"पत्रकारिता के लिए पत्रकार उसकी आत्मा है. यह लोकशाही या लोकतंत्र जो खतरे में है, उसका एक कारण यह भी है कि हमने पत्रकारों को ठेका में डाल दिया है. हायर एंड फायर एक नई चीज यूरोप से आई है यानी सबसे ज्यादा हायर एंड फायर कोई है तो वह पत्रकार है. इस चौथे स्तम्भ पर आपातकाल लग गया है. हिंदुस्तान में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है. यह जो पत्रकार ऊपर बैठा हुआ है, वह कुछ नहीं लिख सकता है". यह बात 22 मार्च को जेडूयू के सांसद शरद यादव ने राज्य सभा में कही थी. जब संसद में मीडिया के भूमिका को लेकर सवाल उठाया जा रहा है तो वास्तव में यह गंभीर बात है.
हां, यह अलग बात है की मीडिया को बिगाड़ने में कहीं-कहीं कुछ राजनेताओं का हाथ भी है. अपने फ़ायदा के लिए कई राजनेताओं ने मीडिया का गलत इस्तेमाल भी किया है लेकिन इसमें राजनेताओं से ज्यादा दोषी वह पत्रकार हैं जो बिक जाते हैं. मीडिया की रिपोर्टिंग में कई बदलाव आए हैं. टीआरपी की टेंशन की वजह से कुछ पत्रकार अपनी पृष्ठभूमि छोड़कर भाग रहे हैं. आजकल रिपोर्टिंग की शैली बदल गई है. लोगों की समस्या को छोड़कर मीडिया ने किसी ऐसी रिपोर्टिंग में अपने आप को उलझा दिया है जिस का कोई महत्व नहीं है. लोगों की समस्या से ज्यादा एक मुख्यमंत्री अपने नाश्ता क्या खाता है, वह ज्यादा महत्पूर्ण बन गया है. किसानों की समस्याओं से ज्यादा नेताओं की बाइट महत्पूर्ण हो गई है.
युवा पत्रकार भी ऐसी पत्रकारिता का हसफ़र बनते जा रहे हैं. देश में बहुत ख़बरें हैं लेकिन उत्तर प्रदेश एक पत्रकार के लिए 'जीना यहां मरना यहां' जैसा बन गया है. जिस खबरों का कोई महत्व नहीं, वो छाई हुई हैं. आदित्यनाथ योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बाल की खाल निकाली जा रही है. उनका बचपन का नाम क्या था, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए थे या उत्तराखंड में. नाश्ते में क्या-क्या लेते हैं, पपीता कब खाते हैं ,दलिया कब खाते हैं. ऐसा लगा रहा है जैसे पपीता पत्रकारिता का दौर चल रहा है. वैसे हम सैंडविच पत्रकारिता का दौर भी देख चुके हैं. जेल में रहते हुए जब इन्द्राणी मुखर्जी ने सैंडविच खाया था तो कुछ चैनलों ने इसे ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में चलाया था. इन्द्राणी मुखर्जी शीना मर्डर केस में जेल में बंद है.
सिर्फ इतना नहीं कई जगह यह भी लिखा गया है योगी आदित्यनाथ के अखिलेश यादव के जीजा हैं? और तर्क यह दिया जा रहा है कि जिस गांव में अखिलेश यादव का शादी हुई है, उसी गांव में योगी का जन्म हुआ है. वाह, क्या शानदार तर्क है? सिर्फ इतना ही नहीं आदित्यनाथ योगी के मठ में कितनी गाय हैं, कुत्ता का नाम क्या है. योगी आदित्यनाथ अपनी गाय सीएएम हाउस लेकर आएंगे या नहीं? ऐसी खबरों को भी मुख्य पेज पर जगह मिल रही है. यह भी खबर आई थी कि उनकी एक पालतू बिल्ली है जिसके बिना वे खाना नहीं खाते. अब यह भी ट्वीट किया गया है कि मुख्यमंत्री ने अपने बाल काटने के लिए लिए किसी नाई को बुलाया है.
उत्तर प्रदेश के सिवा और भी चार राज्यों में नई सरकार बनी है. लेकिन उन राज्यों में क्या हो रहा है, कोई खबर नहीं है. अब ऐसा लग रहा है कि उत्तरप्रदेश ही टीआरपी का भंडार है. सोशल मीडिया में भी सिर्फ यही चर्चा है. दस में छह खबर आदित्यनाथ योगी और उत्तर प्रदेश से संबंधित मिलेंगी. ऐसा लगता कि लोगों को योगिफोबिया हो गया है. पूरा सोशल मीडिया हिन्दू-मुसलमान में बंटा हुआ है. कुछ लोग योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं तो कुछ आलोचना. सब से दुःखपूर्ण बात यह है कि जो युवा पत्रकार हैं, वह भी रास्ता भटक रहे हैं. ऐसे लगने लगा है कि जैसे किसी पार्टी की प्रवक्ता की तरह बात कर रहे हैं. अब युवाओं की भी क्या गलती है? वरिष्ठ पत्रकारों से कुछ तो सीखेगें?
मीडिया की विश्वसनीयता के ऊपर जो सवाल उठाया जा रहा है, वह जायज़ है. पत्रकार पत्रकारिता छोड़कर कहीं भटक गया है. आजकल तो पत्रकार किसी पार्टी के जीत से खुशी और हार से दुखी होने लगा है. हां, यह सच है कि कुछ पत्रकार आज भी पत्रकारिता के मान को बचाने में लगे हुए हैं लेकिन ऐसे पत्रकार बहुत कम हैं. एक समय ऐसा था जब अपनी बेबाक पत्रकारिता के लिए पत्रकार के ऊपर हमेशा खतरा मंडराते रहते थे, लेकिन अब पत्रकारिता खतरे में हैं. अब लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ एक खंभा बन गया है. एक ऐसा खंभा जिसकी नींव हिल गई है. हवा के रुख के हिसाब से ढलता रहता है. जहां फ़ायदा उस तरह ढल जाता है.
सुशील कुमार महापात्रा एनडीटीवी इंडिया के चीफ गेस्ट कॉर्डिनेटर हैं...
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This Article is From Mar 25, 2017
सैंडविच पत्रकारिता के बाद अब पपीता पत्रकारिता का दौर चल रहा है
Sushil Kumar Mohapatra
- ब्लॉग,
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Updated:मार्च 25, 2017 13:23 pm IST
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Published On मार्च 25, 2017 13:17 pm IST
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Last Updated On मार्च 25, 2017 13:23 pm IST
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