दिल्ली, प्रयागराज, लखनऊ, कानपुर, मेरठ और कई अन्य शहरों में मौजूद सिविल लाइंस में टहलते हुए आप एक अलग संसार में चले जाते हैं. तब लगता है कि अब भी ब्रिटिश दौर जारी है. इधर की चौड़ी सड़कें और उनके दोनों तरफ लगे बुजुर्ग पेड़, गिरिजाघर और उस दौर की इमारतें आपको एक खुशनुमा सा अहसास करवाती हैं. पर अब भारत सरकार देश के विभिन्न शहरों के सिविल लाइंस क्षेत्रों से ब्रिटिश काल के प्रतीकों को हटाने पर गंभीरता से विचार कर रही है. यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक भारत को पूर्ण रूप से डीकोलोनाइज्ड बनाने के विजन का हिस्सा है. 'सिविल लाइंस' शब्द और इन क्षेत्रों की संरचना ब्रिटिश राज की सबसे स्पष्ट यादों में से एक है. ये क्षेत्र ब्रिटिश सिविलियन अधिकारियों (जैसे डिविजनल कमिश्नर और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट) के लिए विशेष रूप से बनाए गए थे, जहां वे भारतीय 'नेटिव टाउन' से अलग, आरामदेह और शक्तिशाली जीवन बिता सकें.
भारतीय शहरों में अंग्रेजों की रिहाइश
19वीं सदी में विकसित ये 'व्हाइट टाउन' आज भी दिल्ली, प्रयागराज, लखनऊ, कानपुर और कई अन्य शहरों में मौजूद हैं. सिविल लाइंस की अवधारणा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रणनीति का परिणाम थी. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने अपनी सुरक्षा और श्रेष्ठता को मजबूत करने के लिए शहरों को दो हिस्सों में बांट दिया. एक तरफ पुरानी भीड़-भाड़ वाली भारतीय बस्तियां , दूसरी तरफ विस्तृत सड़कें, हरे-भरे बगीचे, बड़े बंगले और आधुनिक सुविधाओं वाला 'सिविल लाइंस'. ये क्षेत्र कैंटोनमेंट (सैन्य छावनी) से अलग लेकिन निकट थे. ब्रिटिश सिविल सर्वेंट्स, जज, कलेक्टर और उच्च अधिकारी यहां रहते थे. यहां की इमारतें यूरोपीय शैली की थीं-विशाल बरामदा, ऊंची छतें, लकड़ी के फर्श और बगीचों से घिरी. यह व्यवस्था न केवल आराम देती थी बल्कि सामाजिक-जातीय दूरी भी बनाए रखती थी. ब्रिटिश खुद को 'सिविलाइज्ड' मानते थे, इसलिए इन क्षेत्रों को 'सिविल लाइंस' नाम दिया गया.
दिल्ली में सिविल लाइंस का इतिहास 1857 से गहराई से जुड़ा है. मुगल राजधानी शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) के उत्तर में, यमुना नदी के किनारे स्थित यह क्षेत्र ब्रिटिशों का पहला प्रमुख आवासीय केंद्र बना. 1803 में ब्रिटिशों ने दिल्ली पर कब्जा किया तो वे शुरू में कश्मीरी गेट और आसपास रहते थे. लेकिन 1857 के विद्रोह ने सब बदल दिया. विद्रोहियों ने ब्रिटिश बंगलों को आग के हवाले कर दिया. विद्रोह दबाने के बाद ब्रिटिशों ने सिविल लाइंस को मजबूत बनाया. यह क्षेत्र रिज (उत्तर दिल्ली रिज) के पास था, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था. यहां ब्रिटिश सिविलियन अधिकारी रहते थे. लुटियंस दिल्ली (नई दिल्ली) 1931 में बनने तक सिविल लाइंस ही प्रशासनिक केंद्र था.

