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भारत में वामपंथ क्यों ख़त्म हो गया, बीजेपी का मुक़ाबला क्यों नहीं कर पाए कम्युनिस्ट

राजन झा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 11, 2026 13:19 pm IST
    • Published On मई 11, 2026 13:06 pm IST
    • Last Updated On मई 11, 2026 13:19 pm IST
भारत में वामपंथ क्यों ख़त्म हो गया, बीजेपी का मुक़ाबला क्यों नहीं कर पाए कम्युनिस्ट

इस साल अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव के बाद 50 साल में ऐसा पहली बार है कि देश के किसी भी राज्य में कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले वाम मोर्चा की सरकार नहीं है. कम्युनिस्ट आंदोलन जिसने कभी ख़ुद को ग्लोबल साउथ और पूंजीवादी विचारधारा के विकल्प के रूप में एक उम्मीद दी थी, आज़ यह महज़ चुनावी हार तक सीमित न होकर भारतीय साम्यवाद के अंत होने तक पहुंच चुकी है.

त्रिपुरा और बंगाल लंबे समय तक वाम मोर्चे की सरकार वाले राज्य रहे हैं. पहले बंगाल और बाद में त्रिपुरा में वाम मोर्चे की सरकार की हार के समय ही यह तय हो गया था कि एक दिन ऐसा आने वाला है जब लाल झंडे की सरकार कहीं नहीं रहेगी.केरल में हर पांच साल के बाद सरकार बदल जाती रही है. 50 सालों में 2021 में ऐसा पहली बार हुआ कि केरल में सरकार नहीं बदली और वाम मोर्चे को दुबारा जीत मिली. यह एक अप्रत्याशित जीत थी अन्यथा 2021 में ही ऐसा हो गया होता कि वाम मोर्चा देश में कहीं सरकार में नहीं होता.

पश्चिम बंगाल में वामपंथ के उखड़े पैर

बंगाल में 2011 में हार के बाद लगातार चुनाव में वाम मोर्चा कमजोर होता गया. 2011 में बीजेपी, कांग्रेस, कुछ कम्युनिस्ट पार्टियों और माओवादियों ने मिलकर 34 सालों से चली आ रही वाम मोर्चे की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया. चुनाव के तुरंत बाद राज्य को भयंकर हिंसा का सामना करना पड़ा. सैकड़ों पार्टी कार्यालयों पर तृणमूल के लोगों ने कब्जा कर लिया. सीपीएम और दूसरे सहयोगी वाम दलों के कार्यकर्ताओं के घर जला दिए गए, उनकी हत्या की गई, बहुत बड़े पैमाने पर वाम समर्थकों को बंगाल छोड़ना पड़ा. 

2026 के विधानसभा चुनाव में बंगाल की जनता के सामने दो विकल्प थे, एक तरफ तृणमूल और दूसरी तरफ़ बीजेपी. इस दो ध्रुवीय चुनाव के बाद भी पश्चिम बंगाल विधानसभा में सीपीएम विधायक की वापसी हुई है. इस प्रचंड ध्रुवीकरण के बावजूद जनता के एक तबके ने वाम मोर्चे को वोट किया है. 

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 1957 में केरल में अपनी पहली सरकार बनाई. यह सरकार मामूली बहुमत से बनी थी. यह दुनिया में कहीं भी लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई पहली कम्युनिस्ट सरकार थी. इस सरकार ने व्यापक कृषि और भूमि सुधार जैसे कई महत्वपूर्ण फैसले लिए. मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदरीपाद की अध्यक्षता वाली प्रशासनिक सुधार समिति ने भारत में पहली बार पिछड़े समुदाय के एक संपन्न वर्ग को आरक्षण के लाभों से वंचित करने का प्रस्ताव रखा था.'क्रीमी लेयर' को आरक्षण से वंचित करने की वर्तमान व्यवस्था इसी सिफारिश का परिणाम है . 

भारत में कहां हुई थी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना

पश्चिम बंगाल: 1977 से 2011 तक पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे लंबा कार्यकाल रहा. हालांकि, बंगाल में साम्यवाद का लंबा इतिहास 1925 से आरम्भ होता है, जब एमएन रॉय ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की. कम्युनिस्ट पार्टी की 1977 में जीत का कारण आपातकाल और कांग्रेस द्वारा कथित तौर पर चुनाव में धांधली रहा . तीन दशक तक सत्ता में रहे वामपंथियों को तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता से बेदखल किया. साल 1990 के दशक में उदारीकरण की नीति और जबरन भूमि अधिग्रहण ने वाम दलों से उनके पारंपरिक आधार को दूर कर दिया. इसके अलावा आर्थिक विकास में ठहराव के कारण एक वर्ग में अलगाव की भावना और सत्ता विरोधी लहर भी शामिल है. इसके साथ ही बंगाल में तृणमूल के रूप में एक वैकल्पिक राजनीतिक दल का उदय हुआ. 

