पिछले एक हफ्ते से प्रियंका वाड्रा ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रचार का ज़िम्मा संभाल लिया है। मीडिया की सुर्खियों में सोनिया गांधी-राहुल गांधी पीछे चले गए हैं, जबकि प्रियंका नरेंद्र मोदी से दो-दो हाथ करती दिख रही हैं। उन्होंने अभी खुद को अपने भाई और मां के चुनाव क्षेत्र अमेठी-रायबरेली में ही सीमित रखा हुआ है। मोदी पर प्रियंका के हमलों में राहुल की तुलना में ज़्यादा पैनापन है और उनके हमले नरेंद्र मोदी और बीजेपी को ज़्यादा चुभ रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने प्रियंका के हमलों का अपने अंदाज़ में जवाब दिया है। तो वहीं बीजेपी ने उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के कथित ज़मीन घोटालों को लेकर पहली बार औपचारिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हमला किया है।
नेहरू-गांधी परिवार पर बीजेपी के इतने तीखे हमले इससे पहले शायद ही कभी हुए हों। कांग्रेस और बीजेपी में एक तरह का अघोषित समझौता रहा है, जिसमें नेताओं के व्यक्तिगत मामलों और परिवार के सदस्यों पर छींटा-कशी नहीं की जाती है। सबसे पहले जब रॉबर्ट वाड्रा के ज़मीन सौदों और उन्हें डीएलएफ से मिले फायदे के बारे में खबरें आईं तो इन्हें संसद में उठाने को लेकर बीजेपी में एक राय नहीं बन सकी। पार्टी के बड़े नेताओं में इसे लेकर मतभेद थे। यह दलील दी गई कि कांग्रेस वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य का मुद्दा उठा सकती है। एक बड़े नेता जो इस मामले को संसद में उठाना चाहते थे, उन्हें जब ऐसा करने से रोक गया तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने की धमकी भी दी थी। इसके बावजूद बीजेपी ने वाड्रा के मामलों पर चुप्पी साधे रखी।
लेकिन अब ये चुप्पी टूट गई है। इसके पीछे बड़ी वजह कांग्रेसी नेताओं द्वारा नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत मामलों को चुनाव में उछालना हो सकता है। खुद राहुल गांधी ने मोदी की वैवाहिक स्थिति का सवाल चुनाव में उठाया है। कानून मंत्री कपिल सिब्बल इसे लेकर चुनाव आयोग भी पहुंच गए। राहुल और प्रियंका बार-बार अपनी चुनावी सभाओं में कथित महिला जासूसी कांड को उठाकर महिला सुरक्षा के बारे में मोदी के दावों पर सवाल उठाते हैं। मोदी समर्थक नेता मानते हैं कि पिछले बारह साल में कांग्रेस ने जिस तरह से उन्हें घेरने की कोशिश की है, उसके बाद से उनसे नेहरू-गांधी परिवार पर हमला न करने की अपेक्षा करना बेमानी होगा। चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी लगातार ‘जीजाजी’ की बात कह कर वाड्रा पर निशाना साधते रहे हैं। बीजेपी का कहना है कि ये व्यक्तिगत हमले नहीं हैं बल्कि भ्रष्टाचार के मुद्दे हैं।
इसीलिए प्रियंका वाड्रा का पलटवार बेहद दिलचस्पी से देखा जा रहा है। यह कोई छिपी बात नहीं है कि कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं में राहुल की तुलना में प्रियंका के प्रति अधिक आकर्षण है। प्रियंका में उन्हें इंदिरा गांधी की छवि दिखती है। उनका आक्रामक अंदाज़ भी इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता है। चुनाव अभियान की शुरुआत से पहले ऐसी खबरें भी आईं थीं कि प्रियंका अधिक सक्रिय होकर अमेठी-रायबरेली के बाहर भी कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रियंका ने वाराणसी में प्रचार करने की अटकलों को भी खारिज कर दिया है। कार्यकर्ताओं की मांग के बावजूद प्रियंका को औपचारिक रूप से पार्टी में कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गई है। माना जाता है कि अगर ऐसा होता है तो फोकस राहुल से हटकर प्रियंका पर आ जाएगा जबकि सोनिया गांधी ऐसा नहीं चाहती हैं।
प्रियंका ने भी अपने-आप को सक्रिय राजनीति से दूर रखा है। वो पर्दे के पीछे रह कर ही अपने भाई और मां की मदद करती हैं। चुनावों के वक्त वो ज़रूर अपने भाई और मां के संसदीय क्षेत्रों में प्रचार करती हैं। अपने पति रॉबर्ट वाड्रा के ज़मीन सौदों को लेकर उठे विवाद पर इससे पहले उन्होंने कभी चुप्पी नहीं तोड़ी थी। यहां तक कि अपने उपनाम को लेकर भी वह बेहद सतर्क रहती हैं। वह नहीं चाहती हैं कि उनके नाम के साथ गांधी जोड़ा जाए। 2007 के विधानसभा चुनावों में सुल्तानपुर में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा भी था कि उन्हें प्रियंका वाड्रा कहा जाए न कि प्रियंका गांधी।
चुनाव में अभी मतदान के तीन दौर बाकी हैं, लेकिन कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की बात कहकर एक तरह से हथियार डालने शुरू कर दिए हैं। ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में राहुल गांधी प्रभावी साबित नहीं हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अपने सबसे असरदार हथियार के रूप में प्रियंका को आगे किया है, लेकिन लगता है कि इसमें भी बहुत देरी हो चुकी है। अपने पति पर लगे आरोपों का उन्होंने भावनात्मक ढंग से जवाब देने की कोशिश की है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी चुनावों में भावनात्मक मुद्दों को उठा दिया करती थीं। पर बीजेपी जिस अंदाज में वाड्रा मुद्दे पर आक्रामक हुई है उससे प्रियंका को भी हमलावर होना पड़ा है। यहां तक कि वाड्रा के मामले को एक नागरिक का निजी मुद्दा बता कर खारिज करने वाली कांग्रेस को भी सफाई देनी पड़ी है। ज़ाहिर है रॉबर्ट वाड्रा के मुद्दे पर आखिरी शब्द कहा जाना अभी बाकी है।
This Article is From Apr 28, 2014
चुनाव डायरी : कांग्रेस को मिला प्रियंका का सहारा
Akhilesh Sharma
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Updated:नवंबर 20, 2014 13:02 pm IST
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Published On अप्रैल 28, 2014 11:10 am IST
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Last Updated On नवंबर 20, 2014 13:02 pm IST
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