कैसा है दिल्ली का सिविल लाइंस
दिल्ली के सिविल लाइंस में ब्रिटिश प्रतीक आज भी मौजूद हैं. सबसे प्रमुख है निकोलसन कब्रिस्तान, जो 1857 में स्थापित हुआ. ब्रिटिश सैनिकों और अधिकारियों की मौत के बाद इसे बनाया गया. यहां ब्रिगेडियर जॉन निकोलसन की कब्र है, जो विद्रोह दबाने में अहम भूमिका निभाने वाले ब्रिटिश अधिकारी थे. कब्रिस्तान में पुरानी कब्रें, परिवारों के प्लॉट और युद्ध में मारे गए अज्ञात सैनिकों की समाधियां ब्रिटिश साम्राज्य की हिंसा की कहानी कहती हैं. निकोलसन कब्रिस्तान के पास एक चर्च भी है, जो स्थानीय ईसाइयों के लिए बनाया गया था. यह क्षेत्र अभी भी रहस्यमयी कहानियों और पैरानॉर्मल घटनाओं से जुड़ा माना जाता है.
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रतीक है कुदसिया बाग. मूल रूप से मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला की बेगम कुदसिया द्वारा 1748 में बनाया गया चारबाग शैली का बगीचा, 1857 में ब्रिटिशों ने इसे नष्ट कर दिया. बाद में यहां अंग्रेजी शैली का बंगला बनाया गया. हाथी गेट भी यहां है. बहादुर शाह जफर द्वारा बनवाई गई यह मोटी दीवार वाली गेट ब्रिटिश काल में सिविल लाइंस की
सीमा बन गई.
मैडंस होटल (अब ओबेरॉय मैडंस) दिल्ली के सिविल लाइंस का गहना है. ब्रिटिश काल का यह हेरिटेज होटल सफेद इमारत, पुरानी लॉबी और स्विमिंग पूल के साथ औपनिवेशिक वास्तुकला का जीवंत उदाहरण है. सिविल लाइंस में पुराने बंगले अभी भी बने हुए हैं. इनमें लाल ईंटें, स्तंभ, बरामदा और बगीचे ब्रिटिश जीवनशैली को दर्शाते हैं. अलीपुर रोड पर पुराना सेक्रेटेरिएट था, जहां 19 ब्रिटिश गवर्नर जनरल (वायसरॉय) कार्यरत रहे. आज यहां इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर वीमेन है. मेटकाफ हाउस भी ब्रिटिश रेजिडेंट सर थॉमस मेटकाफ का निवास था. ये सभी इमारतें ब्रिटिश शासन की सत्ता का प्रतीक थीं.
दिल्ली के सिविल लाइंस ने 1911 के बाद लुटियंस दिल्ली को रास्ता दिया, लेकिन उससे पहले यह ब्रिटिश शक्ति का
केंद्र था. आज यह क्षेत्र दिल्ली विश्वविद्यालय, विधानसभा, मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल निवास से जुड़ा है. लेकिन ब्रिटिश बंगलों की छाया अभी भी है. चौड़ी सड़कें, हरे पार्क और शांत वातावरण.
सिविल लाइंस में होता क्या था
देश के अन्य शहरों में भी सिविल लाइंस की कहानी लगभग समान है. प्रयागराज (पूर्ववर्ती इलाहाबाद) में सिविल लाइंस सबसे प्रसिद्ध है. 1858 के बाद कमिश्नर कथबर्ट बेंसली थॉर्नहिल ने इसे 'कैनिंगटन' नाम से विकसित किया. ग्रिड पैटर्न वाली सड़कें, ब्रिटिश बंगले, एंग्लिकन चर्च, थिएटर और सोशल क्लब इसे मॉडल बनाते थे. यह ब्रिटिश अधिकारियों का प्रशासनिक और आवासीय केंद्र था, पुरानी घाटों और बाजारों से अलग. आज भी प्रयागराज का सिविल लाइंस अपनी औपनिवेशिक छवि बनाए हुए है.