त्रिपुरा में कैसे सिमटा कम्युनिस्ट आंदोलन

त्रिपुरा में पहली कम्युनिस्ट सरकार 1977 में सत्ता में आई. त्रिपुरा की करीब 70 फीसदी आबादी बंगाली बहुल है. जाहिर है कि पश्चिम बंगाल से साम्यवाद का प्रभाव त्रिपुरा तक पहुंचा. 'इंडियन एक्सप्रेस' के एक लेख के मुताबिक़ कम्युनिस्टों ने भारत की स्वतंत्रता से बहुत पहले त्रिपुरा में काम करना शुरू कर दिया था.वामपंथी कार्यकर्ताओं ने मुख्य रूप से आदिवासी समुदाय के बीच काम किया. कम्युनिस्टों ने आदिवासियों की माली हालत के लिए राजपरिवार को जिम्मेदार ठहराया. यदि बीजेपी की त्रिपुरा जीत का विश्लेषण किया जाए तो 2015 के पहले बीजेपी का एक वार्ड काउंसलर भी वहां नहीं था. विपक्षी दलों में टूट-फूट और दल बड़ा होने के कारण बीजेपी त्रिपुरा में सरकार बनाने में सफल रही. इसके अलावा आरएसएस ने आदिवासियों के बीच जा कर राष्ट्रीय मुद्दे और हिंदुत्व के विचारधारा को स्थानीय चिंताओं के साथ जोड़कर सफलता हासिल की.

भारत में वामपंथ के कमजोर होने का कारण क्या है

भारत में वामपंथी आंदोलन का उदय और विकास आधुनिक उद्योगों के विकास और ब्रिटेन और रूस जैसे देशों में समाजवादी आंदोलन के प्रभाव के परिणामस्वरूप हुआ. बंबई, कलकत्ता और मद्रास जैसे कुछ स्थानों में औद्योगिक विकास के फलस्वरूप एक बड़ी आबादी अस्तित्व में आई. श्रमिकों ने बेहतर कार्य परिस्थितियों और उचित मजदूरी की मांग के लिए ख़ुद को संगठित करना शुरू किया. इससे ट्रेड यूनियन का जन्म हुआ. इसका मतलब यह हुआ कि कम्युनिस्ट पार्टी के उदय का कारण समाज की आर्थिक संरचना में निहित है. जब आर्थिक ढांचे का स्वरूप औद्योगीकरण था तब मजदूरी संगठित क्षेत्र में काम करते थे, अब आर्थिक ढांचे में आए में परिवर्तन की वजह से असंगठित क्षेत्र में रोज़गार अधिक हैं. इस वजह से मज़दूर अधिकतर असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. यहां ट्रेड यूनियनों का प्रवेश कम है.यह कम्युनिस्ट मूवमेंट के कमजोर पड़ने के प्रमुख कारणों में से एक है. 

दूसरा कारण भारत में 1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण और उसके परिणामस्वरूप भारतीय राजनीति में पहचान की राजनीति का मजबूत होना है. इस आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के जातीय तत्व के साथ तो लेफ्ट ने सकारात्मक इंगेजमेंट किया परंतु धीरे-धीरे पहचान की राजनीति ने पोलिटिकल डिस्कोर्स को ही बदल दिया. फलस्वरूप,क्लास पॉलिटिक्स की गुंजाइश कम हो गई. आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के दूसरे स्वरूप हिंदुत्व की राजनीति से सामना करने में लेफ्ट पार्टियां पूरी तरह से विफल रहीं. वजह राष्ट्रीय स्तर पर संसाधन का कम होना और जातीय समीकरणों के आधार पर चुनावी राजनीति का सफल होना प्रमुख है. वामपंथी दल आज़ादी के पहले और बाद कभी भी राष्ट्रीय एजेंडा सेट करने की स्थिति में नहीं रहे, उन्होंने पहले कांग्रेस और बाद के दिनों में बीजेपी की ओर से स्थापित किए एजेंडे को मात्र काउंटर करने का ही काम किया. 

(डिस्क्लेमर: लेखक बिहार के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के एचपीएस कॉलेज, मधेपुर में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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