अंग-बंग-कलिंग... ये प्राचीन भारत की महज काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं है. यह एक विशाल सभ्यतागत गलियारे की स्मृति है, जिसने कभी व्यापार, तीर्थाटन, संस्कृति और समुद्री गतिविधियों के जरिए गंगा के मैदानों, बंगाल डेल्टा और बंगाल की खाड़ी के तटीय इलाकों को एक सूत्र में पिरोया था. इस वक्त ये क्षेत्र मोटे तौर पर बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा तक फैले हैं. ये तीनों क्षेत्र भारतीय इतिहास में कभी हाशिए पर नहीं रहे, बल्कि समृद्धि, ज्ञान, आध्यात्मिकता और वैश्विक जुड़ाव के सबसे जीवंत केंद्र रहे हैं.
बिहार का अंग क्षेत्र
'अंग' क्षेत्र पूर्वी बिहार का, खासकर चंपा क्षेत्र का इलाका था, जो इस वक्त भागलपुर और मुंगेर के आसपास है. यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और वाणिज्यिक केंद्र हुआ करता था. गंगा के मैदानी इलाकों से अच्छे से जुड़ा यह क्षेत्र आर्थिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था.
बंगाल का बंग क्षेत्र
'बंग' यानी बंगाल ने इस पूर्वी क्षेत्र का डेल्टा के रास्ते समुद्र तक विस्तार किया. बंगाल की नदियों में उस वक्त भी केवल पानी नहीं बहा करता था, बल्कि ये आवाजाही और व्यापार के जीवंत मार्ग थे. ताम्रलिप्त (वर्तमान तामलुक) जैसा प्राचीन बंदरगाह दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और यहां तक कि रोमन साम्राज्य तक भारत की पहुंच का द्वार था.
ओडिशा का कलिंग क्षेत्र
'कलिंग' प्राचीन ओडिशा का क्षेत्र था, जिसने इस पूर्वी पट्टी को एक सशक्त समुद्री शक्ति बना दिया था. कलिंग को सिर्फ चर्चित कलिंग युद्ध और सम्राट अशोक के हृदय परिवर्तन के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि शक्तिशाली समुद्री परंपराओं के लिए भी याद किया जाता है. यह बंगाल की खाड़ी को पार करके श्रीलंका, बर्मा, जावा, बाली, सुमात्रा और दक्षिण एशिया के अन्य इलाकों तक व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित करने का माध्यम था. इस तरह कलिंग को पूर्वी भारत की सागरीय कल्पना कहा जा सकता है.

भारत और बाहरी विश्व के मिलन का केंद्र
अगर हम अंग, बंग और कलिंग को एक साथ देखें तो ये तीनों मिलकर कनेक्टेड पूर्वी सिस्टम बनाते हैं. अंग ने इस क्षेत्र को गंगा के मैदानों की गहराई दी, बंग ने नदियों और डेल्टा का रास्ता बनाया तथा कलिंग ने उसे समुद्र की विशालता से जोड़ दिया. इस क्षेत्र की खुशहाली नदियों, बंदरगाहों, खेती, कला, तीर्थयात्राओं, बौद्ध व हिंदुओं के पवित्र स्थलों और दूर-दूर तक फैले व्यापार के संगम से आई थी. कहने का अर्थ ये कि पूर्वी भारत कभी भी उपमहाद्वीप का कोई पिछड़ा हिस्सा नहीं रहा. यह भारत और बाहरी विश्व के मिलन का एक महान केंद्र रहा है.
हाल के समय में इन पुरानी यादों ने एक नया राजनीतिक रूप लिया है. ओडिशा, बिहार के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी की सरकार है. यह एक 'पूर्वी राजनीतिक गलियारे' के पूरा होने जैसा है. यहां पार्टी की मौजूदगी सिर्फ चुनावी उपलब्धि नहीं है, बल्कि ये भारत के इस पूर्वी हिस्से को एक मजबूत रणनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्र के रूप में दुनिया के सामने रखने का अवसर है.
'पू्र्वोदय' बन सकता ग्रोथ का इंजन
इस कहानी में 'पूर्वोदय' यानी पूर्व के उदय का विचार सबसे खास है. पूर्वी भारत के विकास को अक्सर हाइवे, रेलवे, बंदरगाहों, औद्योगिक गलियारों, समुद्री रास्तों, मानव संसाधन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के नजरिए से देखा जाता है. इस ढांचे में बिहार, बंगाल और ओडिशा की भूमिका बहुत बड़ी है. बिहार अपनी बड़ी आबादी और गंगा के मैदानों की ताकत देता है, बंगाल नदियों और बंदरगाहों से नई संभावनाएं पैदा करता है. और ओडिशा अपने खनिज भंडार और समुद्री तटों के साथ योगदान देता है. अगर इन शक्तियों को सही योजना के साथ जोड़ दिया जाए तो यह पूरा इलाका भारत की ग्रोथ का बड़ा इंजन बन सकता है.