लखनऊ, कानपुर, बरेली, झांसी, जयपुर, नागपुर और मुरादाबाद जैसे शहरों में सिविल लाइंस ब्रिटिश राज की विरासत हैं. कानपुर में यह औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जहां ब्रिटिश अधिकारी मिल-मालिकों के साथ रहते थे. लखनऊ में अवध के बाद ब्रिटिशों ने सिविल लाइंस को कैंटोनमेंट से जोड़कर मजबूत किया. इन सभी जगहों पर वही पैटर्न: चौड़ी सड़कें, बड़े बंगले, चर्च, क्लब (जैसे यूनाइटेड सर्विस क्लब) और ब्रिटिश अधिकारियों के नाम पर सड़कें.
राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में भी सिविल लाइंस मौजूद हैं. ये क्षेत्र बेहतर बुनियादी ढांचा, कम घनत्व और यूरोपीय जीवनशैली के प्रतीक थे. ब्रिटिश दौर के प्रतीक इन क्षेत्रों में कई रूपों में मौजूद हैं.सबसे प्रमुख है वास्तुकला.विक्टोरियन और एडवर्डियन शैली के बंगले, जो भारत की जलवायु के अनुकूल बरामदा और ऊंची छतों के साथ बने. ये बंगले न केवल रहने के लिए थे बल्कि सत्ता प्रदर्शन के प्रतीक थे. चर्च (जैसे दिल्ली और प्रयागराज में), कब्रिस्तान, क्लब और थिएटर ब्रिटिश सामाजिक जीवन को दर्शाते थे. कई सड़कें और इमारतें ब्रिटिश अधिकारियों (जैसे निकोलसन, मेटकाफ) के नाम पर थीं. मूर्तियां हालांकि स्वतंत्रता के बाद 1950-70 के दशक में ज्यादातर
हटा दी गईं, लेकिन नाम और इमारतें बनी रहीं. ये प्रतीक ब्रिटिश श्रेष्ठता की मानसिकता को मजबूत करते थे- रंगभेद, अलगाव और साम्राज्यवादी नियंत्रण.
भारतीयों के लिए कब खुला सिविल लाइंस
स्वतंत्रता के बाद सिविल लाइंस धीरे-धीरे भारतीयों के लिए खुले. आज ये क्षेत्र मिश्रित हैं. इधर सरकारी बंगले, कॉलेज, होटल
और व्यावसायिक इमारतें हैं. लेकिन नाम 'सिविल लाइंस' अभी भी औपनिवेशिक विरासत को जीवित रखता है. सरकार का प्रस्ताव इन नामों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का है, जैसे लोक-कल्याण या स्वतंत्रता सेनानियों के नाम. यह विवादास्पद भी है. कुछ इसे इतिहास मिटाने का प्रयास मानते हैं, तो कुछ सांस्कृतिक स्वाधीनता का कदम.
सिविल लाइंस ब्रिटिश राज की दोहरी नीति की याद दिलाते हैं. विकास और शोषण. दिल्ली का सिविल लाइंस 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश पुनर्स्थापना का प्रतीक बना, जबकि प्रयागराज का मॉडल अन्य शहरों के लिए उदाहरण. ये क्षेत्र आज भी हरे-भरे बंगलों और शांत वातावरण के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इनकी जड़ें औपनिवेशिक अलगाव में हैं. भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की राह पर है. सिविल लाइंस जैसे नामों और प्रतीकों को हटाना या बदलना सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि मानसिकता को डीकोलोनाइज करने की दिशा में कदम है. इतिहास को भुलाया नहीं जाना चाहिए, बल्कि संग्रहालयों या हेरिटेज वॉक में संरक्षित किया जाना चाहिए. दिल्ली के निकोलसन कब्रिस्तान या प्रयागराज के चर्च को संरक्षित रखते हुए नाम बदलना संभव है.
सिविल लाइंस की कहानी ब्रिटिश साम्राज्य के उदय, पतन और भारत की स्वतंत्रता की यात्रा है. सरकार का यह प्रयास 77
सालों की आजादी को सच्ची स्वाधीनता में बदलने का प्रतीक है. पुरानी छाया हटाकर हम नई रोशनी में आगे बढ़ सकते हैं भारतीय पहचान, एकता और प्रगति की रोशनी में.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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