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This Article is From Mar 17, 2018

विज्ञान मंत्री के दावे से खड़ा एक बखेड़ा

सुधीर जैन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 17, 2018 18:45 pm IST
    • Published On मार्च 17, 2018 18:45 pm IST
    • Last Updated On मार्च 17, 2018 18:45 pm IST
इस साल की विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री के दिए भाषण की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. आमतौर पर ऐसे आयोजनों को आजकल एक औपचारिकता ही माना जाता है. इसीलिए मीडिया में ऐसे भाषणों को ज्यादा तरजीह मिलना बंद हो चला था. लेकिन यह पहला मौका है कि केंद्रीय मंत्री के भाषण पर देश के विद्वान कुछ ज्यादा ही खुलकर सवाल कर रहे हैं. कुछ विद्वान सवाल से ज्यादा मज़ाक उड़ा रहे हैं. सोशल मीडिया पर तो कुछ विद्वान बाकायदा वह सबूत ले आए कि वैज्ञानिक हॉकिंग ने वेदों की वैज्ञानिकता के बारे में अपनी कोई राय दी ही नहीं थी. जबकि विज्ञान मंत्री ने यह बात ठोक कर कह डाली.

आखिर क्या कह दिया विज्ञान मंत्री ने
दरअसल विज्ञान मंत्री ने यह कह दिया था कि वेदों में अलबर्ट आइंस्टीन के प्रसिद्ध सिद्धांत से भी बेहतर सिद्धांत पहले से लिखे हुए हैं. हालांकि ऐसे दावे गाहे बगाहे होते रहते हैं. लेकिन विज्ञान कांग्रेस के भाषण में विज्ञान मंत्री ने यह भी कह डाला कि इस सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने इस बात की तस्दीक की थी. बस इसी दूसरी बात से बखेड़ा खड़ा हो गया. हॉकिंग के तस्दीक वाले सनसनीखेज रहस्योद्घाटन के बाद विज्ञान मंत्री से साक्ष्य संदर्भ मांगा गया. लेकिन इसे फौरीतौर पर उन्होंने दाएं बाएं कर दिया. फिर क्या था, मीडिया ने हॉकिंग और वेद को जोड़कर छानबीन शुरू कर दी. पता चला कि कोई वेद शोध संगठन है जिसकी वेबसाइट पर हॉकिंग की तस्दीक का जिक्र किया गया है. उसके बाद और खोजबीन होने लगी पता करते-करते यह पता चला कि पांच साल पहले इस शोध संगठन द्वारा हॉकिंग को वेदों के बारे में एक आलेख भेजा गया था. इस शोध आलेख के साथ लगी चिट्ठी का विज्ञानोचित भाषा में जवाब हॉकिंग ने यह दिया था कि इस पर कोई टिप्पणी करना उनके लिए संभव नहीं है. हॉकिंग ने अपने ऊपर दूसरे कामों के बोझ होने और व्यस्त होने का तर्क दिया था. हॉकिंग का वही पत्र सोशल मीडिया में शेयर होकर दुनियाभर में घूमने लगा है. और अब चर्चा हो रही है कि विज्ञान के इतने बड़े आयोजन में इतने बड़े ओहदेदार व्यक्ति की तरफ से इतनी कच्ची बात कैसे बोल दी गई कि हॉकिंग ने वेद ज्ञान को आइंस्टीन के सिद्धांत से भी बेहतर माना था. अब बात निकल पड़ी है तो हकीकत का पता चलेगा ही.

सवाल अपने विज्ञान की अस्मिता का
बात बाजिब हो या न हो लेकिन अपने ज्ञान विज्ञान का आग्रह और गर्व सब में होता है. हम में भी है और इस पर किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए. लेकिन ज्ञान और विज्ञान ऐसा क्षेत्र है जो तर्क की मांग करता है. कम से कम इस समय तो आधुनिक विज्ञान का रूप लौकिक जगत तक सीमित है. वह अलौकिक को नहीं देखता. क्योंकि विज्ञान के पास इस लोक से बाहर झांकने की वैज्ञानिक पद्धति नहीं है. इधर हमारा ज्यादातर प्राचीन ज्ञान भंडार अलौकिक और दिव्य दृष्टि से उपजा है. बेशक वैज्ञानिक रुझान के अपने कुछ प्राचीन ऋषियों मुनियों ने अपने लौकिक सौरमंडल का पर्यवेक्षण भी शुरू कर दिया था. दूसरे देशों की तरह हमने भी अपने कलेंडर या पंचाग बना लिए थे. लेकिन उन खगोलीय उपलब्धियों को हमने भाग्य जानने वाले फलित ज्योतिष तक सीमित कर दिया. अपना प्राचीन कलेंडर आज सिर्फ जन्मकुंडली के ही काम आ पा रहा है. आज स्थिति यह है कि दुनिया में और कहीं तो क्या हम खुद अपने उस प्राचीन कलेंडर को रोजमर्रा के काम में इस्तेमाल नहीं कर पाते. अपने इस्तेमाल में दूसरे देश के खगोलशास्त्रियों का कलेंडर ही है. क्यों? विज्ञान के राष्ट्रीय पर्व या आयोजनों में क्या इस पर विचार नहीं हो सकता? नेशनल साइंस कांग्रेस में इस तरह के सवाल उठते तो बहुत संभव है हमें यह जानने और बताने का भी मौका मिलता कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में और क्या क्या है? और जो जो है वह आज कितना प्रासंगिक है? और यह भी मौका मिल सकता है कि हमारे आदि ज्ञानी जो कह गए हैं उनमें कोई और गूढ़ बात तो नहीं है जो हमें अब तक समझ में न आई हो. तब हम दुनिया को ठोककर यह भी बता पाते कि आइंस्टीन से बेहतर कौन सा सिद्धांत या सूत्र हमारे पास प्राचीन काल से है.