प्राचीन समुद्री मार्ग का आधुनिक रूप
समुद्री व्यापार का पहलू यहां ज्यादा महत्वपूर्ण है. प्राचीन अंग-बंग-कलिंग का रिश्ता बंगाल की खाड़ी से बहुत गहरा था. आज वही समुद्री क्षेत्र फिर से भारत की योजनाओं के केंद्र में है. कोलकाता-हल्दिया, पारादीप, धामरा और गोपालपुर जैसे बंदरगाह, ताम्रलिप्त और कलिंग के पुराने समुद्री रास्तों के आधुनिक रूप बन चुके हैं. इन बंदरगाहों के जरिए पूर्वी भारत न सिर्फ देश के बाकी हिस्सों से बल्कि बांग्लादेश, म्यांमार, दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से भी जुड़ सकता है.
इस संदर्भ में देखें तो बंदरगाहों पर आधारित विकास, तटीय शिपिंग, जलमार्ग और औद्योगिक गलियारे केवल तकनीकी प्रोजेक्ट नहीं हैं. इनमें इतिहास की गूंज छिपी है. ये हमें बंगाल की खाड़ी के जरिए दुनिया से फिर से कनेक्ट करने का अवसर देते हैं. वही बंगाल की खाड़ी जिसके रास्ते कभी व्यापारी, भिक्षु, कलाकार, नाविक और तीर्थयात्री पूरे एशिया की यात्रा करते थे. एक आधुनिक 'पूर्वी गलियारा' व्यापार, बुनियादी ढांचे और रणनीतिक पहुंच का एक बेहतरीन मेल बन सकता है.

महत्वपूर्ण सांस्कृतिक गलियारा
सांस्कृतिक नजरिए से देखें तो इस विचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सांस्कृतिक पुनरुद्धार भी है. बीजेपी अक्सर अपनी राजनीति को विरासत से जोड़कर आगे बढ़ती है, जिसमें मंदिरों के जरिए विकास, भौगोलिक पवित्रता और सभ्यता के गौरव को स्थानीय पहचान से जोड़कर महत्व दिया जाता है. अंग-बंग-कलिंग गलियारे की सांस्कृतिक विरासत इस लिहाज से बहुत समृद्ध है. इसमें बोधगया, राजगीर, वैशाली, नालंदा, पुरी, कोणार्क, भुवनेश्वर, तामलुक, तारापीठ, मायापुर और गंगासागर जैसे प्रमुख स्थान शामिल हैं. ओडिशा और बंगाल के बौद्ध सर्किट भी हैं. इनमें से प्रत्येक स्थल पर बौद्ध, हिंदू, वैष्णव, शाक्त, शैव, तांत्रिक, जनजातीय और सामुद्रिक परंपराओं की गहरी छाप है.
इस क्षेत्र में तंत्र साधना की विरासत इसे और भी खास बनाती है. बंगाल, बिहार और ओडिशा केवल अपने मंदिरों या बौद्ध शिक्षा के स्थलों के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं. ये दक्षिण एशिया के अलग-अलग धर्मों और विचारों के मिलन स्थल भी रहे हैं. सदियों तक यहां शाक्त, शैव, बौद्ध तंत्र, वज्रयान और जनजातीय आध्यात्मिक परंपराओं ने मिलकर एक अनोखा समाज बनाया है. तारापीठ, कालीघाट, बक्रेश्वर, नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतापुरी और पुरी आदि ऐसे पवित्र स्थल हैं, जहां दर्शन, भक्ति और लोक विश्वास एक साथ आकर मिलते हैं.
ओडिशा की जगन्नाथ परंपरा, पुरी में विमला देवी की पूजा, चौंसठ योगिनी मंदिर, बंगाल की शक्ति परंपराएं और बिहार का वज्रयान से जुड़ाव... ये सभी दर्शाते हैं कि पूर्वी भारत सांस्कृतिक रूप से हमेशा सक्रिय रहा है. यह क्षेत्र हमेशा से रचनात्मक, प्रयोगधर्मी और विविधताओं से भरा रहा है. यहां पूजा की नई पद्धतियों ने जन्म लिया, दर्शन के नए सिद्धांतों का मेल हुआ और स्थानीय मान्यताओं को वैश्विक पहचान दिलाने के नए मार्ग खोजे गए. यह तांत्रिक और पवित्र भूगोल इस क्षेत्र को केवल 'मंदिरों की भूमि' नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुष्ठान की शक्ति, आध्यात्मिक प्रयोगों और सांस्कृतिक विविधता वाले एक महान सभ्यता का केंद्र बनाती है.
