा प्रयासों से ही संभव हैं. ऐसे समय में सहयोग और साझेदारी विकास को नई दिशा देने वाले सबसे प्रभावी माध्यम बनकर उभरे हैं.
भारत की योजनाओं की सफलता
स्वास्थ्य का क्षेत्र इस सहयोग की ताकत का सबसे ठोस उदाहरण पेश करता है. बीते दो दशकों में शिशु मृत्यु दर में आई उल्लेखनीय गिरावट, एचआईवी, टीबी और मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाव और मातृ स्वास्थ्य में सुधार जैसी उपलब्धियां सामूहिक प्रयासों का परिणाम हैं. भारत में राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम, मातृ और शिशु स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और पोषण अभियानों की सफलता के पीछे सरकार, गैर सरकारी संगठनों, चिकित्सा समुदाय और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों की साझा भूमिका रही है. कोविड संकट के दौरान यही साझेदारी देश की सबसे मजबूत ढाल बनी जब टीकों का तेजी से विकास हुआ, डिजिटल मंचों के माध्यम से उनका व्यापक वितरण संभव हुआ और समुदाय स्तर पर भरोसे का निर्माण किया गया.
आज विकास की राजनीति का केंद्रीय विचार 'लीव नो वन बिहाइंड' है. यही संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडे की आत्मा भी है. विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उसका लाभ सबसे पहले उन लोगों तक पहुंचे जो लंबे समय से हाशिये पर रहे हैं. इसमें गरीब परिवार, महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और दिव्यांग शामिल हैं. भारत में 'स्वच्छ भारत मिशन', 'जल जीवन मिशन','आयुष्मान भारत' और 'डिजिटल इंडिया' जैसी पहल इसी सोच को प्रतिबिंबित करती हैं. इन कार्यक्रमों ने न केवल करोड़ों लोगों के जीवन स्तर में सुधार किया है बल्कि यह भी दिखाया है कि जब नीति, तकनीक और जमीनी क्रियान्वयन एक साथ आते हैं तो बड़े पैमाने पर परिवर्तन संभव होता है.
नीति आयोग की 2024 की बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट इस बदलाव की ठोस पुष्टि करती है. रिपोर्ट के मुताबिक 2013 से 2023 के बीच करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और बुनियादी सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. यह उस नए और विस्तारित मध्यवर्ग के उभार को दर्शाता है, जो देश की अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र दोनों के लिए मजबूत आधार बन रहा है. यह अनुभव बताता है कि जब योजनाएं लोगों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं. उनके कार्यान्वयन में सहयोगी दृष्टिकोण अपनाया जाता है तो परिणाम दूरगामी और टिकाऊ होते हैं.
विकास की गति
गेट्स फाउंडेशन ने अगले 20 साल में 200 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है. यह घोषणा इस विश्वास को दर्शाती है कि भारत जैसे देशों में दीर्घकालिक और वास्तविक परिवर्तन की अपार क्षमता है. यह परोपकार से कहीं आगे बढ़कर भविष्य में किया गया निवेश है. ऐसा निवेश जो स्वास्थ्य, पोषण, कृषि, शिक्षा और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में स्थायी प्रभाव पैदा कर सकता है, जब वह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और स्थानीय नेतृत्व के साथ मिलकर किया जाए.
भारत में उपलब्ध प्रतिभा, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और नवाचार की क्षमता वैश्विक स्तर पर प्रेरणा का स्रोत है. साझा प्रयासों के माध्यम से भारत न केवल अपनी विकास संबंधी चुनौतियों का समाधान कर रहा है बल्कि अन्य निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए भी उपयोगी समाधान प्रस्तुत कर रहा है. आज भारत वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए किफायती टीकों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. इसके साथ ही अफ्रीका और एशिया के कई देशों के साथ डिजिटल भुगतान, कृषि और स्वास्थ्य के लिए डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में अपने अनुभव साझा कर रहा है. यह साझेदारी भारत को वैश्विक विकास में एक सक्रिय और भरोसेमंद भागीदार के रूप में स्थापित करती है.
आज की आपस में जुड़ी दुनिया में सहयोग विकास की गति को कई गुना बढ़ाने की क्षमता रखता है. जब सरकारें स्पष्ट दृष्टि और पैमाने के साथ आगे बढ़ती हैं, नागरिक समाज जमीनी समझ और भरोसा जोड़ता है, निजी क्षेत्र नवाचार और संसाधन उपलब्ध कराता है और वैश्विक संस्थाएं दीर्घकालिक निवेश और ज्ञान साझा करती हैं तब विकास अधिक तेज, अधिक समावेशी और अधिक टिकाऊ बनता है. भारत के अनुभव यह दिखाते हैं कि सहयोग केवल संसाधनों का मेल नहीं है बल्कि यह साझा उद्देश्य, आपसी भरोसे और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की प्रक्रिया है. आने वाले सालों में मानव प्रगति की गति इस बात से तय होगी कि हम साझेदारी को कितनी गंभीरता और दूरदृष्टि के साथ अपनाते हैं. जब हम साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं तभी विकास सच मायनों में सबके लिए संभव हो पाता है.
(डिस्क्लेमर: लेखिका बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन में स्वास्थ्य, स्वच्छता, कृषि, लैंगिक समानता और वित्तीय समावेशन आदि पोर्टफोलियो का नेतृत्व करती हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)