विज्ञान और मैंपना
ज्ञान फिर भी अपना अपना हो सकता है लेकिन विज्ञान भू निरपेक्ष है. दो और दो चार होते हैं यह किसने सबसे पहले बताया इसे जानने में आज किसी की भी दिलचस्पी नहीं है. त्रिभुज के तीनों कोणों का योग 180 अंश होता है इसे सिद्ध करने वाली प्रमेय देने वाले का नाम हम जरूर याद रखे हैं लेकिन उस गणितज्ञ का देश उस पर ज्यादा इतराता नहीं है. बल्कि दूसरे देश भी उस विज्ञानी को अपने ग्रह का वासी मानकर मुदित होते हैं. कम से कम ज्ञान विज्ञान के मामले में आजकल देशी विदेशी या तेरा मेरा कोई नहीं करता. हां इतना जरूर है कि जब किसी विषय पर कोई वैज्ञानिक शोध करता है तो उस विषय के इतिहास को भी उसे पढ़ना पड़ता है. पहले के वैज्ञानिकों के शोधकार्यों का संदर्भ उसे देना ही पड़ता है. लेकिन संदर्भ में वैज्ञानिक की राष्ट्रीयता बताने की ज़रूरत नहीं समझी जाती. अबतक का चलन यही है कि वैज्ञानिकों को राष्ट्रनिरपेक्ष मानकर उन्हें विश्व का निवासी मानते हैं.

विज्ञान का लक्ष्य
सार्वभौमिक रूप से माना जाता है कि विज्ञान का लक्ष्य मानव हित में प्रकृति के रहस्यों को जानना है. सारे रहस्यों का जानना तो दूर की बात है अभी तो यह भी नहीं पता कि प्रकृति के कितने रहस्यों से ही हम अनजान हैं. रोज़ नए नए रहस्य सामने आ जाते हैं. इसीलिए आधुनिक विज्ञान विनम्रता से मानकर चलता है कि परम यानी एब्सल्यूट कुछ भी नहीं.

विज्ञान की सीमा
दो चीजें हमारे सामने हैं, एक समय और दूसरी चीज़ ब्रह्मांड जिसका ओर छोर हम आजतक पता नहीं कर पाए. यहां तक कि इन दोनों के ओर छोर की कल्पना तक नहीं कर पाते. इसीलिए हर देश के ज्ञान विज्ञान में ब्रह्मांड और समय को अनादि और अनंत मानकर मजे से काम चल रहा है. इसी हफ्ते दिवंगत महान वैज्ञानिक हॉकिंग प्रकृति के इन दो महारहस्यों को समझने और समझाने में लगे थे. लेकिन अपने लंबे जीवनकाल में सघन कार्य के बावजूद वे सिर्फ शोधकार्ययोग्य शोध परिकल्पनाएं यानी सिर्फ वर्कएबिल हाइपॉथिसिस देकर गए हैं. उनके बाद अब ये हमारा काम है कि उन शोध परिकल्पनाओं को सिद्ध या असिद्ध करें. उनकी शोधयोग्य परिकल्पना चाहे सिद्ध हो या असिद्ध, उसका महत्त्व ऐतिहासिक ही होगा. क्योंकि सिद्ध या असिद्ध करने के उद्यम में प्रकृति के कई और रहस्य जानने का मौका मिलेगा. ज्ञान पाने के नए दरवाजे खुलेंगे.

कितनी बड़ी चीज़ है कार्ययोग्य शोध परिकल्पना
देश दुनिया में जो लोग भी शोधकार्य में लगे हैं उन्हें पता है कि बगैर शोध परिकल्पना के शोध का काम शुरू ही नहीं हो पाता. वैज्ञानिक शोध को आगे बढ़ाने की पहली शर्त यह होती है कि शोध परिकल्पना कार्ययोग्य होनी चाहिए. लौकिक जगत से इतर यानी अलौकिक रहस्यों पर क्रमबद्ध अध्ययन या शोध की गुंजाइश इसीलिए नहीं बन पाती क्योंकि शोधकर्ता इस लोक के आगे जा ही नहीं सकता. हां दिव्यशक्तिपूर्ण मानव जरूर यह दावा कर सकता है कि वह इस लोक से बाहर जाकर भी पर्यवेक्षण कर सकता है. कई कारणों से इस दावे की पुष्टि का तरीका अभी ईजाद नहीं हुआ. प्राचीनकाल से ही अलौकिक ज्ञान से पूर्णसमृद्ध होने का दावा करने वाले हम तो इस बात के लिए भी तैयार नहीं है कि हमें आगे कुछ और जानने की जरूरत है. अगर हमने यह मान लिया कि हमारे पास सबकुछ जाना हुआ पड़ा है तो वैज्ञानिक विकास या प्रगति की बात ही खत्म हो जाती है. बहुत संभव है कि हमारे विश्वविद्यालय या विज्ञान संस्थान विश्व पटल पर अपनी जगह इसी कारण से न बना पा रहे हों.

(सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...)

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