विकास की नई सोच
इस विचार का गहरा राजनीतिक महत्व तीन बातों के मेल में छिपा है- सभ्यता, संपर्क और व्यापार. सभ्यता इसे भावनात्मक और सांस्कृतिक मजबूती प्रदान करती है. संपर्क इसे प्रशासनिक और बुनियादी ढांचे का आधार देता है. व्यापार इसे आर्थिक रूप से विश्वसनीय बनाता है. अगर ये तीनों चीजें एक साथ मिल जाएं तो यह पूर्वी गलियारा केवल चुनावी नक्शे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विकास की एक नई सोच बन जाएगा.
हालांकि ये विचार तभी सफल होगा, जब यह केवल प्रतीकों और दिखावे से आगे बढ़ेगा. पूर्वी भारत सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक रूप से काफी जटिल है. बिहार, बंगाल और ओडिशा की अपनी अलग भाषाई पहचान, जातिगत सिस्टम, क्षेत्रीय आकांक्षाएं, सीमावर्ती चिंताएं, कृषि संकट, पलायन और पर्यावरणीय चुनौतियां हैं. बंगाल का डेल्टा, बिहार के बाढ़ वाले मैदान और ओडिशा के समुद्री तटों के लिए ऐसी योजनाएं चाहिए, जो जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का भी ध्यान रखें. बंदरगाहों पर आधारित विकास ऐसा न हो, जिससे तटीय समुदायों को विस्थापित न होना पड़े. विरासत स्थलों का पुनरुद्धार केवल नाममात्र का नहीं होना चाहिए. आर्थिक गलियारे महज खनिज और माल ढोने का रास्ता बनकर न रह जाएं बल्कि स्थानीय लोगों को भी रोजगार भी प्रदान करें.
चुनावी ही नहीं, समावेशी शासन
ऐसे में बीजेपी के सामने चुनौती महज चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. उसकी बड़ी चुनौती इस कॉरिडोर की सोच को एक समावेशी शासन (Inclusive Governance) में बदलने की है. बुनियादी ढांचे का लाभ आम जनता तक पहुंचना चाहिए. सांस्कृतिक पुनरुद्धार में स्थानीय परंपराओं का सम्मान होना चाहिए. समुद्री व्यापार के विकास में तटीय समुदायों की रोजी-रोटी सुरक्षित रहनी चाहिए और क्षेत्रीय विकास से राज्यों की विविधता खत्म नहीं होनी चाहिए. 'अंग-बंग-कलिंग' के इस विचार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह ऐतिहासिक गौरव को जमीनी स्तर पर कितनी अच्छी तरह उतार पाती है.
इस सबके के बावजूद, एक राजनीतिक और सभ्यतागत विचार के रूप में 'अंग-बंग-कलिंग' आज भी बेहद शक्तिशाली है. यह पूर्वी भारत को एक विशाल और गौरवशाली नजरिया देता है. यह भारतीय जनता पार्टी को पूरब तक चुनावी जीत का विस्तार करके सियासी फायदा उठाने का ही नहीं, बल्कि एक पुराने ऐतिहासिक भूगोल को फिर से जोड़ने का भी मौका देता है. इस विचार में बिहार गंगा की गहराई देता है, बंगाल डेल्टा का प्रवेश द्वार बनता है और ओडिशा समुद्री क्षितिज प्रदान करता है.
ये तीनों क्षेत्र मिलकर भारत का एक ऐसा पूर्वी हिस्सा तैयार करते हैं, जिसने कभी पूरे देश को दुनिया से जोड़ने का कार्य किया था. अगर संवेदनशीलता, बड़े लक्ष्यों और प्रशासनिक गंभीरता के साथ इस गलियारे की पुनर्कल्पना की जाए तो यह एक बार फिर से व्यापार, संस्कृति, बुनियादी ढांचे, तीर्थयात्रा, समुद्री रणनीति और क्षेत्रीय खुशहाली का केंद्र बन सकता है. 'अंग-बंग-कलिंग' का असली वादा भी यही है कि यह पूर्वी भारत को राजनीति के अखाड़े से आगे बढ़कर एक ऐसा सेतु बनाए, जहां भारत के गौरवशाली अतीत और उसके उज्ज्वल भविष्य का मिलन हो.
डिस्क्लेमर: लेखक इमानकल्याण लाहिड़ी कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर हैं. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.