पिछले दो दिनों से संसद से बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में एक ही मुद्दे पर हंगामा हो रहा है, वह है राज्य के मुजफ्फरपुर में एक बालिका गृह से सम्बंधित स्कैंडल का. खुद पुलिस और समाज कल्याण विभाग द्वारा अब तक 42 बालिकाओं की मेडिकल रिपोर्ट में 29 बालिकाओं के साथ यौन शोषण की जब से पुष्टि हुई है तब से पूरे देश में इस घटना की चर्चा तेज़ हुई है. वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन के ऊपर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.
हालांकि राज्य सरकार ने विधानसभा के अंदर इस मुद्दे पर जवाब दिया लेकिन जिस तरह मंत्री श्रवण कुमार ने अनमने तरीके से पूरा बयान पढ़ा उससे लगा कि जैसे बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला विपक्ष संवेदनहीन है. वैसे नीतीश कुमार भी इस मुद्दे पर खुद कुछ बोलने से बच रहे हैं. बिहार में विपक्ष ने, खासकर तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार के सामने घुटने टेक दिए हैं. इतने गंभीर मामले में उन्होंने एक बार भी मुजफ्फरपुर जाकर न तो उस बालिका गृह का निरीक्षण करना, स्थानीय अधिकारियों से बात करना बेहतर समझा और न ही जब सरकार जवाब दे रही थी तब सदन में उपस्थित रहना ज़रूरी समझा. तेजस्वी अपने घर पर थे और विधानसभा में उनकी पार्टी के विधायक शर्म से सर झुकाए घूम रहे थे. इन सभी मामलों में विपक्ष की एक अहम भूमिका होती है, लेकिन तेजस्वी दिन भर में कुछ ट्वीट और एक से अधिक बार टीवी चैनल को बाइट देकर अपनी भूमिका की इतिश्री कर लेते हैं. जब से ये स्कैंडल सामने आया है, तेजस्वी के पास अपने परिवार के साथ विदेश भ्रमण के अलावा मुंबई जाकर शादी में भाग लेने का समय है, लेकिन पटना से 60 किलोमीटर दूर जाने का समय नहीं.
लेकिन तेजस्वी सुस्त हैं तो नीतीश कुमार कोई बहुत चुस्त और मुस्तैद नहीं. कम से कम नीतीश बिहार में, जहां उनका शासन चौदह वर्षों से चल रहा है वहां इस घटना से ये बात साबित हुआ कि वे अपने राज्य की बच्चियों की अस्मिता बचाने में विफल रहे. सारा दुष्कर्म बालिका गृह में कथित रूप से हुआ.नीतीश कुमार भले इस बात पर अपनी पीठ थपथपा लें कि उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट से न केवल ऑडिट करवाया बल्कि त्वरित कार्रवाई की. तीन दिनों के अंदर एक साथ दस आरोपियों को जेल भेजा. इनमें सरकारी कर्मचारी और महिला कर्मी शामिल हैं. लेकिन नीतीश कुमार ने उन लोगों के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जो उस बाल गृह का निरीक्षण कर कभी कुछ गलत नहीं पाते थे. लेकिन शायद नीतीश कुमार को अंदाज़ा नहीं है कि ये एक ऐसा विषय है जिस पर पूरे देश में चर्चा हो रही है. कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति उनके भविष्य और उनकी व्यक्तिगत छवि के लिए महंगा पड़ सकता है.
मंगलवार को जब केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंघ ने दिल्ली में कहा कि अगर बिहार सरकार अनुशंसा करे तो उसे सीबीआई से जांच कराने में कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन इस मुद्दे पर पहले राज्य के पुलिस महानिदेशक और फिर विपक्ष के बहिष्कार के बीच सरकार की तरफ से कार्रवाई का व्याख्यान किया गया. इससे साफ़ था कि हर मामले में सीबीआई जांच देने में देर न करने वाले नीतीश कुमार कहीं न कहीं इस मामले में चूक रहे हैं. हो सकता है अन्य बिहारियों की तरह सीबीआई जांच पर उन्हें भी बहुत भरोसा नहीं. क्योंकि सीबीआई को उन्होंने ब्रम्हेश्वर मुखिया हत्या कांड का मामला हो या मुजफ्फरपुर का नवरना हत्याकांड हो या सृजन स्कैम, सब में जांच से सबको निराशा हाथ लगी है. सृजन घोटाले में सीबीआई आज तक इसके मुख्य आरोपी को गिरफ़्तार नहीं कर पाई है. जो जांच एजेंसी के इतिहास में एक काला धब्बा है.
हालांकि ये एक ऐसा स्कैंडल हैं जिसमें मीडिया की भूमिका भी एक अपराधी की रही है. मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर ने एक पत्रकार की हैसियत से अपनी पहुंच का जमकर फायदा उठाया. हालांकि स्कैंडल प्रकाश में आने के बाद इस पर रिपोर्टिंग जमकर हुई लेकिन मीडिया की भूमिका एक मुख्य आरोपी की रही है. आने वाले समय में वैसे पत्रकार को जो अपनी मीडिया की पहचान पर गोरखधंधे करते हैं उन पर नकेल कसी जाए तो मीडिया वालों को शिकायत करने का कोई आधार नहीं है.
लेकिन सवाल है कि बिहार पुलिस जिसने अभी तक जांच की है, क्या उसकी जांच पर भरोसा किया जा सकता है. निश्चित रूप से अभी तक पुलिस ने किसी को बचाया नहीं है लेकिन जहां सरकार के एक से अधिक विभागों के अधिकारियों की संलिप्तता हो, खुद पुलिस की महिला शाखा की चूक हो, वहां एक सीमा के बाद शायद निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना बेकार होगा.
मनीष कुमार NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...
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This Article is From Jul 24, 2018
यह जिद नीतीश कुमार को क्यों पड़ सकती है भारी?
Manish Kumar
- ब्लॉग,
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Updated:जुलाई 26, 2018 10:51 am IST
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Published On जुलाई 24, 2018 23:01 pm IST
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Last Updated On जुलाई 26, 2018 10:51 am IST
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