माओवाद पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए मंकेली एक जाना-पहचाना नाम रहा है. माओवादियों ने एक ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी की थी. उसमें तत्कालीन एसपी मनहर अपने अधीनस्थों को मंकेली गांव से आदेश देते सुनाई देते हैं, ''अगर कोई पत्रकार सलवा जुडूम को कवर करने आए तो उसे मार डालो.'' साल 2006 में पुलिस और सलवा जुडूम के करीब 30 सदस्यों ने मंकेली में 50 से अधिक घर जला दिए थे. उस घटना में नौ लोगों की मौत हुई थी. इसलिए जब एक फोन आया और सामने वाले ने कहा कि वह मंकेली से बोल रहा है और उसे मदद चाहिए, तो मेरी उत्सुकता बढ़ गई.
माओवादी क्यों बने आकाश हेमला
फोन करने वाले ने अपना नाम आकाश हेमला बताया. उन्होंने बताया,''मैं अपने पिता कोवा हेमला और चचेरे भाई आयतु के साथ खेत में काम कर रहा था, तभी पुलिस ने हमें घेर लिया. उन्होंने हमारा घर जला दिया और मुझे उसमें फेंक दिया. मैं किसी तरह बच निकला, लेकिन बाद में उन्होंने मुझे पकड़ लिया. मुझे कुछ महीनों तक बीजापुर थाने में रखा गया. बाद में पता चला कि मेरे पिता का क्षत-विक्षत शव जंगल में मिला था. मेरे परिवार के छह लोगों को मार दिया गया था. उस समय मेरी उम्र 14 साल थी.''
उन्होंने बताया,''नए एसपी डांगी ने कहा कि मैं स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) बनने के लिए बहुत छोटा हूं.मुझे स्कूल भेज दिया गया. मेरी मां मुझसे मिलने आईं और बोलीं कि घर में खाने को कुछ नहीं है, क्या मैं गांव लौटकर जंगल से भोजन जुटाने में मदद कर सकता हूं. मैं गांव लौट गया, लेकिन जल्द ही पुलिस वहां पहुंच गई. मैं फिर बच निकला. इसके बाद माओवादी आए और बोले कि पुलिस मुझे लगातार परेशान करेगी, इसलिए उनके साथ चलना ही बेहतर होगा. उन्होंने मुझे एक पार्टी के स्कूल में रखा, जहां से मैं बाद में शिक्षक बना और पिछले साल तक माओवादियों के साथ रहा.''
आकाश हेमला के गांव से कितने लोग बने माओवादी
आकाश ने बताया कि उनका छोटा भाई अर्जुन और मां भी बाद में पार्टी में शामिल हो गई. उन्होंने बताया कि सलवा जुडूम के बाद मंकेली गांव के 65 और लोग माओवादी बन गए थे. उससे पहले उनके गांव से मनोज नाम का एक व्यक्ति माओवादी बना था.वह माओवादी बनने वाला उनके गांव का पहला व्यक्ति था. वो अब पुलिस के डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) में है. आकाश ने बताया कि माओवादी बनने वाले उनके गांव के आठ लोग पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए और बाकी बचे लोगों ने अब तक आत्मसमर्पण कर दिया है. पांच लोग पहले ही आत्मसमर्पण कर डीआरजी में शामिल हो गए थे. आकाश ने बताया कि अब हम सब वापस अपने गांव मंकेली जाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए हमें मदद चाहिए.
उन्होंने बताया कि अब तक उन्हें चार फोन आएं हैं, इनमें गांव लौटने पर जान से मारने की धमकी दी गई है.उन्होंने बताया कि माओवादियों ने उनके गांव के छह लोगों को मुखबिर बताकर उन्हें मार डाला था. आकाश ने बताया कि कल मेरी पत्नी की बुआ मंगली मुड़ियाम का फोन आया था. उन्होंने मुझसे कहा कहा कि अगर मैं मंकेली वापस गया तो वे लोग मुझे मार देंगे. उन्होंने मुझे खूब गालियां दीं.इससे पहले तीन डीआरजी जवानों ने भी यही चेतावनी दी थी.दूसरे लोगों को भी ऐसी धमकियां मिल रही हैं. आकाश ने बताया कि आत्मसमर्पण के बाद उन्हें अब तक कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली है, क्योंकि उनके पास कोई दस्तावेज नहीं हैं, इसलिए बैंक खाता भी नहीं खुल पाया है. इस समय वो तेलंगाना में रहकर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं.
जेल में बंद मां की रिहाई के लिए चाहिए पैसे
आकाश ने बताया कि उनकी मां हेमला पाइके जेल में हैं, जिन्हें छुड़ाने के लिए पैसे चाहिए. वकील ने 40 हजार रुपये मांगे हैं. उनका भाई अर्जुन महाराष्ट्र में वेणुगोपाल नाम के माओवादी नेता के साथ आत्मसमर्पण कर चुका है. वह उनका तकनीकी सहायक था और पार्टी की प्रेस विज्ञप्तियां आपको भेजता था. उसी ने मुझे आपका नंबर दिया था. हमारे इलाके में आत्मसमर्पण करने वालों में से कोई भी अब तक अपने गांव वापस नहीं जा पाया है. गांव में हमारी लगभग 10 एकड़ जमीन थी, जहां मैं खेती करना चाहता हूं हालांकि उसके कागजात हमारे पास नहीं हैं.
आकाश ने बताया, ''जिस स्कूल में मैंने चौथी तक पढ़ाई की थी, उसे माओवादियों ने उड़ा दिया था क्योंकि वहां पुलिस कैंप बना था. मैंने अपनी पुरानी मार्कशीट खोजने के लिए अपने शिक्षक से संपर्क किया ताकि उसके आधार पर बैंक खाता खुलवा सकूं, लेकिन उन्होंने बताया कि स्कूल पर हमले के दौरान सारे रिकॉर्ड जल गए थे.''
आत्मसमर्पण करने वाले ऐसे सैकड़ों लोग हैं, जो अपने घर लौटना चाहते हैं, लेकिन लौट नहीं पा रहे हैं. मैंने पूछा कि क्या मंकेली से सबसे अधिक लोग माओवादी बने थे, क्योंकि 120 घरों वाले गांव से 66 तो एक बड़ी संख्या है. उन्होंने कहा, ''नहीं, कुछ और गांवों से इससे भी ज्यादा लोग गए थे. पुसनार-मेटापाल से करीब 200 लोग माओवादी बने थे. सलवा जुडूम से पहले वहां केवल पुनेम कल्मू नाम का एक व्यक्ति माओवादी पार्टी में था. सावनार से करीब 70 लोग गए. सलवा जुडूम ने पुसनार में 30 लोगों और सावनार में करीब 15 लोगों को मार दिया था. मंकेली शायद बीजापुर जिले में तीसरे नंबर पर होगा. बीजापुर से ही सबसे ज्यादा लोग माओवादी बने. उनमें से अधिकांश सलवा जुडूम के बाद शामिल हुए थे. केवल सुकमा जिले में ही करीब 250 आत्मसमर्पण करने वाले लोग हैं, जो अब अपने गांव लौटना चाहते हैं.''
माओवादी पार्टी में क्या करते थे आकाश हेमला
आकाश ने बताया कि उनकी पत्नी शांति के गांव पेद्दाकोरमा में माओवादियों ने एक स्कूली छात्रा समेत आठ लोगों की हत्या कर दी. पुसनार में करीब 10 और सावनार में चार लोगों को मारा गया था. उन्होंने बताया,''मेरे भाई और मेरा किसी भी हत्या में कोई हाथ नहीं था. मेरे पिड़िया स्थित पार्टी स्कूल में करीब 100 बच्चे थे. उनमें से करीब सभी सलवा जुडूम के पीड़ित थे. बाद में मैं मोबाइल स्कूल में पढ़ाने लगा और विभिन्न पार्टी इकाइयों में जाकर शिक्षा देता था. हम गणित, हिंदी, राजनीति और मानवशास्त्र पढ़ाते थे. किताबें लिखते और उनका अनुवाद भी करते थे. मेरी मां का काम जेल में बंद पार्टी कार्यकर्ताओं की मदद करना था.''
आकाश ने बताया,''पिछले साल कर्रेगुट्टा पहाड़ियों में हुए चर्चित अभियान के दौरान मैं वहीं था. उसके बाद हम बटालियन-1 के केसा दादा और बारसे देवा दादा के साथ तेलंगाना भाग गए और वहीं आत्मसमर्पण किया. वे भी अब तक अपने गांव नहीं लौट पाए हैं. हम लोगों के गुस्से को समझते हैं और कुछ डीआरजी जवान निजी बदला लेना चाहते हैं. अमित शाह ने हमसे आत्मसमर्पण करने के लिए कहा था. आपकी मदद से मैं उनसे कहना चाहता हूं कि हमें अपने गांवों में फिर से बसाना भी उनकी जिम्मेदारी है.''
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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